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Full text of "Prtinidhi Kahaniya"

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प्रति नेधि ऋछूनिः। 


[ हिन्दी विश्वविद्यालय की सध्यमा परीक्षा के पाठ्यक्रम में स्वीकृत 


संकलनकतों 


श्री भगवतीग्साद वाजपेयी 


सम्बत्‌ू २०१० 


हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग 


भुद्रक-- सम्मलन मुद्रणालय, प्रयाग 


अका २ काय 
प्रस्तुत कहानी-संग्रह में हिन्दी के सुप्रसिद्ध कहानीकारों की झुन्दुर 
रचनाओ का संकलन किया गया है| इसके सम्पादक श्री भगवतीप्रसाद 
बाजपेयी हिन्दी के एक ल्ब्धप्रतिष्ठ कहानी लेखक हैं। वाजपेयीजी ने 
इस संग्रह का सुरुचिपूर्ण ढंग से संकलन किया है। साथ ही कहानी- 
साहित्य पर एक विद्धत्तापूर्ण भूमिका भी दी है। हमारा विश्वास है, 
प्रस्तुत संग्रह से परीक्षार्थियों को समुचित लाभ होगा । 


नागपंचसी, २०१० साहित्य मन्त्री 





विषय-सूची 
भूसिका 
बेढ़ी---जयशंकर प्रसाद 
बूढी काकी--प्रेमचन्द्‌ 
दही की हांड्री---चतुरसेन शास्री 
निदिया लागी--भगवतीप्रसाद वाजपेयी 
अपना श्रपना भाग्य--जैनेन्द्रकुमार 
दुःख का अधिकार--यशपाल 
शान्ति हँसी थी--श्रशेय 
शमलीला--राधाकृष्ण 
सुलतान की आच्मा--पहाड़ी 
मिस्टर पिल्‍ल्ले--लक्ष्मीधर वाजपेयी 
चुनोती--विष्णु प्रभाकर 
अर्थी के आँसू--भोहनसिह संगर 
इकलाई--भीमती चन्द्रकिरण सोनरेक्‍्सा 


कहानी की कथा 
[१] 


रिचर्ड बन का कथन है--- कहानी संसार की सबसे पुरानी वस्तु 
है। इसलिए आइचये नहीं कि इसका प्रारम्भ उसी समय से हुआ हो, 
जब मनुष्य ने घुटनों के बल चलता सीखा था।” 

तात्पय्यं यह कि कहानी का जन्म हुए सैकडों युग बीत गये। मनुष्य 
ने समाज बनाया, समाज ने अपनी सुविधा के लिए कुछ नीतियाँ और 
रीतियाँ स्थिर की, जिनसे मनुष्य के सस्कार बने और फिर कालान्तर 
में उन्होंने एक सभ्यता का रूप ग्रहण कर लिया। समभ्यताओं ने करवबर्टे 
लीं, तो मानवी संस्कारों को नया जीवन मिला। युग-पर-युग बीतते चले 
गये। मनुष्य ने जब घुटनों के बल चलना सीखा था, तब भी वह कहानी 
कह रहा था। आज जब वह वायुयान पर बेठ कर घमता है, तब भी--- 
उससे उतरते क्षण---एक कहानी कहता है। यह बात दूसरी है कि सभी 
मिलनेवाले उसकी कहानी सुन न पायें। न केवल एक कहानी के छिए, वरनु 
अन्य प्रकार की साहित्य-कलाओं के लिए भी, न्यूनाधिक रूप में यही बात 
कही जा सकती है । 

मनुष्य-द्रीर मे ऑखे सब के होती हे, हृदय भी सब के होता है। 
पर ऐसे कितने व्यक्ति होते है जो विसी मार्ग पर चलते-चलते कही 
यकायक इसलिए रुक जाते हे कि आगे चीटियों का जो दर दहिने से बायें 
चला जा रहा हे, उनके अगले पद-क्षेप से उसके दस-बीस श्रमजीवी कहीं 
कुचलकर मर न जायें | सभी व्यवितयों की रुचि एक-सी नहीं होती, न 
सभी व्यक्ति समान रूप से भावनाशील होते है। इसीलिए इस जगत-सुष्टि 
में मिरन्तर जो बाते हम सुनते, जो दृश्य अपनी आंखों से देखते हैं, उन सबको 
न विशेष रूप से हृदयंगस कर पाते है, न उनमें निटित साहित्य-कला के 
मूलाघारों स लाभान्वित ही होते है । 


एक दिन की बात है, हाथाने ओर लागफेलों भोजन कर रहे थे। संयोग 
से उनके निन्र जेग्सफोल्ड भी उसमे सम्मिलित थे। वार्तालाप के बीच 
उन्होंने कही कह दिया--- देखी, मा कितने दिन से हाथार्स से, एक आकें- 
डियन दन्त-कथा के आधार पर कहानी लिखने का अनुरोध कर रहा हैं। 
पर इनसे लिखा ही नहीं जाता । 

लागफेलों ने मुसकराते हुए पुछा---कथानक क्‍या हैं ? ” 

जेम्सफीोल्ड ने उत्तर दिया-- मुझे तो कथानक बडा ही मर्मस्पर्णी 
जान पडता हें। आर्केडियन लोगो की भागदौड में कही एक रूडकी अपने 
प्रेमी से छट गयी। परिणाम यह हुआ कि उसने अपना समस्त जीवन उस 
प्रेमी की खोज में व्यतीत कर दिया | अन्त मे प्रेमी तो उसे नहीं मिला, किन्तु 
बह लटकी उस प्रेमी को एक अस्पताल मे मिल गयी। पर उस समय, 
जब वह मृत्यु शय्या पर पड़ी हुई थी! 

कथानक सुन कर लांगफ़ेलो के आरचये की सीमा न रही ' प्रेरणा के आग्रह 
से तत्काल उनके मह से निकल पठा--- अगर तुम्हारा विचार इस कथानक 
के आधार पर कहानी लिखने का ने हो, तो से कत्रिता लिख डालूँ।” 

हाथावं ने, तुरन्त अनुमति दे दी । रांग्रफ़ेछो का प्रसिद्ध काव्य (इव्रेजेलिन' 
इसी कथानक के अवलम्ब की रचना है । 

का मेः मैट 

कहानी की सर्वंसम्मत्त परिभाषा लिखना दुष्कर है। यों तो साधारण 
रूप से यह समस्त जगत ही भिन्न रुचियों से निर्मित हुआ है, किन्तु 
जीवन की आधारभूत वृत्तियों मे इतनी रुचि-भिन्नता प्राय. कमर ही देखने 
को मिलती है जितनी कला के क्षेत्र मे। डॉक्टर जानसन तो बंनानिक बात 
से भी कलाकार की सी भाषा का प्रयोग कर बैठते थे। यथा-- 
जानते हे कि प्रकाश क्‍या वस्तु है; किन्तु हममे से कोई यह नहीं बता सकता 
कि वह क्‍या है और कैसा है।” कविता के सम्बन्ध में भी ठीक कुछ इसी 
प्रकार की सम्मति कालरिज की है। यथा---“कविता' का पूरा-पुरा रस 
तभी मिलता है, जब वह भली भ ति सम में नहीं आती |" 

कहानी के विषय में भी विश्वविश्यात लेखकों के मत भिन्न भिन्न 
प्रकार के हैं। यथा--- 


डे 


मिस्टर फोरस्टर--कहानी परस्पर सम्बद्ध घटनाओं का बहू क्रम है 
जो किसी परिणाम पर पहुँचाता है। 


फोस्टर महोदय की यह परिभाषा तो कुछ समभ में आती है। पर 
किसी भी क्रम को कहानी कहना वाक्‌-शैशिल्य प्रकट करना है। 

अब ह्यवाकर सहोदय का मत देखिये। 

आप कहते हें---जो कुछ मनुष्य करे, वही कहानी है।” जो कुछ 
मनुष्य न करे या न कर पाये, छाख चेष्टा करने पर भी, किसी तरह न कर 
पाये, प्रहइन यह है कि वह कहानी क्‍यों नहीं है ? 

एडगर एलन पो का कथन हँ--कहानी एक प्रकार का वर्णनात्मक गद्य 
हैं, जिसके पढने में आध घढे से लेकर एक घटे का समय लछुगता है। अर्थात्‌ 
एक बैठक में जो पूर्ण रूप मे पढा जा सके, वही कहानी है। 

यह परिभाषा भी कम अस्पपष्द नहीं है। कहानी एक प्रकार का 
वर्णनात्मक गयय है' कथन में वह बात छिपी रह जाती है कि जिसे वे "एक 
प्रकार का! वर्णनात्मक गद्य कहते है, वह वास्तव मे किस प्रकार का है। 
और घंठे-आध घंटे का समय निर्धारित कर देने से परिभाषा के स्पष्टी- 
करण में कोई विशेष सहायता नहीं मिल्ठती। 


परन्तु अन्यत्र उन्होंने छिल्रा है कि कथाकार यदि प्रवीण और कछाकुशलू 
है तो वह अपनी कहानी में पहले कोई घटनाचक्र देकर फिर उसमे अपने 
विचारों की कड़ियाँ डाल देने में ग़ुलती कभी न करेगा। वह सतकंता से 
अपने लक्ष्य और प्रभाव की कल्पना करेगा, उसके बाद वह धठनाओं की रचना 
और कथानक की संयोजना इस ढंग से करेगा! कि उसका लक्ष्य और प्रभाव 
सर्वाधिक सफलता व्यंजित करने में समर्थ हो । 

एंडगर एलन पो महोदय अँगरेजी कथा-साहित्य के आदि निर्माता 
माने जाते है। कहानी-लेलन के साथ-साथ उन्होंने कथा-निरूपण के सम्बन्ध 
में अपने सिद्धान्त और विचार भी सुन्दर ढंग से व्यक्त किये हैं। उसके कथ 
नानुसार पाठकों की भावना तथा बुद्धि को स्पर्श करना छेखक के लिए 
आवश्यक है; पर प्रभाव की एक्रता का निर्वाह तो उसके लिए अनिवार्श्य 
रूप से आवदयक है। बह घटनाओं का तारतम्ग उपस्थित करे, वह खरित्र 


है| 


निर्माण का ऐसा आदर्श ग्रहण करे, जो अभीष्ट प्राप्ति मे सहायक हो, पर 
उसमे भरती का एक शब्द न होना चाहिए। 

वालपोलरू का कथन है--- कहानी मे घटनाओं का ब्यौरा होना चाहिये। 
कहानी घटना-दुर्घटला सकुल हो, उसकी गति तीज्र हो, उसका विकास 
अप्रत्याशित हो । उसे दुविधा के माध्यम से सकट की परिणति की ओर 
अग्रसर होना चाहिये। कहानी की स्थिति उस घुडदौड की भाँति है जिसका 
प्रारम्भ और अन्त ही महत्वपूर्ण होता है। 

जैक लण्डन का मत हँ--कहानी मूते, सम्बद्ध, त्वरागुणमयी, सजीव 
तथा रुचिकर होनी चाहिये । 

जे० बी० ईसनवीन ने लिखा है--प्रभाव की एकता, कथानक की 
श्रष्ठता, घटना की प्रधानता, एक प्रधान पात्र और किसी एक समस्या का 
का समाधान---कहानी मे ये पांच गुण होने चाहिये। कथानक में घटनाओं 
का तारतम्य, तीकज़ता, पदना में सम्भाव्य प्रकृति, कोई एक नाटकीय प्रसंग, 
दुविधा और उत्सुकता होनी आवश्यक हैं। 

'बैरी पैन का मत है---उपन्यास एक तुप्ति और निराकरण है और कहानी 
एक प्रोत्साहन और उत्तेजन। इसी भाव को हम इस प्रकार भी कह 
सकते है कि उपन्यासकार यदि विश्लेषक है तो कहानीकार संइ्लेषक। 

हडसन का कथन है---कहानी मे चरित्र व्यक्त होता है और उपन्यास 
में विकसित । 

प्रेमचन्द्र जी का कथन उपर्युक्त कथनों से कितना मिलता जुलता है। 
उन्होंने कहा था--- कहानी एक ऐसा उद्यान नही जिसमें भांति भांति 
के फूल वेल-बूटे सजे हुए हे; बल्कि एक गमला है, जिसमे एक ही गमले का 
मालधुय्यें अपने समुन्नत रूप से दृष्टिगोचर होता हे।” 

स्टीवेसन का मत है---कहानी जीवन भर की प्रतिनिधि मही, उसकी 
कुछ दिशाओं का ही वर्णन है। रूघृकथा पहले कथा है, उसके याद लघु, 
जेसा कि उसके अथ॑ से व्यक्त होता है। यह समभ लेना अनुचित होगा कि 
वह एक संक्षिप्त उपन्यास होती है। रूघुकथा में यद्यपि नाटकीय गुण होता है 
तथापि यह समझ लेना भी अनुचित होगा कि वह नाटक के विविध भेदों 
में से एक है। घह निर्दिष्ट क्रिया के किसी अंश विशेष को ही व्यक्त करती है। 


न्‍्+ फू ०+ 


वह जीवन का कोई ऐसा प्रसंग उपस्थित करती है जो उसकी किसी एक 
परिस्थिति, अनुभूति अथवा घटना की नाटकीयता से, उसके सम्पूर्ण जीवन 
की एकरसता और परिपूर्णता की छाप पाठक के मन पर डाल देती है। 
मर मई झेर 
कल्पना की एकनिष्ठ प्राणमयता केवल कहानी प्ले नहीं, व्यापक रूप 
से सम्पूर्ण साहित्य के मौलिक आधार रूप में स्वीकार की जाती है। आज 
हम जीवन का जो भी रूप देखते हे; निश्चित रूप से एक दिन वह केवल 
कल्पना रही होगी। मनुष्य के जन्म को ही सत्य रूप बाद में मिला, पहले वह 
केवल कल्पता रहा होगा। कल्पना सत्य के कितने निकट होती है, इस वात 
पर प्रायः कम विचार किया जाता है। और कहानी के विषय में तो साधारण 
जन-समुदाय की यह एक एकान्त मान्यता सी बन गयी है कि उसकी सारी बाते 
मनगढन्त होती है। विचार करके देखा जाय, तो यह धारणा बडी अ्रामक है। 
केवल कला और साहित्य के आँगन में नही, जीवन के निखिल व्यापक चिरन्तन 
सत्य में भी कल्पना का अपना एक मौलिक स्थान है। जो का हम निरन्तर 
किया करते है, क्रिया का रूप तो उसे बाद में प्राप्त होता है, पर कल्पना 
हमारे मन में उसकी पहले से पहले हो जाती' है। हम घर से चलते बाद 
को हैँ, पहले निदिष्ट कार्य के सम्बन्ध में जो नाता प्रकार की बातें, संकल्प 
और उनके ऊहापोह सोचते है, उनके सबके मूल में केवछ एक कल्पना होती 
है। यहा तक कि मनोमंथन की सृष्टि ही कल्पना के आधार पर होतीं है। 
कहानी के मूल तत्वों पर विचार करते समय अभी हम इस निष्कर्ष 
पर पहुचे थे कि कथ। में कोई एक घटना रहती है। अब यहां प्रदइन यह 
उठता हैं यदि वास्तव मे कोई घटना कहीं हो गई हो और उसका यथा- 
तंथ्य वर्णन कर दिया जाय, तो क्‍या वह वर्णन मात्र कहानी हो जायगा 
स्पष्ट है कि नहीं होगा। बात यह है कि घठना तो उस क्रिया का नाम है, 
जिसमें तुलनात्मक दृष्टि से मनुष्य के सजग प्रयत्न का हाथ अपेक्षाकंत कम--- 
उसकी साधारण प्रकृति की असावधानता के मूल में निहित अदृष्टलीला 
का हाथ प्रमुख---रहता है। जिस प्रकार प्रत्येक घटना का स्थायी गुण उसका 
आश्चर्य्य-मूलक चमत्कार है, उसी प्रकार कहानी का स्थायी गुण भी उस्में 
निहित घटना की' कल्पता का विस्मय और चमत्कार है। अर्थात किसी घटना 


ध्ड 
_ऋषससक, च्ह्‌ 'अयाका 


का वर्णन क छा के उतना समीप नहीं, जितना इस पाए 4 जन्‍्गना ता वर्णन । 
तात्पय्य यह हुआ कि कहानी मानव जीवन की उस वस्तुस्थिलि, परिस्थिति 
और क्रिया-कलाप का वर्णन हे जो केवल घटना नहीं, उस सत्य की दाल्पना 
है, जो घटना के एकान्त क्रो3 में कही छिपा पक रहा गया है। 

कदाचित्‌ इसीलिए हिन्दी कथा के आदि प्राण दाता स्वर्गीय प्रेमचन्द जी 
ने कहा था--बूरा आदमी भी बिल्कुल बुरा नही होता। उसमें वही-न-कही 
देवता अवश्य छिपा रहता है। यह एक मनोवेह।निक सत्य है। इसी (छिपे 
सत्य) को खोलकर दिखा देना समर्थ आख्यायिका का काम है। 

उन्होंने उत्तम कहानी के छक्षण बतछाते हुए स्पप्ट कहा था--सदसे 
उत्तम कहानी वह होती हैं जिसका आधार किसी मनोदज्ञानिक सत्य पर 
होता हैं। 

यह मनोवैज्ञानिक सत्य क्या हे, अब हमे यह देखना है। सत्य से अभि- 
प्राय यह मनृष्य के उस बाहिरी रुप से हे, ज॑, छिपा नही रहता , पक, साकार 
और प्रत्यक्ष होता है। कर्म से वह प्रकट होता ह, सक्रियता से उसका आकार 
बनता है और संसार को बचत और कर्म से उसका अनुभव करने का अवसर 
मिलता है, किन्तु जीवन का सत्य केवक वचन और कम की सीमाओं में 
घिरकर---क़ैद होकर--नही रहता । बहुत कुछ तो वह मन के अन्दर ही 
बना रहता है। यहा तक कि कभी-कभी ऐसे भी अवसर जाते हे, जब जीवन 
का सत्य मनुष्य की मृत्यु से प्रकट होता है। 

महामना प्रेमचन्द जी के कथन का ऊपर जो उद्धरण दिया गया है, 
उसमें कथा के मनोवैज्ञानिक सत्य के केवछ एक रूप की भलक मिलती है। 
जिस प्रकार प्रत्येक बुरे आदमी के अन्दर एक भलाई का दर्णन उन्होंने किया, 
उसी प्रकार प्रकट रूप से भले आदमी का आकार>-प्रकार, वैभव और कीति 
रखने वाले व्यक्तियों के अन्दर कुछ ऐसी दुब॑त्तिया भी छिपी रहती है, जो 
साधारण रूप से प्रकट नहीं होती और बहुथा प्रकाश में भी नहीं आतीं। 
एक मुदा ढका हुआ, ऊपर से अभिराम रूप ही जिनका प्रकट होता है; पंर 
कितना आडबम्बर उनमें रहता है, कितनी बनावट के भीतर से वे भाकते 
है, कितने आवरणों के द्वारा वे प्रकाश में आ पाते है, इन सव अप्रकट किया 
छिपी हुई स्थितियों को साधारण रूप से प्राय. कम लोग ही जान पाते एं 


_वममकान्‍न्‍यी: (| ३4०४ 


मनोवैज्ञानिक सत्य मनुष्य के इस वास्तविक रूप पर प्रकाश फेंकने का एक 
मुख्य साधन है। यथा-- 

जलेबियाँ लेकर एक लटका सडक पर जा रहा था। वह साइकिल के 
धक्के से अचानक गिर प७।। साइकिल वाला इसकी परवा न करके जब आगे 
बढ गया, तब चौराहे के सपाही ने उसे रोक लिया। दोप किसका है, इससे 
वह अवगत थ।, क्योंकि सयोग से उसकी दृष्टि उसी ओर थी। लडके के पास 
लोग इकट्ठे हो गये, क्योंक उस के हाथ में चोट आ गयी, इस कारण 
बह रोने लूगा। उसके रुंदन ने सडक के निवासियों की सहानुभूति जगा दी। 
चौराहे का सिपाही जब साइकिल वाले को उस लडके के पास ले आया तब 
साइकिल वाले का ध्यान उस की ओर आऊक्ृष्ट हुआ। ओर यह जानकर 
उसने भी दुख प्रकट किया कि उँची नीची जगह में गिर पड़ने के कारण 
उस का हाथ टूट गया। तत्काल वह अपने अपराध के लिए उपस्थित 
लोगों से क्षमा मागने रूगा। पर अन्त में उस लब्के को उसे हास्पिटल ले जाना 
पदय। लड़के का हाथ टूट गया है और वह हास्पिटल चला गया है, दूसरी 
ओर जब इस बान की सूचना उसके पिता को [मली, तो वह भी हास्पिटक 
जा पहुचा। पर तब तक लड्के की बाह चदढ्ना दी गयी और उस पर पढ्टी 
बॉध दी गयी। थोडी देर में उसका दर्दे भी बहुत कुछ कम हो गया। वह 
चारपाई पर चुपचाप लेट रहा। इतने में उसका पिता वह आ गया। 
साइकिल वाले ने जब उस व्यक्षित को आते देखा, तो लडके के साथ-साथ 
वह भी रो पहा। 

बस घटना केवल इतनी सी है। अब इसका मनोवैज्ञानिक सत्य 
देखिये | साइकिलूवाके को बहिन का देहान्त हो चुका था, इसलिए अपने 
उस बहनोई के यहा उसका आना-जाना बहुत कम होगया था, जो यहा इस 
लडश्के के पिला रूप मे उपस्थित है। और ब रद वा जिसका हाथ उसने तोड़ 
डाला है उसका सगा भानजा है । वर्ष के बे बीत गये, पर उसको देखने का 
उसे अवसर नही मिला। इगीलिए बह अपने भानजे को पहचान न सका। 

इस घटना में कहाती का मुख्य तत्व इस भावना में निहित हे कि जिस 
पहचान के विना साइकिल बाछा अपने सगे भानजे का हाथ तो डाछता हूँ, 
वह मनृष्यत्व की पहचान से' आज कितनी दूर चली गयी है। जब तक बहू 


जज 


लऊलूठका उस साइकिल बाले का भानजा नही है, तब तक वह ऐसी लापरवाही 
से चलता है कि उससे छडके को धक्का रूग जाता और वह वही गिर पता 
है। उसके संस्कार इतने गिरे हुए हें कि पहले अपने ही धवके से गिरते 
हुए जिस अपरिचित बालक को छोड कर वह भाग गया है जब उसे ज्ञात 
होता है कि वह तो उसका भानजा है, तब वह अपनी इस असावधानी 
पर रो पडता है! अपने सगे भानजे और सडक पर जातें हुए अपरिचित 
लडके के साथ होने वाले व्यवहारों में जो अन्तर उस साइकिल वाले व्यक्ति 
के सस्कारों मे आ गया है, वह उस सभ्यता का प्रतीक है, जिसने आज साधा- 
रण मनुष्य को पशु की भाँति बबर बना डाला हैं। और इसी ओर 
संकेत करना इस घटना में निहित उस मर्मवाणी का मूल उद्देष्य हे, जिसे 
हम कहानी में मनोवैज्ञानिक सत्य कहा करते हे। 
समालोचना क्षेत्र मे अग्रणी आचार्य श्रीनन्‍्ददुलारे वाजपेयी का मत 
है---जिस प्रकार चित्र में सारा खेल रंखाओं और रगो का ही होता है, सारा 
प्रभाव साधनों पर ही अवलूम्बित रहता है, उसी प्रकार श्रेप्ट कहानी में 
ब्यंजक और व्यग्य का, कथा और उद्देश्य का, एकीकरण हो जाता है।....नवीन 
कहानी साध्य को साधन से, उद्देश्य को कथानक से एकदम अभिन्न बनाकर 
चलती है। और कभी कभी तो जीवन-घटना ही--कहानी की वस्तु ही-«- 
अपना साध्य आप बन जाती हैं। घटना के मर्म में ही उद्देश्य छिपा रहता हैं । 

वाजपेयीजी के कथन में कहानी के प्रच्छन्न उद्देश्य पर विशेष बल 
दिया गया है। क्योंकि एक लेखक का कथन है--- 

“अ्रत्येक कलाकृति एक न एक निगृढ नेतिक महत्व रखती हैँ । पर आप 
(कंपा कर के कल की इस) प्रकृति पर अपना कोई विधान न आरोपित 
कीजिए ।/* 

जीवन की वास्तविक भलक देने में कहानी की क्षमता साहित्य के अन्य 
अंगों की अपेक्षा कही अधिक है। कविता के सम्बन्ध से अँगरेजी कवि 
कारूरिज का ऊपर जो अभिमत व्यक्त किया गया है, वह उत्तकी भिन्न रुक्ि 
मात्र का परिचायक नही है; उसमे कविता की एक कलात्मक परम्परा का 


*एबरी वर्क अफ आर्ट हेज़ ए प्रोफ़ाउंड मारेछ सिगनीफ़िकेस बट 
यू मरट नाट टु इम्पोज योर ओन लॉज ऑन नेचर। 


न ९ 


भी आभास मिलता है। मनुष्य की आत्मा का मूल स्वर यों तो व्यापक रूप 
से समस्त साहित्य है ; किन्तु मनौवेगों का जो रूप शिल्प-विधान के माध्यम 
से कविता हारा प्रकट होता है, वह जितना अधिक स्थायी होता है, उत्तना 
ही चिन्तनहीन भी रहता है। कदाचित्‌ इसका कारण यह है कि सभ्यता के 
युग युगान्त पार कर डालने पर भी कविता का गेय गुण अब तक यथावत्‌ 
स्थिर है। जो कविता गेय नही हो पाती, वह स्मरण शक्ति की पावन गोद के 
आश्रय से भी वचित हो जाती है। और गेय बनी रहने के कारण वह परि- 
वर्तंनशील जीवन की नाना वृत्तियों पर विवाद, तर्क, मन्थन और चिन्तन 
प्रकट करने की अपनी प्रकृत सामथ्यं-सम्पदा भी खो देती है। 
सस्कृत-साहित्य के समर्थ विधायकों एवं आचार्यों ने साहित्य के सभी 
अगों में नाटक को जो श्रेष्ठ माना है, उसके मूल मे भी कदाचित्‌ उनका यही 
भन्तव्य रहा होगा कि प्रतिभा का उत्कृष्ट रूप प्रकट करने का जितना अवसर 
नाटक में रहता है, उतना केवल एक कविता में ही नही, किसी भी कलाकृति 
में सम्भव नही है । इस निष्कर्ष में यह बात छिपी रह गयी है कि गेय कविता 
के उत्कृष्ट रूप का निखिल सयीजन उन्हे नाटक मे प्राप्त हो जाता रहा है। 
अपने पूर्वाचार्य्यों की ज्ञान-गरिमा के समक्ष संविधान नतथिर हो कर 
भी उपयुक्‍त निष्कषं के विपरीत कहानी को जीवन के अधिक निकट मानते 
का एक आधार हैँ । और वह है जीवन के साथ कला का सम्बन्ध। एक युग 
था, जब कला को केवल मनोरंजन का साधन माना जाता था। झाज की' 
स्थिति उससे भिन्न है। आज तो हम कला की प्राणभयता को उपयोगिता की 
दृष्टि से देखे बिना जीवन से ही दूर जा पड़ते है। अतएवं विचारनें की बात 
है कि कहानी काव्य और नाठक की अपेक्षा किस प्रकार जीवन के अधिक 
निकट है । कविता से हम विचार चिन्तन की उतनी आज्ञा नही करते, जितनी 
उत्तरग-मानस के उद्गारात्मक उत्कर्ष की। नाटक में निस्संदेह विचार 
चिन्तन का अवसर रहता है। पर जीवन जिस शान्त प्रवाह के साथ गति- 
शीरू रहता है उसकी यथार्थ अभिव्यक्ति नाटक में सम्भव नहीं है । 
नाटक में उन घडियों के चित्रण के लिए कहाँ स्थान हैँ, जिनमे मनुष्य के 
हाथ-पैर तो काम नही करते, फर-उसका सानस उद्देलित रहता है। नाटक मे 
प्रत्येक दृढश्य क लिए एक-न-एक घटना ऐसी' चाहिए, जो इस पाथिव जगत 


बजे श ५ मन 


में सहज सम्भव हो। मानसिक विपर्यय की वह हाहाकारमयी मूक वेदना, 
जो वाणो पर आ हो वही पाती--नाठटक की सीमाओ में कह आ सकती है 
बहू अभिनय जो सवाद की सर्मवाणी पा नही सका, नाटक की मुखर सत्ता 
से कहाँ तक सरूग्न रह सकता है ? फिर नाटक में मनुष्य के साधारण जीवन 
की फॉकी के लिए कम, असाधारण जीवन की भलक के लिए निरद्िनत रूप 
से अधिक अवसर है। जीवन की क्षण-क्षण व्यापी अश्रु विगलित निःदवास 
वाणी को नाटक की नाटकीयता कितनी देर सहन करेगी ? नाटक तो उन्‍हें 
परिस्थितियों का दृश्यमान लेखन है, जिसका मनृष्य की कर्मधारा के साथ 
अविच्छिन्न सम्बन्ध हे। चिन्ता-धारा के द्वत्र ने उसकी स्थिति अभी नक 
नगण्य है। आज का जगत चाहे तो कह सकता है कि ऐसा मनृप्य किस कास 
का, जो अपना मनोभाव ही प्रकट नही करता | पर तब रहिमन निज मत 
की व्यथा मन ही राखौ गोप' का कवि भी ऐसे जगत के लिए किस काम का 
रह जायगा ? 

इस प्रकार कविता और ताटक, साहित्य के ये ढानो अग जोबन का 
सम्पूर्ण मर्म प्रकट करने में उतने समर्थ नहीं, जितनी कहानी । ओर उपन्यास 
का जगत तो इतना व्यापक और विस्तृत है कि उसमे हमारे क्षण-क्षण की 
जीवन व्यापी चिन्ताधारा ही नही, उसके निखिल क्ार्य-कलाप की अभि- 
व्यक्ति हो जाती है। और जहाँ तक चरित्र-चित्रण का सम्बन्ध है, कहानी 
की अपेक्षा उपन्यास कही अधिक समर्थ है। कहासी में चरित्र-चित्रण के लिए 
अवसर भी अपेक्षाकृत कम रहता ह। उसका कार्य चरित्र-सृष्ठि तक ही' 
सीमित है। चाहे सवाद हो या दृश्य का सजीव वणन, पत्र लिखा गया हो या 
वक्तव्य दिया गया हो , घर हो या सामाजिक सभा-भवन, प्लेटफ़ामम हो या 
रेल की यात्रा चल रही हो, कहानी हमारे जीवन के किसी अश विशेष कीं 
भलक ही उत्पन्न करंगी। या तो किसी घटना का रहस्योद्याटन करेंगी 
या किसी विशिष्ट चरित्र की सृध्टि करके उसकी एक साकार राबाक्‌ 
प्रतिमा हमारे सम्मुख उपस्थित कर देगी। किन्तु उपन्यास में 5९४, जीवन 
भर का चढाव-उतार ऐसे रूप में प्रकट होगा कि उसे चबर्ित के 
क्रम-विकास का सारा इतिहास ही मुखरित हो उठेगा। इरा प्रकार आकार 
की सीमा की दृष्टि से ही नहीं, उसके रिल्प-विधान की दृष्टि से 


भी कहाती में चरित्र-चित्रण के लिए उपन्यास की अपेक्षा कम अवसर 
रहता है। 

कहानी केवल घटनात्मक नही होती, वह चरित्रात्मक और मनोवैज्ञानिक 
भी होती है । बात यह हे कि घटनाएँ मनुष्य के जीवन मे ही नही होती, उसके 
मन में भी होती है । जो व्यक्ति बोलता कम, काम अधिक करता है, उसके 
मन में एक अछूग दुनिया वसी रहती है। प्राय' हम देखते हे कि चाभियों के 
जिस गुच्छे को खोजने में एक व्यक्ति ने अभी सारे घर से खलबली मचा 
रक्‍्खी थी, वह गुच्छा उसके उसी कोट के जेब मे पडा मिलता है जो वह पहने 
रहता है । प्रोसफेर गुप्त ने अभी अपने छोटे भाई से दवात मॉगी थी, पर जब 
वह उनके पास दवात लरंकर पहुँचाता है, तो वे कहते है कि मेने तो गोंद की 
बॉटल माँगी थी। नणी रामप्रसाद के पास आज एक लिफाफा डेड-लेटर 
आफिग से लौटकर आया है। उसके अन्दर जो पत्र है, वह उन्ही के हाथ का 
लिखा हुआ है। छिफाफे के ऊपर उनका नाम और पता भी लिखा हुआ 
है। फिर भी आच्चय है कि बह उन्ही के पास कंसे लौट आया। उल्लट-पुलट 
कर उसे ध्यान से देखते हे तब पता की ओर जो उनकी दृष्टि जाती हैं तो 
यह देख कर अवाक रह जाते है कि जिन बन्धु को उन्होंने यह पत्र भेजा था, 
पते पर नाममात्र केवल उनका है। शेष भाग की पूति से उन्होंने स्वयम्‌ अपने 
घर का पता लिख दिया है ! 

इस उदाहरण से यह स्पष्ट विदित होता है कि मनुष्य के बाहर के 
जगत्‌ से उसके भीतर का जगत्‌ स्वंथा भिन्न हे। और इसी भिन्नता को प्रकट 
कर देता मनोविश्लेषण का मुख्य धर्म हैँ । 


[२ | 
कहाती-कछा की तत्वदर्शी, उसके जिल्पविधान के समीक्षक, इस 
विषय में प्रायः एक मत हे कि हिन्दी कहानी के आधनिक रवरूप पर जग रजी 
फ्रेंच तथा रूसी कहानियों का व्यापक प्रभाव पथ्ा है। परन्तु यह बात जितनी 
विचित्र और भनोर॑ंजक हूँ कि कथा-साहित्य का मुख्य जनक हमारा वेश 
भारतवर्ष ही है; और आधुनिक सभ्यता के मूल स्वर की दृष्टि से उसका 
सत्र से अधिक गरिमामय इतिहास कथा-साहित्य का ही है । 


लगभग बीस वर्ष पूर्वे की बात हूँ कि आचार्य श्री हजारीप्रसाद हिवेदी ने 
एक पत्र में, इस विषय पर एक बहुत गवेषणापूर्ण लेख लिखा था। उसके 
अनुसार मिस्टर बेनफी ने, जो साहित्य के ऐतिहासिक शोध में अपना एक 
महत्वपूर्ण स्थान रखते है, सारे ससार की कहानियों की आधार-भूमि भारत- 
वर्ष को ही माना है ... । मिस्टर विण्टरनित्स ने अपने सम प्राबलेम्स 
आँव इण्डियन लिट्रेंचर' में लिखा है कि पचतंत्र' संसार के साहित्य का सब 
से अधिक मनोमोहक अध्ययन है। और मिस्टर वुल्फ ने पचतत्र' के अरबी 
भाषा के अनुवाद को जमन भाषा में अनुवादित करते हुए लिखा हे कि संसार 
की सर्वाधिक भाषाओं के अनुवादित साहित्य में वाइबिल के बाद प्ततत्र' 
का ही स्थान है। 
इस प्रकार स्थिति यह है कि हम कहते हे कि हमने उनसे सीखा और वे 
कहते है कि हमने आप से पाया। अब प्रइन यह है कि इन दोनों कथनों का 
मूल आधार क्या हैं और साथ ही इस बात पर भी ध्यान देने की आवश्यकता 
हैं कि पंचतत्र को जो इतना और गौरव मिला, उसमे प्रचार काल की 
स्थिति क्‍या थी। 
द्विवेदीजी ने इस विषय में भी कुछ तथ्यपूर्ण प्रामाणिक बाते कही हैं। 
उनके मत से पंचतंत्र' का रचना-काल अभी तक निदिचत नहीं हुआ, परन्तु 
इसका सबसे पहला अनुवाद पहलवी भाषा मे बादशाह नौशेरवॉ (सन्‌ 
५३१-५७९) ने हकीम वर्जों से करवाया था। तदनन्तर ५७० ई० में 
सीरियन भाषा में इसका अनुवाद हुआ । इसके परचात्‌ अरबी, जमेंन 
भाषाओं के साथ-साथ चेखोस्लोवाकिया, ग्रीक, इटली आदि सभी पादचात्य 
देशों की भाषाओं में इसके अनुवाद हुए। बारहवी शताब्दी में रोबीजोएक 
ने इसका अनुवाद हिल्रू भाषा मे किया। तदनन्तर हिब्ू भाषा के अनुवाद से 
लैटिन भाषा मे जी अनुवाद हुआ, वही कालान्तर में सब से अधिक लोकप्रिय 
माना गया। 
यह बात कम आहइचये की नही हैं कि इस अवधि में पंचतत्र का ऐसा 
विल्वव्यापी प्रचार हो गया ! जिस युग में साहित्य के प्रचार के साधन आज 
क्री अपेक्षा बहुत सीमित थे, अकेले इसी ग्रन्थ का इतना समादर और प्रचार 
कंसे हो गया ! कहना न होगा, पश्चिम और पूर्व की सभ्यता और सस्क्ृति में 


आकाद्य और पाताल का अन्तर हैँ, फिर भी उन देशो ने इस ग्रन्थ को इतना 
गौरव क्यो प्रदान किया, जो प्राच्य आदर्शो से दूर ही दूर रहते हे और उन्हें 
असाधारण अव्यावहारिक और मानव-जगत के लिए एक अद्भुत चमत्कार 
के रूप में देखते है। ध्यान से देखने और विचार करने पर, अन्त मे, हम इस 
निष्कर्ष पर पहुँचते हे, जो साहित्य अखिक जगत और उसमे फूलीफली 
मानवता को सार्वभौमिक और सर्वकालीन--अपेक्षाकृत सर्वव्यापक-- 
विचार, दृष्टि और प्रेरणा देता है, उसकी सुधा-धारा सतत प्रवाहिनी और 
नवनवोन्मेषिणी होती है। जाति और समाजगत भेदाभेद उसके लिए 
क्षणस्थायी रहते है । वह सामूहिक रूप से एक ही प्रकार के आनन्‍्दसन्दीपन 
से समस्त विश्व और प्रकृति को अनुप्राणित करता रहता है। जिस प्रकार 
की वेदना से प्राच्य व्यक्ति व्यथित, उन्मन, व्याकुल, सन्तप्त और पीडित 
रहता है, उसी प्रकार की वेदना से पाश्चात्य व्यक्ति ! जैसे सुख-दुख, राग- 
विराग, ईर्ष्या-देष, सम्पर्क, आकर्षण और मिलन ग्राच्य मानस को प्रभावित 
करते है, वैसे ही पाइ्चात्य मानस को। तात्पर्य यह कि एक ही प्रकार की 
चिन्ताधारा समस्त मानव प्रकृति के मानसिक स्वास्थ्य का प्रतिनिधित्व 
करती रहती हे। देश और काल, युग-परिवतंन के प्रभावों में कोई व्यापक 
और मौलिक भेद नही उत्पन्न कर पाते। जो भेदाभेद कभी भलकते भी हे, 
ध्यान से देखा जाय, तो वे क्षणस्थायी, कृत्रिम, आरोपित और मिथ्या होते है । 

सस्कृत-साहित्य के रीति-प्रन्थों मे अग्निपुराण का एक महत्वपूर्ण स्थान 
है। उसमें कथा के जो लक्षण दिये गये है, उनमे कहानी के शिल्प विधान का 
एक परम्परागत आभास तो मिलता ही है; साथ ही उसके क्रम-विकास पर 
भी पर्याप्त प्रकाश पड जाता है। उसके अनुसार कथा से लेखक के वश का 
स्तवन और उसकी घटना कन्याहरण, युद्ध और विप्ररूम्भ आदि विपत्तियों 
से युक्त होनी चाहिए। 

कहा जाता है कि आज का युग मुख्य रूप से ज्ञान विज्ञान का युग हे, 
और साहित्य की उपयोगिता की दृष्टि से यह गद्य का युग है। किन्तु भारतीय 
साहित्य का आदिकाल पद्चमय रहा हैँं। कहना न होगा, वेदों की ऋचाएं 
पद्य में है। ऋच दब्द का अर्थ ही पत्चय है। इसी कारण कहानी का जन्म 
संस्कृत-साहित्य में पहले पहल पद्य में हुआ। यद्यपि ऐसा नहीं है, वेदिक 


ब्न्ब पर हँ. +त 


5 


साहित्य में गद्य का अभाव रहा हो। तत्कालीन ब्राह्मण ग्रन्थ पद्य में हो लिखे 
गये है। कादम्बरी गद्य-साहित्य के उत्क्षं की पताका आज भी फहरा रही है। 
ऊपर अग्नि-पुराण मे आख्यायिका के जो लक्षण दिए गए हु, उनका 
सम्बन्ध प्रबन्ध काव्यों मे निहित आख्यायिकाओं के गुणों के साथ विशेष 
और निकटतम जान पडता है । आख्यायिका मे लेखक के वश का स्तवन उस 
परम्परा को व्यवत करता है, जिसमे प्रबन्ध काव्यों के आदि में कवि अपने 
आश्रयदाता राजन्य वर्ग का स्तवन करने के साथ-साथ अपने वश 
का उल्लेख करने मे कोई सकोच नही करता था। यह परिपाटी किसी न 
किसी रूप में आज भी विद्यमान है। आज का लेखक भी, हम देखते है, साहित्य 
ग्रन्‍्थों के समर्पण मे कृतज्नताज्ञापन तथा भूमिका में अपने सम्बन्ध की बात, 
अपने जीवन की बात, अपने साहित्य की देन में, अपने 0र्वजों के गुण, 
प्रकृति, स्वभाव का उल्लेख बड़े गवे के साथ करता है। कंबल शैली, दिया 
और प्रकार बदल गया हे। अपने आश्रयदाता के साथ-साथ प्रकारान्तर से 
अपना और अपने अहम्‌ का उल्लेख किसी न किसी रूप से आज भी प्रचलित है । 
अग्नि पुराण के अनुसार यद्यपि आज का आख्यायिका लेखक अपने वध 
का स्तवन नही करता, किन्तु यह ती निविवाद रूप से कहा जा सकता हे कि 
अपनी मान्यताओं के स्तवन के साथ दु्बंढताओं का मनोहर निरूपण 
स्वनिभित प्रसंगों के द्वारा उसकी कथाओं में निश्चित रूप से रहता हैं। 
यह स्थल आज की कथाओं के उदाहरण दे-देकर उनके लेखकों के अहवाद 
की मर्मवाणी व्यक्त करने का नही है। वहाँ हम केवल यही कहना चाहते हे 
कि अग्नि पुराण मे, कथा के लक्षणों में, लेखक के वश के स्तवन का जो उल्लेख 
किया गया हैँ, उसका क्रमागत सस्बन्ध हम आज भी कथा-साहित्य में स्पष्ट 
रूप से देख सकते हे। 
अब हमे देखना यह है कि अग्निपुराण के अनुसार कथा के शेष लक्षण 
आधुनिक कहानी मे किस घरातल, स्तर और विकास के राथ विद्यमान 7 
प्राचीन काव्यो में युद्ध-वर्णन की जो प्रधानता है, उसका साहित्य के 
मूल उपादानों के साथ बढ़ा ही घनिप्द सम्बन्ध है। पशुबल्ल के साथ 
बृद्धिबल का, सत्य और न्याय पक्ष के साथ असत्य, अन्याय और दुराभ्रह पक्ष 
का, भौतिक स्वार्थों के साथ आध्यात्मिक उत्कर्ष किवा परमार्थ का, साधु 


जल ५ | ब्न्ड 


और तपस्वियों के साथ दुष्टों और धूर्तों का; इसी प्रकार देवताओं के साथ 
राक्षसों का सम्पर्क, सम्बन्ध, संघर्ष, शक्ति परीक्षण और युद्ध जेसे हमारी 
सभ्यता के इतिहास के विकास का एक अनिवार्य विषय हे, वैसे ही वह कथा 
साहित्य के क्र-विकास का भी एक आधारभूत अग है। कदाचित्‌ इसीलिए 
प्रबन्ध काव्यों के ऐतिहासिक आधारो के सिवा मनुष्य के साधारण जीवन में 
भी युद्ध का स्थान---सामाजिक विषमता तथा मनोगत अन्तेंद्रन्द्न के रूप 
मे---सवंथा निश्चित और एक चिरन्तन सत्य बन गया है। 

परन्तु अग्नि-पुराण में जिस प्रकार के युद्ध को कथा का एक गुण माना 
गया, राजनीतिक प्रभावों के साथ अक्षुण्ण होने के कारण कथा-साहित्य में 
वह बहुत सीमित रह गया है। उसका स्थायी और व्यापक नाता तो मनुष्य 
के मन मे निरन्तर चलनेवाले युद्ध और अन्तर्मंन में निहित जीवन में व्यापक 
रूप से फैजे अन्तहंन्द्र से है। 

अग्नि पुराण के अनुसार कहानी का दूसरा गुण है विवाह मे कन्‍्याहरण 
की विपत्तिजनक घटना। यह मान्यता सामन्‍्त युग की देत जान पठती है। 
सुभद्राहरण, सयोगिताहरण जैसी घटनाएं पुरुषार्थ की दुष्टि से विशेष 
महत्त्व की मानी जाती थी। पर, न कवर राजन्यवर्ग में वरन्‌ आज की 
सभ्यता के अनुरूप विकसित समाज में भी इस प्रकार का नारीहरण आज 
सम्भव नही है। हाँ, इस स्थलरू पर यह अवध्य विचारणीय है कि जैसे उस 
समय की कथाओं मे कन्‍्याहरण को नायक की वीरता का एक विशेष अगर 
माना गया, बसे ही आज प्रेम-कथाओं में भी उन परिस्थितियों के लिए एक 
निद्चित स्थान बन गया जो पहले तो वैवाहिक प्रसंगों, सामाजिक कुरूतियों, 
रूढ़ियो और अन्ध परम्पराओं द्वारा एक महाविपत्ति खडी कर देती है, पर 
अन्त में कोई ऐसी घटना या परिस्थिति उत्पन्न हो जाती है कि विपत्ति के 
बादल अनायास टूट जाते हे। भाग्यवादी लेखकों के हाथ में यदि कहीं इस 
प्रकार की घटनाएँ जा पःती है, तो वह नायक की विफलता में एक ऐसे 
हाहाकारपूर्ण असहनीय दारुण दुख-सागर का चित्र अंकित कर देतन है कि 
पाठक का हृदय सहसा कम्पित हो उठता है। वह विचारा सोचता रह जाता 
है कि दुःखों का भोग जीवत का एक निर्चित' चिरन्तन सत्य है। असफलता 
जीवन में अवश्यम्भावी है'और विपत्ति के आकस्मिक हस्तक्षेप और विरोध 


हनन ९ पा 


के आगे व्यक्ति का सारा प्रयत्न, उद्योग और पुरुषार्थ सर्वेवा असहाय, हीन 
और व्यर्थ है। 

यहाँ कन्याहरण तथा विवाह-सम्बन्धी घटनाओं के साथ 'विपत्ति' शब्द 
का योग भी कम विचारणीय नही है। काव्य हो चाहे नाटक अन्त में विजय, 
सफलता और एक चिरस्थायी सुख-शान्ति की स्थापना भारतीय वाग्मय का 
एक स्थायी आदर्श तथा गुण रहा है। मनुष्य का जीवन सुखभय हो, इसी 
एक महान उद्देश्य के साथ, उसमें समस्त कहाओ का निरूपण किया गया 
है। भगवान राम चौदह वर्ष तक वनवास करते हे। यह प्रसंग चाहे जितना 
दुखद हो, किन्तु अन्त में वे लौटते और अयोध्या में शान्तिपूर्वक राज्य भी 
करते है । तपस्वियों की साधना में विष्न डालनेवाले चरित्रों के साथ राम 
लोहा लेते है। रावण छल-प्रपंच के साथ सीता को हरण कर छाता है, किन्तु 
अन्त मे दैत्य वश का सहार होकर रहता है। दुर्योधन राज्य-भोग के प्रति 
एक लोलुप दृष्टि रखता है। ऐश्वर्य के प्रति उसे बडा मोह है। वह राग-द्रेष' 
की मूर्ति है। प्रतिहिसा की मात्रा भी उसमें अधिक है । उदात्त विनोद को 
तत्काल हृदम्मगम कर उसका उचित समादर करने की उच्च मभ्यता का भी 
उसमे अभाव है। इसके विपरीत युधिष्ठिर मन, बचन और कर्म की एकता में 
एकरस, स्वाभाविक रूप से उदार, कप्ट-सहिष्णू और धर्मपरायण हे । अधि- 
कार स्थापन और कर्म निरूपण के नाम पर युद्ध होता है। इतना भयानक 
और विनाशकारी युद्ध कि काल की रूघुतम सीमा की दृष्टि से देखा जाय, 
तो अठारह दिनों की अल्प अवधि में इतना व्यापक महायुद्ध आज के इस 
वैज्ञानिक युग से कम देखते सुनने को मिलता हें। ऐटम बम के प्रयोग अथवा 
किसी एक पक्ष पर प्रलयकर अ।क्रमण की बात दूसरी है। तात्पर्य यह कि 
महाभारत जैसे युद्ध हुए, पर उसका अन्त न्याय के पक्ष में ही हुआ। केबल 
इसलिए कि सत्य और न्‍्याय--मानवात्मा की आदर्श सुख शान्ति इन्ही 
दो आधारों पर टिक सकती है। | 

किन्तु यह विपत्ति क्यों आती हूँ ? फिर वह अन्य अवसरों पर भरे ही 
आये, पर यह क्या है कि वह विवाह जैसे आनन्द-महोत्सव के समय जाये ! 
क्योंकि वह नित्य और निर्चित है। मतृष्य के जीवन में यदि कभी बिपत्ति 
न आये, तो जीवन की निश्िल महत्ता ही मूक और बधिर हो जाय. मनुष्य 


- १७ «- 


के जीवन में यदि दु.ख न हो, तो सुख-साफल्य की मन्द मन्द शान्त प्रवाह- 
मयी मन्दाकिनी ही सूख सूखकर एकसेकत राजमार्ग बनकर रह जाय ! 
इसीलिए बिपत्ति निश्चित है। जीवन को उससे मुक्ति कैसे मिर्ू सकती 
है! जीवन को समभने के लिए उसकी अपनी उपयोगिता भी तो है। 

इस स्थल पर एक कथा-प्रसंग का स्मरण आ रहा है। लगभग एक 
सहस्त वर्ष पूर्व छायोन्स नगर मे, एक जगह पर, एक भोज दिया गया। उसमें 
बडे धनी-मानी व्यक्ति सम्मिलित हुए। वार्ताक्ाप के सिलसिले में पौराणिक 
कथाओं के चित्रों के सम्बन्ध मे विवाद छिड गया। अतिथियों में जब यह 
बिवाद शिष्टता और संयम का अतिरेक करने लगा, तो गृहस्वामी ने अपने 
एक भुृत्य को बुलाया और उस चित्र के विषय में समभाने का आदेश किया। 
भृत्य ने स्पष्ट, सक्षिप्त, सरल और विश्वसनीय भाषा में उन चित्रों का मर्मे 
समझा दिया। उसका उत्तर-सुनकर सब लोग आइचर्य से चकित हो उठे 
और सारे विवाद का अनायास अन्त हो गया। 

उसी समय एक अतिथि ने उस भृत्य के प्रति सम्मान प्रदर्शित करते 
हुए पूछा--- महाशय, में यह जानना चाहता हूँ कि आपने किस स्कूल में 
शिक्षा प्राप्त की है ? 

नवयुवक भृत्य ते उत्तर दिया---यों तो मेने कई स्कूलों में शिक्षा 
पायी है। परन्तु विपत्ति” के स्कूल में मैने अध्ययन करने में सबसे अधिक 
समय व्यतीत किया है!” 

यह तवयुवक भृत्य उस समय का एक अत्यन्त दीन-हीन किन्तु 
अन्तिकारी लेखक जीन जेक रूसो था। 

इस प्रकार अग्नि पुराण में कथा के उपर्युक्त लक्षण मे विपत्ति' शब्द अपने 
स्थान पर बडा महत्त्व रखता है। आज की कहानी के मूल स्वर के साथ 
उसका अटूट सम्बन्ध है। विपत्ति का स्कूल ही कहाची का वास्तविक स्कूल है। 

[३ | 

कहानी को हम कई अंशों में और कई प्रकार से विभाजित कर सकते 
है। सब से सरल विभाजन है किसी भी क्रिया की भाति--आरम्भ, मध्य 
और जन्त। इसी को हम जन्म, विकास और परमगति भी कह सकते हैं। 

पहले प्रारम्भ को लीजिए। कहानी का प्रारम्भिक गुण है उत्सुकता। 

२्‌ 


> रै८ -« 


अर्थात्‌ उसका प्रारम्भ ऐसे ढंग से होना चाहिए कि उसका साधारण धर्म, 
स्वाभाविकता और सप्राणता उसमे सर्वेथा सुरक्षित हो। ऐसा न प्रतीत हो 
कि हम कोई (कृत्रिम ) कहानी पढ रहे हैं। वरन्‌ कुछ ऐसा प्रतीत हो कि अवश्य 
ही ऐसी घटना कही हुई है। कही ऐसा सन्देह भी न हो कि इसके अन्दर 
जिन लोगों की बात चल रही है, वे इस जगत के नहीं है। मन में कही यह 
शका भी न उपस्थित हो कि समाज में ऐसे व्यविति तो कही दिखाई नही देते। 
प्रायः नये लेखक कहा करते हे कि कहानी में रिखना तो चाहता हूँ, 
पर यही मेरी समझ में नही आता कि उसे आरम्भ कैसे करूँ। वे इतना भी 
नही सोचते कि कहानी को किसी भी परिस्थिति से प्रारम्भ किया जा 
सकता है। यथा--- 
आज जब मेरी आँख खुली तो क्या देखता हूँ कि सामने वाले मकान की 
छत की मुडेर पर कबूतर बेठा हुआ गुदुर गूं कर रहा है। 
अब आइए मध्य मे। कहानी का मध्य उसकी विकसित अवस्था का 
द्योतक है। और सब से सुन्दर कहानी वह होती है जिसकी घटना अथवा 
समस्या में एक प्रकार का संशय और अससजस रहता है। उसकी दुविधा में 
इतनी त्वरा रहती है कि पाठक कहानी पूर्ण होने से पूर्व ही परिणाम जानने 
के लिए अधीर हो उठता है; किन्तु कथा के मध्य मे कहीं कोई ऐसा संकेत 
भी नही रहता कि अन्तिम परिणति के पूर्व कही भी उसका भेद खुल सके। 
कहानी के अन्त की स्थिति सब से अधिक सुकुमार होती है। प्राय: 
बडे अतिष्ठित लेखक सुन्दर-से-सुन्दर कहानी का अन्त करने में गड़ब ड़ा जाते 
हैं। बात यह है कि मनुष्य जैसे अन्त के क्षण परम गति को प्राप्त होता है, 
वैसे कहानी का अन्त उसके अन्तराल में निहित एक ऐसा मर्म स्वर होता हैं 
जो इसी अवसर के लिए सुरक्षित रहता है उससे पूर्व सर्वथा प्रच्छन्ष रखा 
जाता है। बह ऐसे विस्मय के साथ फूट पडता हैं कि पाठक वाह-वाह कह 
उठता है ! कहानी यदि घटनात्मक होती है, तो पाठक का हुदय उस अखिल 
सृष्टि और प्रकृति में निहित नियति के कठोर व्यग्य से यकायक तिलमिला 
उठता है। वहू मन-ही-मन इस जगत में चतुर्दिक व्याप्त एक रहस्य का 
अनुभव करने रूगता है, मानो अब तक वह उससे सर्वथा अपरिधचित और 
अनभिन्ञ बना रहा है। इस प्रकार के अन्त का परिणाम प्रायः ऐसा भी होता 


नल श्र >« 


है कि वह भविष्य के सर्वेधा अनिश्चित फलाफल को भोगने के लिए पहले 
से कही अधिक सावधान और सतर्क हो उठता है । 

दूसरे ढेंग से हम कहानी को--कथानक, पात्र और दृश्य--इन तीन 
भागों में विभाजित कर सकते हे। 

कथानक को वस्तु तथा वृत्त के अतिरिक्‍त अँगरेज़ी में प्लाट कहते हें, 
कोई भी अप्रत्याशित क्रिया, चाहे वह मन की दुनिया में हो, चाहे भौतिक 
जगत में, यदि भनोवेगों और समवेदनाओ का स्पर्श करके पाठक के मन में 
परम हादिकता के साथ स्पत्दन और एक प्रकार की मधुरता तथा रुचिरता 
उत्पन्न कर दे, चाहे वह आइचण्येंजनक या आह्लाद पूर्ण हो, चाहे आधात- 
मूलक, घटना होती है । इसी घटना की परिस्थिति का दूसरा नाम कथानक है। 
उसकी संयोजना के मूलाधारों का नाम पात्र और उसकी रूपात्मक गतिविधि 
और कार्य-कलाप का नाम दृश्य है। कहानी के प्राण को हम कथानक, करमेंन्द्रियो 
को पात्र और उनके शरीर को दृश्य कह सकते हे। 

बहुधा हम देखते हैं कि जिस कहानी में कथानक नहीं होता, वह निष्प्राण 

होती है। और जैसे इन्द्रियों के बिना भी कोई क्रिया सम्भव नही। पात्रों के 
बिना कोई खेल हो नहीं सकता, इसी प्रकार प्रत्येक क्रिया की रूपात्मक 
सत्ता सदा एक न एक दृश्य उपस्थित करती रहती है। प्राण और इन्द्रियों 
का अस्तित्व शरीर के बिना सम्भव नही, क्यींकि प्राण और इन्द्रिय, अन्ततौ- 
गत्वा शरीर में ही विरूय' होती हें, वेसे ही परिस्थितियों और पात्रों का 
अस्तित्व दृश्य के बिना सम्भव नहीं। इस प्रकार कथानक, पात्र और 
दृश्य का अन्यीन्याश्रय सम्बन्ध है। एक के बिना अन्य दोनों व्यथे हों 
जते हैं। 

कथानक चार प्रकार के होते हे--घटना प्रधान, चरित्र प्रधान, भाव 
प्रधान और वर्णनात्मक | जासूसी कहानियों की गणना घटना प्रधान कहानी 
में की जाती है। चरित्र प्रधान कहानी में चरित्र के विकास पर अधिक ध्यान 
विया जाता है। भाव प्रधान कहानी में घटना और चरित्र पर उतना ध्यान 
नही दिया जाता, जितना भावुकता पर। उसमें यदि कोई घटना भी होती हैं, 
तो उसकी परिणति भावुकता से होती है। बर्णनात्मक कहानी मे वर्णन की 
चारुता की ऐतिहासिकता पर विशेष ध्यान रक्‍्खा जाता है । 


के २ / व 


इस प्रसंग में इतना और स्पष्ट कर देना आवश्यक हो गया है कि घटना- 
मूलक कहानी के सारे कार्य पात्रों की इन्द्रियों करती है। या तो उनके हाथ- 
पैर काम करते हैं, या वे वार्ता से काम लेते है । किन्तु भावात्मक तथा चरित्रा- 
त्मक कहानियो के अधिकांश कार्य-कलाप मन-सम्बन्धी होते है। मानसिक 
उद्देलत और सानसिक-विपर्यर्य ही उत्तका मूल स्व॒र होता है। ऐसी कहानियां 
मनोविश्लेषण पद्धति द्वारा लिखी जाती हे। 

यों तो जीवन की प्रत्येक भौतिक क्रिया दृश्यात्मक होती है। किन्तु 
कहानी में दृदय की जो सत्ता है, उसका एक विशेष अभिप्राय है। बात यह है 
कि एक व्यक्ति जब दूसरे से मिलता है, तब उससे कुछ-न-कुछ अवद्य कहता 
है। इन कथनों में जो विचार-विनिमय होता है, उसे कहानी की भाषा में 
कथोपकथन कहते हे। कथोपकथन-विहीन दृश्य मूक होते हे। यों मृक 
दृदयों की कहानी भी हो सकती है, पर वह केवल वर्णनात्मक होगी। उसमे 
या तो कार्यकलाप की चर्चा रहेगी, या सम्बन्धित पात्रों के मत का भेद बतलाया 
जायगा। पर इस प्रकार के दुधयों में दाटकीय परिस्थिति का सर्वथा अभाव 
रहेगा और जिन कहानियों में वाटकीय परिस्थिति का अभाव होता है, 
उनमें जीवत का कोई भी मनोवेग चरम परिणति तक नहीं पहुंच पाता 
और कहानी सफलता के चरम बिन्दु को प्राप्त करने से वंचित हो जाती है। 

कहानी के शिल्प-विधान की चर्चा के समय, हमे एक बात नहीं भूलनी' 
चाहिये। वह यह कि कहानियों का जन्म पहले हुआ है, उसके शिल्प-विधान 
की रचनात्मक व्याख्या उसके बाद। अर्थात्‌ कहानी के शिल्प-विधानों की 
मूलरूप से कहानी तने ही जन्म दिया है। यह बात दूसरी हे कि आज शिल्प- 
विधानों का कहानी-लेखन पर नियन्त्रण चलने रूगा है। 

यहां इस कथन का अभिप्राय कथाकार की उस प्रतिभा को स्मरण और 
स्वीकार करना है, जिसकी रचना से कथा के शिल्प-विधान में निरन्तर 
विकास होता रहता है। रचना का मुख्य गुण शैली है। शैली से ही मनुष्य 
का व्यक्तित्व प्रकट होता है। इसीलिए शैली को मनुष्य का अ्रतिरूप माना 
गया है।* झौछी वास्तव में उन गुणों का नाम है, जो किसी रचना, शिल्प 


+'स्टायल इज दी मेन।' 


और व्यक्ति को, उसके विशिष्ट गुण, कर्म और स्वभाव के कारण उसे पूर्व- 
कालीन वर्ग, जाति और श्रेणी से पृथक, मौलिक और श्रेष्ठ बनाती है। 
शली प्रतिभा की वह झलक है, जी किसी रचनाकार को साधारण कोटि 
से उठाकर असाधारण कोटि में छाकर उसे खडा कर देती है। शैली नवनव 
कल्पनाओं के भीतर से उठने और जन्म लेने वाले उस मूं प्रयोग का नाम है 
जो जीवन के हर क्षेत्र में सफलता के साथ नेतृत्व करता है। 

बदली फी दृष्टि से यदि हम कहानियों का विभाजन करें, तो वह इस 
प्रकार होगा-- 

१. वर्णनात्मक 

२. कथोपकथन प्रधान 

३. आत्मकथन प्रधान 

४. डायरी प्रधान 

५. पत्र प्रधान 

बर्णनात्मक्‌ शैली में घटना तथा परिस्थिति का सारा वृत्तान्त इतिहास 
की भाति वर्णन कर दिया जाता है। यह वर्णन जितना सजीव और 
चित्रात्मक होता है, उतना ही रोचक बन जाता है । पहले पहल इसो शैली 
पर अधिकांश कहानियाँ लिखी जाती थी, पर इसका अधिक उपयोग अब 
कहानी की अपेक्षा उपन्यास में अधिक होता है। वातावरण का सजीब 
इसी शेल्ली पर आधारित रहता है। भाषा सररकू हो और वाक्य 
बहुत बडे न हों, भावों में |मर्म-स्परश की क्षमता और विनोद की ऋलक हो तो 
इस शैली की कहानियों मे बड़ा प्रभाव उत्पन्न किया जा सकता है। 

कथोपकथन कहानी का मूल स्वर होता है। एक विज्ञ का कथन हैं कि 
कहानी सुन्दर चाहे जितनी हो, पर कथोपकथन के बिना गुंगी रहती है। 
कथोपकथन पात्रों के व्यक्तित्व और उनकी सस्क्ृति के अनुरूप रहना चाहिये । 
क्योंकि सभी आदमी एक ही प्रफार से नहीं बोलते, सबकी भाषा भी एक 
सी नहीं होती। 

आत्म-कथन प्रवान शैली में हादिकता की प्रधानता रहती है। उसमें 
सजीवता स्वाभाविक रूप से स्वत. बढ जाती है । पाठक के मन से यह बात 
हठाये नही हटती कि छेखक मानों अपना ही जीवनचरित लिख रहा है। 


२२ 


यही इस शैली का सबसे बड़ा गुण है; और यही इसकी सबसे बडी दुर्बछता भी । 
बात यह है कि हादिकता के कारण जहा इस शैली की कहानी अपेक्षाकृत 
अधिक सजीव हो जाती है, वहा प्रायः ऐसा भी होता है कि भिन्न प्रकार का 
चरित्र-निर्वाह करते-करते लेखक अनायास अपनी प्रव॒ुति, अपना स्वभाव 
और अपनी रुचियों की भंलक डालकर चरित्र-चित्रण की एकनिषठ सफलता 
के लिए हानिकर और अविश्वसनीय बन जाता है। 
डायरी प्रणाली से लिखी जाने वाली कहानियाँ रोचकता की दृष्टि 
से आत्मकथा शैली का प्रभाव पा जाती है। इस प्रकार की कहानियों मे 
बहुधा उसी नायक के जीवन की झलक मिलती है, जो या तो इस जगत से 
विदा ले चुकता है, या इस संसार के सामाजिक सचर्ष से ही अपने आपको 
दूर फेक देता है। जिस कथा' को उसे कर्म की लकीरो से लिखना चाहिये 
उसे वह कागज पर उतार कर संतोष कर लेता है। इस शैली में वही कहानियाँ 
अधिक सफल होती हें; जिनका अन्त दुःखमय होता है । इसकी सुखान्त 
कहानियाँ बहुधा निर्जीव और हलकी होती हे । डायरी के अपने विशिष्द 
लक्षणों के निर्वाह मे यदि वे सफल भी हुई, तो वे घटनाओं की संयोजना 
में गडबडाकर अपना प्रभाव खो बैठती हें। 
पत्र-दली की कहानी मे एक तो दृश्यात्मक गुणों का अभाव रहता है; 
दूसरे नाटकीय प्रभाव भी उसमें उतनी रुचिरता से नहीं आता, जितना 
वर्णेनात्मक और कथोपकथन की मिश्चित शैछी वाली कहानी में। विश्व- 
साहित्य मे आज जो कहानियाँ अमर मानी जाती है, वे प्रायः इसी मिश्चित 
दोली की देन हे। 
विषय की दृष्टि से अब तक निम्न प्रकार की कहामिया लिखी गई हैं 
प्रेम-कहानियाँ 
, ऐतिहासिक कहानियाँ 
जासूसी कहानियाँ 
. जीवन-रहस्य पर प्रकाश फेकने वाली, आश्चर्थ्य कहानियां 
. व्यंग तथा हास्य कहानियों 
, आदर्श कहानियाँ 
मनोवैज्ञानिक कहानियाँ 


द॑ ऋ#र ८ ० ७ .0 5 


लक ग्रे लव 


कहानी का मूलस्वर प्रेम हैं। प्रेम पर किसी का हस्तक्षेप और नियत्रण 
नही चलता। प्रेम की महत्ता प्राणों के मूल्य से भी तोली नहीं जा सकती। 
इसीलिए लोग प्राण देकर भी प्रेम की रक्षा करते है। प्रेम एक ईदवरीय देन 
है, वह सब को नही मिलता । विरले ही इस अमृतपान का अवसर पाते है। 
प्रेम बडा ज़िददी और निष्ठुर भी होता है। क्षमा, दया और उदारता, सहानु- 
भूति और शिष्टाचार उसे स्पर्श नही कर पाते। वह क्रय-विक्रग की सीमाओं 
से परे रहता है। वह कलाकार ब्रह्म का एक सर्वव्यापक रूप है। कोई प्राणी 
उससे वंचित नही रहता। वासना से मिलने में उसे आपत्ति नही, पर वह 
उसके साथ रह नही सकता। वह देखता सबको है, पर उसके आंखे नहीं 
होती। उसके अनेक मार्ग हे, अनेक रूप और स्वर है। उसको अँगुली भी 
पकडने को मिल जाय, तो वह ईरवर से मिला सकता है। विश्व के कहानी 
साहित्य से यदि प्रेम कहानियाँ पथक्‌ कर दी जॉय, तो जो कुछ शेष रह 
जायगा, वह एक प्रकार से निष्प्राण होगा। इसीलिए सभी सम्मुन्नत भाषाओं 
में आज प्रेम कहानियों की धूम है। 

ऐतिहासिक कहानियों का मुख्य सम्बन्ध काल से रहता है। किसी भी 
समय और किसी भी विषय की कहानी युग-परिवर्तन के परचात्‌ कालान्तर 
में ऐतिहासिक बन जाती है। 

जासूसी कहानी का विषय उसके नाम से ही प्रकट है। हत्याओ, 
अग्नि काडों , चोरियो, विविध अपराध जन्य स्थितियों तथा दुर्घटनाओं में 
जिन लोगों का प्रमुख हाथ रहता है, उनकी खोज और छानबीन ही इन 
कहानियों का उद्देश्य है। 

बविद्वव के कथा-साहित्य में प्रेम कहानियो के बाद जिन कहानियों की 
गणना अधिक की जाती हैं, वे जीवन-रहस्य की आदचर्य्य कहानियाँ होती 
हैं। जगत में लाना प्रकार के व्यक्ति है। रूप, आकार-प्रकार, भाषा और 
संस्कृति की दृष्टि से यो भी उनमें परस्पर बडा अन्तर होता है , फिर गुण, 
कर्म जौर स्वभाव को लेकर उनकी भिन्नता और भी बढ जाती है। इतने पर भी 
मनुष्य सामाजिक प्राणी है। एक का दूसरे के साथ मिलना जुलना जीवन 
व्यापारों में सहयोग करना, पारस्परिक विश्वास, एक का दूसरे पर निर्भर 
रहना आदि ऐसी वृत्तियाँ है, जो मनुष्य के लिए सर्वेथा स्वाभाविक है। उसके 


न्‍न रहे ० 


बाद स्वार्थ-साधन, आडम्बर, भ्रम-जाल, षडयत्र के पद्दोस में चुपचाप बंठी 
निःश्वस भरती सहृदयता, उदारता, क्षमा दया और ताना प्रकार की प्रति- 
क्रियाओं मे विजडित सत्रस्त क्षिप्त आज का सामाजिक व्यवित---मन, वचन 
और कर्म की एकता में कहां जा पहुंचा है, इन्हीं बातों, विषयों, उलभनों 
और समस्याओं का निरूपण इस प्रकार की कहानियो का मुख्य क्षेत्र होता है। 
व्यंग्य तथ। हास्य की कहानियों का, जीवन और समाज के सव-निर्माण 

और विकास में बडा हाथ रहता हूँ । शरीर उतका मनोरजक अवश्य होता 
हैं, पर उसके भीतर समाज की आलोचना की जो एक सजग भूमिका रहती है, 
वह कड वी औषध की भाँति तीखी, तीत्र और कदु होती है। रचनाकार 
चाहे तो ऐसी कथाओं हारा समाज का मानसिक ताप दूर करके उसका 
बडा उपकार कर सकता है। पर इस प्रकार की कहानियों में दो बातों का 
ध्यान रखना बहुत आवश्यक है । 

१ वे अइलील और थौन-परक न होनी चाहिये। 

२ व्यक्तिगत-आक्षेप से उन्हे सदा दूर रखना चाहिये। 

आदर्श कहानियों से यद्वां अभिष्नाय उन कहानियों से हे, जिनके भीतर 
से किसी नीति, सिद्धन्त-और आदर्श विशेष की मन्द मन्द गन्धवाय नि सृत 
होती रहती है | ऐजी-कट्ानियोँ उद्देश्य मलक होती है । व्यक्ित्र.और, समाज 
की साधारण भूलों,, अन्ध-प्रय्मराओं, हर ज्पामेरें+ रूडियों तथा जीवन 
में फैले क्रोध, मोह, अहकार के विष से पाठक को सजग करते रहना इन 
कहानियाँ का मुख्य- लक्ष्व- होता ह 

ये कहानियाँ स्थुरू रूप से दो प्रकार की जान पड़ती है---आदर्शवादी 
और यथार्थवादी। किन्तु मूलतः वे आदर्शवादी ही होती हैँ। अन्तर उनमें 
केवल शैली का रहता है। आदशेवादी कहानियों में व्यक्ति और समाज की 
आलोचना परिष्कृत, शिष्ट और सुधारवादी दृष्टि से होती है, पर यथार्थवादी 
कहानियों में शिष्टता का उतना ध्यान नही रखा जाता, जितना तीजमता का । 
वे अपेक्षाकृत कटु भी होती हैं। छेखक उनकी रचना में क्षण स्थायी सुधार 
का स्वर न देकर ऋान्ति का हंखनाद देता है। वह इस प्रकार की औषधि पर 
विश्वास नहीं करता, जो प्रकट रूप से, थोडे दिनों के लिए रोगी को तीरोग 
रखती है, पर उसके पदचात्‌ उसके लिये परम धाम का टिकट काट देली है ! 


र५ 


यहां यह स्पष्ट कर देने की आवश्यकता है कि एक सच्चा कर्मेठ और 
सफल यथार्थवादी पक्का आदरशवादी होता है। हिन्दी जगत में यथाथेवाद के 
सम्बन्ध में एक बडा अ्रम फेला हुआ है। छोग यथार्थवाद को आदशवाद से 
सर्वथा पृथक्‌ मान बैठे हैं। पर ध्यान से देखा जाय, तो यथार्थंवाद आदशवाद 
का ही एक रूप है। बात यह है कि जैसे यथार्थ का एक आदर्श होता है, वैसे ही 
आदशे की एक यथार्थता होती है। यथार्थ की ओर इगित किये बिना आदरों 
अपनी रक्षा तक नहीं कर सकता और एक आदर्श को लक्ष्य-विन्दु माने बिना 
यथार्थ की स्थिति ही .डांवाडोल रहती है । सच प्रृछिये तो दोनो एक ही 
राज-पथ क्रे प्शक-पथ्क्‌ दो फूटपाथ है। 

मनोवैज्ञानिक कहानियाँ केवल एक विशिष्ट शैली के कारण अपना 
पृथक्‌ अस्तित्व रखती हे; अन्यथा साधारण रूप से प्रत्येक कहानी का आधार 
मनोविज्ञान होता है। 

बात यह है कि बाहर से मनुष्य का जो रूप हम निरन्तर देखते हे, भीतर 
उसका-बह-रूप-बही. होता । मनुष्य जो कुछ कहा करता है,-.कर्म. की. गदि.मे 
उसे बास्त॒व्िक--सज्ञय -बह--केजल इसलिए नही दे पाता..क्ति भविष्य की 
परिस्थितियाँ बदल जाती है , यद्यपि ऐसा भी सभव है। पर प्रायः होता यह 
है कि स्वार्थ-साधना में सलग्न थोडी सी भी बुद्धि रखने वाला व्यक्ति प्रकट 
रूप से जो कुछ कहता है, वह प्राय' कृत्रिम और तथ्य हीन होता है। अर्थात्‌ 
उसके मन, वचन और कम में एकता नही होती । वह मन में जो रखता डे 
बढ़ कहता नदी ओर-जो कुछ कहता है, बह करता,ज़ही। उसका वचन मन 
से भिन्न और कम बचन से भिन्न होता है। समाज मे अगान्ति और विषमता 
का जो कोलाहल और चीत्कार हम्र निरन्तर देखते हे, उसका मल कारण बढ़ी 
अनैक्य है. चर प्रंदन यह है कि मनुष्य अपने आपको कहा तक छिपा सकता 
है, कहा तक बह समाज क सम्मुख उजला और सच्चा बना रह सकता है ? 
समाज से हम चाहे जितनी शिकायत रक्‍्खे, पर उसका एक ऐसा व्यवस्थित 
रूप तो बन ही गया है कि नेतिक विश्वासों और मान्यताओं से स्वथा हीन 
व्यक्ति चाहे जितना बुद्धिमान हो, एक-न-एक दिन उसकी धू्तेता का भंडा- 
फोड़ होकर रहता है। नारी की परवहाता को हढेकर अगणित कहानियाँ 
लिखी गयी हैं, किन्तु वश रहते हुए नारी की वास्तविक स्थिति क्‍या है? 


२६ 


साहित्य और कला की पृष्ठभूमि पर उतर कर नारी को लेकर जो अनेक 
काव्य और उपन्यास लिखे गये, क्या उनके द्वारा हम पूर्ण रूप से उसे सम 
पाये ? आज के सामाजिक पुरुष की आर्थिक हीनता हमारी सम में आती हूँ, 
किन्तु मानसिक हीनता के मूलाधार क्या हे, क्यों मनुष्य इतना असहाय, हीन 
और पगु बन गया है ? उसकी इस दुरवस्था के मुल मे समाज का ही हाथ है, 
व्यवित के अपने सस्कारों का कुछ नहीं है ? दुष्ट, घृर्त और चरित्रहीन व्यवित 
भी क्‍या कही धर्मपरायण, सच्चा और साधु नहीं है ?--मनोवेज्ञानिक 
कहानियों मे इन्ही बातों पर विचार और अनुज्ीलन किया जाता है। 
४ 
हिन्दी की मौलिक कहानी का इतिहास अभी केवल चालरिस बयालिस 
वर्ष का है। सन १९०० ई० की सरस्वती” में कई मास तक अगरेजी-साहित्य 
के अमर कवि शेक्सप्रियर-के- कई -वम्ब्करें-के अनुवाद प्रकाशित हुए। इन 
अनुवादों का साथ सस्क्ृत नाटकों के अनुवादों ते दिया। पर अँगरेजी और 
संस्कृत---दोनों प्रकार के इन नाटकों के अनुवाद नाटक में न होकर कहानी' 
में थे। अंगरेजी के नाटक थे 'सिम्बलीलन 'टाइमन आफ एथेस”' और कमेडी 
आफ़ एरसे' और सस्क्ृृत के रत्नावडी और मालविकाम्निमित्र । वाण कौ 
कादस्व॒रा' का अनुवाद एक लघु उपन्यास.-के रूप मे इससे भी पूर्व हो चुका 
था। सच पूछिये तो इन अनुवादो ने ही हिन्दी मे मौलिक कहानी लेखन को 
प्रेरित क्रिया। पहले कोयों ने कहा--जून सत्‌ 8०-०-ई-०«में प्रकाशित 
इन्द्रसती' कहानी' हिन्दी की सर्वप्रथम प्रौद्णिक कहानी है। परन्तु फिर 
स्वर बदला और यह सिद्ध हो गया कि वह सर्वथा मौलिक नही, टेम्पेस्ट' 
से प्रभावित और एक राजपूत' कथा से आधारित है। वातावरण मात्र उसका 
भारतीय कर दिया गया है। इस कहानी के लेखक थे स्व० पण्डित किशोरी 
छारक गोस्वामी। 
कहते हैं कहानी की काया का तिर्माण उन कल्पनाओं से होता है, जो 
जीवन की साध पूरी नही कर पातीं। अर्थात्‌ लेखक कल्पना-विलास में भी 
अपनी मानसिक साध पूरी कर लेता है। गोस्वामी जी ने जब इन्दुमती की 
रचना की होगी, तब कदाचित्‌ उनकी कल्पना रही होगी। हिन्दी में ऐसी 
कहानियों को जन्म देन जिनकी गरिमा अनवाद से ऊपर हो । पर कल्पना 


के आनन्द से भी ऊपर है वह संयोग, जो अकल्पित होता है। अर्थात्‌ अकल्पना 
का आनन्द कल्पना से भी बढकर होता है। गोस्वामी जी ने कभी सोचा भी 
न होगा कि आधार ग्रहण की थोडी सी दुर्बंछता रखते हुए भी उनकी इन्दुमती 
कहानी किसी अन्य भाषा की नही, हिन्दी की मौलिक कहानी मानी जायगी । 

डॉक्टर श्री क्ृष्णछाल ने हिन्दी कहानियाँ की विस्तृत भूमिका में 
लिखा है कि सन १९०० से १९१० तक का समय आधुनिक हिन्दी कहानी 
का प्रयोगात्मक यग़ था। जब कहानी की कोई निश्चित परम्परा न थी । 
उसके साहित्यिक रूप तथा शैली के सम्बन्ध मे कोई निश्चित आदर्श सामने 
न था। किन्तु मिर्जापुर निवासिनी लेखिका श्री बग म्रहिला की दुल्ाई वाली 
कहानी इसी प्रयोगात्मक युग की देन है. यह कहानी शिल्प विधान की दृष्टि 
से बहुत कुछ निर्दोष है और मौलिकता की दृष्टि से भी वह खरी उतरती है। 
अत निष्पक्ष भाव से देखा जाय तो हिन्दी की सर्वप्रथम मौलिक कहानी 
दुलाई वाली" है। 

सन्‌ १९११ ई० का वर्ष हिन्दी कहानी के जन्म की दृष्टि से बडा ही 
श्रेष्ठ और मागलिक था। हिन्दी के रवीन्द्र जयप्रसाद जी की ग्राम 
जो उनकी सर्वप्रथम कहानी थी, 'इन्दु' में इसी वर्ष प्रकाशित हुई। इसी 
वर्ष जी० पी० श्री वास्तव की एक कहानी इन्दु में प्रकाशित हुई और इसी 
वर्ष श्री चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की पहली कहानी कलकत्ते से प्रकाशित होने 
वाले 'भारतमित्र' मे प्रकाशित हुई। इस दशक ने कई कलाकारों को कहानी 
के क्षेत्र में लाकर खडा कर दिया। सन्‌ १९१३ की सरस्वती” मे स्व० पं० 
विश्वम्भर नाथ शर्मा कौशिक अवतरित हुए और सन्‌ १९१५ में स्व० 
क्षी चन्द्रधर वर्मा गुलेरी की अमर कहानी उसने कहा था' प्रकाशित हुई। 
इसके परचात्‌ सन्‌ १९१६ में यूग-निर्माता प्रेमचन्द जेसे कलाकार का 
उर्दू से हिन्दी मे उदय हुआ और इसके पश्चात्‌ सन्‌ १९२० ई० में श्री सुदर्शन 
ने भी हिन्दी में प्रवेश कर हिन्दी कहानी के वाल जीवन को गौरवान्बित किया | 

हिन्दी कहानी के इसी वाल्यकारू मे आदशवाद का उदय हुआ। सन्‌ 
पैतीस तक के कार्य-काल मे आदर्दावादी कहानियों ने अच्छा विकास पाया। 
सर्वेश्री प्रसाद प्रेमचन्द कौशिक और सदर्शन ये चारों महारथी आदर्शवादी 
कंथा-साहित्य के गौरव माने जाते हे. इसी यग मे श्री जैनेन्द्र कुमार, इन 


हेड: किट 


पकितयों के छेडर, इलावन्द्र जोशी और श्री अज्ञेय ने हिन्दी कथा सें यथार्थवाद 
के सः 7-साथ मनोविश्लेषणात्मक प्रणारी- का प्रचकत क्रिया ।-इसके परचात्‌ 
सवश्री यशपाल, पहाडी, लक्ष्मीचन्द्र, विष्णु प्रभाकर, चन्द्रकरण सौनरिक्सा 
आदि कथाकारों ने यथार्थवादी तथा प्रगतिवादी प्रवृत्तियों से हिन्दी कथा 
को और आगे बढ़ाया। इधर पिछले दशक में सर्वश्री अमुतलारू नागर,कमल 
जोशी, बरुआ, रांगेय राघव, रावी, देवीप्रसाद धवन, तथा ओंकार शरद 
आदि कथाकारों ने हिन्दी को कई सुन्दर कहानियाँ भेंट की। ध्यान से 
देखा जाय तो पुराने और नये मिलाकर रूगभग बीस ऐसे कथाकार हिन्दी- 
साहित्य में उपस्थित है, जिनको प्राप्त कर कोई भी भाषा गौरवान्वित हो 


सकती है । 
“भगवतीप्रसाद बाण॑पेयी 


प्रतिनिधि कहानियों 
बेडी 


[जयशंकर '“असाद”] 


“बाबू, जी एक पैसा !” 

में सुनकर चौक पडा। कितनी कारुणिक आवाज़ थी ! देखा, तो एक 
९-१० वर्ष का रूडका अन्धे की छाठी पकडे खडा था। मेने कहा--- सूरदास 
यह तुमको कहाँ से मिल गया ? ” 

अन्धे को अन्धा न कहकर सूरदास के नाम से पुकारने की चाल मुझे 
भी रूगी। इस सम्बोधन मे उस दीन के अभाव की ओर सहानुभूति और 
सम्मान की भावना थी, व्यग न था। 

उसने कहा-- बाबू जी, यह मेरा छड़का है--मुझ अच्चे की रूकड़ी 
है। इसके रहने से पेटभर खाने को मांग सकता हूं और दबने कुचलने से भी 
बच जाता हूँ। 

मेने उसे इकन्नी दी, बालक ने उत्साह से कहा--अहा इकन्नी 
चूडढे ने कहा--- दाता जुग-जुग जियो! ” 

में आगे बढा और सोचता जाता था, इतने कष्ट से जो जीवन बिता 
रहा हैं उसके विचार में भी जीवन सब से अमृल्य वस्तु है, हे भगवान्‌ 

मैट रा मं: 


“दीनानाथ करी क्यों देरी ? “---दाश्वमेध की ओर जाते हुए मेरे 
कानों में एक प्रौढ़ स्वर सुनाई पड़ा। उसमे सच्ची विनय थी--वही, जो 
तुलसीदास' की विनयपत्रिका में ओतप्रोत है। वही आकुरूता, सानिध्य की 
पुकार, प्रबत्ष प्रहार से व्यथित की कराह ! मोटर की दम्भ भरी भीषण 


केक 55 0. रन्‍» 


भों-भो में विलीन होकर भी वायुमंडलर में तिरते छगी। मे अवाक होकर 
देखने रूगा, वही बुड़ढा ! किन्तु आज अकेला था। मेने उसे कुछ देते हुए 
पुछा--- क्‍यों जी, आज वह तुम्हारा लडका कहां है ? ” 

बाबू जी, भीख में से कुछ पैसे चुराकर रखता था, वही लेकर भाग गया ! 
ने जाने कहा गया | उन फूटी आँखों से पाती बहने छगा। मेने पूछा---उसकाः 
पता नहीं लगा ? कितने दिन हुए ” 

लोग कहते हे वह कलूकत्ते भाग गया | --उस नटखट लडके पर क्रोध 
से भरा हुआ में घर की ओर बढा । वहा एक व्यास जी श्रवण-चरित की कथा 
कह रहे थे। में सुनते सुनते उस बालक पर अधिक उत्तेजित हो उठा। देखा 
तो पानी की करू का धुआ पूर्व के आकाश में अजगर की तरह फेल रहा था। 

. मे मंद 


कई महीने बीतने पर चौक में वही बृड़ढ़ा फिर दिखाई पडा। उसकी 
लाठी पकडे वही लडका अकडा हुआ चैडा था। मेने क्रोध से पुछा-- क्यों 
बे, तू अन्धे पिता कौ.छोड कर कहाँ भागा था ?” बह मुस्कराता हुआ बोला 
“बाबूजी, नौकरी खोजने गया था।” मेरा क्रोध उसकी कतंव्य-बुद्धि से शान्त 
हुआ। मैंने उसे कुछ देते हुए कहा-- लडके, तेरी यही नौकरी है, तु अपने 
बाप को छोडकर न भागा कर । 

बुड़ढह़ा बोल उठा--- बाबूजी, अब यह नहीं भाग सकेगा, इसके पैरों 
में बेडी डाल दी गई है। मेने घृणा और आदचर्य से देखा, सचमुच उसके 
पैरों में बेडी थी ! बालक बहुत धीरे-धीरे चल सकता था। मेंने मन ही मन 
कहा--- है भगवन्‌ , भीख मँगवाने के लिये, पेट के लिये, बाप अपने बेटे के 
पैर में बेड़ी भी डाल सकता है ! और वह नटरै'ाश्कर भी मुस्कराता था ! 
संसार तेरी जय हो ! 

में आगे बढ गया। 

मंघ मे ग्ड 

में एक सज्जन की प्रतीक्षा में खड़ा था, आज नाव पर घूमने का उनसे 
सिर्चय हो चुका था। गाडी, मोटर, तांगे टकराते-टकराते भागे जा रहे थे, 
सब जैसे व्याकुछ । में दाशंनिक की तरह उत्तकी चंचकता की आलोचना 
कर रहा था। सिरस के वृक्ष की आड सें फिर वही कृष्ठस्वर सुनाई पड़ा । 


बुड़ढे ने कहा-- बेटा, तीन दिन और न ले पैसा। सेने रामदास से कहा है, 
सात आने में तेरा कुरता बन जायगा। अब ठडक पडने लगी है, उसने ठुनकते 
हुए कहा--“नही, आज मुझे दो पैसा दो। में कचाल खाऊँगा। वह देखो, 
उस पटरी पर बिक रहा है। बालक के मूह और आँख में पानी भरा था | 
दुर्भाग्य से बुड्ढह़ा उसे पैसा नही दे सकता था। वह न देने के लिए हठ करता 
ही रहा, परन्तु बालक ही की विजय हुई। वह पैसा लेकर सडक की उस पटरी 
पर चला। उसके बेडी से जकड़े हुए पैर पेतरा काट कर चल रहे थे। जैसे 
युद्ध-विजय के लिये। 

नवीत बाबू ४० मील की स्पीड से मोटर अपने हाथ से दौडा रहे थे। 
दर्गेकों की चीत्कार से बारूक गिर पडा। भीड दौडी, मोठर निकरू गई। 
और वह बुड़ढा विकल हो रोने लगा--अन्धा किधर जाय ! 

एक ने कहा---चोट अधिक नहीं।*” 

दूसरे नें कहा--- हत्यारे ने बे डी पहना दी हैं, नही तो क्यों चोट खाता । 

बुड़के ने कहा-- काट दो बेंडी, बाबा मुर्के न चाहिये।” 

और मेने हतबुद्धि होकर देखा कि बालक के प्राण-पस्लेरू अपनी बेडी 
काट चुके थे। 


बूढ़ी काकी 
[ प्रेमचन्द ] 


बूढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन हुआ करता है। बूढी काकी में 
जिह्दा-स्वाद के सिवा और कोई चेष्टा न थी और न अपने कष्ठों की ओर 
आकर्षित करने का रोने के अतिरिक्त कोई दूसरा सहारा ही । समस्त इंद्वियाँ, 
नेत्र, हाथ और पैर जवाब दे चुके थे। पृथ्वी पर पडी रहती और जब घरवाले 
कोई बात उनकी इच्छा के प्रतिकूल करते, या भोजन का समय टल जाता, 
उसका परिमाण पूर्ण न होता, अथवा बाजार से कोई वस्तु आती और उन्हें 
न मिलती तौ रोने रूगती थीं। उनका रोना-सिसकना साधारण रोना न था, 
वह गला फाड-फाडकर रोती थी। 

उनके पतिदेव को स्वर्ग सिधारे कालांतर हो चुका था। बेटे तरुण हो 
होकर चल बसे थे। अब एक भतीजे के सिवाय और कोई न था। उसी 
भतीजे के नाम उन्होंने अपनी सारी सम्पत्ति लिख दी थी। भतीजे ने सम्पत्ति 
लिखाते समय तो खूब लम्बे-चौड़े वादे किए, परल्तु वे सब वादे केवरू कुली 
डिपो के दलालों के दिखाए हुए सब्ज बाग थे। यद्यपि उस सम्पत्ति की वार्षिक 
आय डेंढ-दो सो रुपये से कम न थी तथापि बूढी काकी को पेट भर भोजन भी 
कठिनाई से मिरूता था। इसमे उनके भतीजे पंडित बुद्धिराम का अपराध था 
अथवा उनकी अर्दधांगिनी श्रीमती रूपा का, इसका निर्णय करना सहज नही । 
बुद्धिराम स्वभाव के सज्जन थे, किन्तु उसी समय तक जब तक कि उनके 
कोष प्र कोई आऑँच न आए। रूपा स्वभाव से तीव्र थी सही, पर ईदवर से 
डरती थीं। अतएव बूढी काकी को उसकी तीब्ता उतनी न खलती थी जितनी 
बुद्धिराम की भलूमनसाहत । 

बुद्धिराम को कभी-कभी अपने अत्याचार का खेद होता था । विचारते 
कि इसी सम्पत्ति के कारण में इस समय भलामानुस बना बैठा हैँ । यदि मौखिक 


“ हरेहे «-+ 


आध्वासन और सूखी सहानुभूति से स्थिति मे सुधार हो सकता तो उन्हें 
कदाचित्‌ कोई आपत्ति न होती; परन्तु विशेष व्यय का भय उनकी सच्चेष्टा 
को दवाएं रखता था। यहाँ तक कि यदि द्वार पर कोई भला आदमी बैठा 
होता और बूढी काकी उस समय अपना राग अलापने लूगती तो वह आग 
हो जाते और घर में आकर उन्हे जोर से डॉटते। छूडको को बुड़ढों से स्वाभा- 
विक विद्वेष होता ही है और फिर जब माता-पिता का यह रग देखते तो बूढी 
काकी को और भी सताया करते। कोई चुटकी काट कर भागता, कोई उन 
पर पानी की कुल्ली कर देता। काकी चीख मार कर रोती, परन्तु यह बात 
असिद्ध थी कि वह केवल खाने के लिए रोत्ी है, अतएव उनके सन्‍्ताप 
ओर आतंँनाद पर कोई ध्यान नही देता था। हों, काकी कभी क्रोधातुर 
होकर बच्चों को गालियाँ देने लगती तो रूपा घटनास्थल पर अवध्य 
आ पहुँचती। इस भय से काकी अपनी जिद्दा-कृपाण का कदाचित्‌ ही 
प्रयोग करती थी, यद्यपि उपद्रव-शान्ति का यह उपाय रोने से कही अधिक 
उपयुक्त था। 

सम्पूर्ण परिवार में यदि काकी से किसी को अनुराग था, तो वह बृद्धिराम 
की छोटी लडकी लाडली थी। लाडली अपने दोनों भाइयों के भय से अपने 
हिस्से की मिठाई चबेना बूढी काकी के पास बैठ कर खाया करती थी। यही 
उसका रक्षागार था और यद्यपि काकी की शरण उनकी लोलपता के कारण 
बहुत महँगी पडती थी, तथापि भाइयों के अन्याय से कही सुलूभ थी। इसी 
स्वार्थानुकूलता ने उन दोनों में प्रेम और सहानुभूति का आरोपण कर 
दिया था। 

रात का समय था । बुद्धिराम के द्वार पर सहनाई बज रही थी और याँव 
के बच्चों का भुड विस्मयपूर्ण नेत्रों से गाने का रसास्वादत कर रहा था। 
चारपाइयों पर मेहमान विश्राम करते हुए नाइयों से मुक्कियाँ छगवा रहे थे। 
समीप ही खड़ा हुआ भाट बिरदावली सुना रहा था और कुछ भावज्ञ मेहमानों 
के “बाह, वाह” पर ऐसा खश हो रहा था मानों इस बाह-वाह का यथार्थ 
में वही अधिकारी है। दो एक अँगरेजी पढे हुए तवयुवक इन व्यवहारों से 
उदासीन थे। वे इस गवार-मंडली में बोलना अथवा सम्मिलित होना अपनी 
प्रतिष्ठा के प्रतिकूल समभते थे। 

३ 


>अ: तह का 


आज बुद्धिराम के बडे लडके सूखराम का तिलक आया है। यह उसी का 
उत्सव है। घर के भीतर स्त्रियाँ गा रही थी और रूपा मेहमानों के लिए 
भोजन के प्रबन्ध मे व्यस्त थी। भट्ठियों पर कडाह चढे थे। एक में पूद्िियों 
कचौरियों निकल रही थी। दूसरे मे अन्य पकवान बन रहे थे। एक बडे इडे 
मे मसालेदार तरकारी पक रही थी। घी और मसाले की क्षध्रावद्धक सुगणि 
चारों ओर फैली हुईं थी । 

बूढी काकी अपनी कोठरी में शोकमय विचार की भाँति बठी हुई थी 
वह स्वाद-मिश्रित सुगधि उन्हें बेचेन कर रही थी। वे मन ही मन विचार 
कर रही थी, संभवत. मुझे पूद्चियाँन मिलेगी । इतनी देर हो गई. कोई 
भोजन ले कर नहीं आया, मालम होता है, सब लोग भोजन कर चुके | 
मेरे लिए कुछ न बचा । यह सोच कर उन्हे रोना आया; परंतु अगकुन के 
भय से वह रो न सको । 

“आहा ! कंसी सुगधि है | अब मुझे कौन पूछता है ? जब रोटियों ही 
के लाले पडे हे तब ऐसे भाग्य कहाँ कि भर पेट पूडियाँ मिले ? “-यह विचार 
कर उन्हे रोना आया, कलेजे में एक हक-सी उठने छूगी। परतु रूपा के भय से 
उन्होंने फिर भी मौन धारण कर लिया । 

बूढी काकी देर तक इन्ही दुःखदायक विचारों में डूबी रही | घी और 
मसालो की सुगधि रह-रह कर मन को आपे से बाहर किए देती थी। मुंह में 
पानी भर-भर आता था। पूडियों का स्वाद स्मरण कर के हृदय में गुदग॒दी 
होने लगती थी। किसे पुकारू, आज लाडली बेटी भी नही आई। दोनों 
छोकडे सदा दिक किया करते हें। आज उनका भी कही पता नही । क्रुछ 
मालूम तो होता कि क्‍या बन रहा है। 

बूढ़ी काकी की कल्पना में पूड़ियों की तस्वीर नाचने छगी। खूब छाल- 
लाल, फूली-फूली, नरम-नरम होंगी; रूपा ने भली भाति मोयन दिया होगा। 
कचौरियों मे अजवाइन और इलायची की महक आ रही होगी। एक पूरी 
मिलती तो जरा हाथ मे ले कर देखती। क्यों न चल कर कड़ाह के सामने ही 
बैदूँ । पूड़ियों छत-छनकर तैरती होंगी । फूल हम घर में भी सूँघ सकते है, 
परंतु बाटिका मे कुछ और बात होती है । इस प्रकार निर्णय कर के बूढी काकी 
उकड' बैठ कर हाथों के बल सरकती हुई बड़ी कठिनाई से चौखट से उतरी 


बज टठे प्‌ कल्जल 


ओर धीरे-धीरे रेगती हुईं कडाह के पास जा बैठी। यहाँ आने पर उन्हें 
उतना ही धैये हुआ जितना भूखे कुत्ते को खाने वाले के सम्भुख बैठने में 
होता है। 

रूपा उस समय कार्ये-भार से उद्विग्न हो रही थी। कभी इस कोठे में 
जाती, कभी उस कोठे में; कभी कडाह के पास आती, कभी भडार में जाती। 
किसी ने बाहर से आ कर कहा--महाराज ठंडई माँग रहे है। ठडई देने 
लगी। इतने मे फिर किसी ने आकर कहा---भाद जाया है, उसे कुछ दे दो । 
भाट के लिए सीधा निकाल रही थी कि एक तीसरे आदमी ने आकर पूछा--- 
“अभी भोजन तैयार होने में कितना विलम्ब है ? जरा ढोल-मजीरा उतार 
दो।” बेचारी अकेली स्त्री दौडती-दौडती व्याकुल हो रही थी, भुँकलाती 
थी, कुढती थी, परतु क्रोध प्रकट होने का अवसर न पाती थी। भय होता 
कही पद्योसिने यह न कहने लगे कि इतने में ही उबल पडी। प्यास से स्वय॑ 
उसका कठ सूख रहा था। गर्मी के मारे फूंकी जाती थी, परतु इतना अवकाश 
भी नही था कि जरा पानी पी ले अथवा पंखा ले कर भले। यह भी खटका 
था कि जरा आँख हटी और चीजों की छूट घची। इस अवस्था में उसने 
बूढी काकी को कडाही के पास बेठा देखा तो जल गईं। क्रोध न रुक 
सका। इसका भी न ध्यान रहा कि पडोसिने बैठी हुई है मन में क्या कहेंगी, 
पुरुषों मे लोग सुनेंगे तो क्या कहेगे। जिस प्रकार मेढक केंचुए पर भपटता है, 
उसी प्रकार बह बूढ़ी काकी पर भूपटी और उन्हें दोनों हाथों से मिफ्रोड कर 
ब्रोली--ऐसे पेट में आग लरूगे, पेट है या भाड ? कोठरी में बेठते क्या दम 
घुटता था ? अभी मेहमानों ने नहीं खाया, भगवान को भोग नहीं छूगा, 
तब तक घैये न हो सका ? आ कर छाती पर सवार हो गईं। जल जाय ऐसी 
जीभ। दिन भर खाती न होतीं तो न जाने किसकी होंड़ी में मुँह डालती ? 
गाँव देखेगा तो कहेगा बुढ़िया भरपेट खाने को नही पाती, तब तो इस तरह 
मुँह बाए फिरती है। डाइन न मरे न माँचा छोड़े। नाम बेचने पर लगी है। 
नाक कटवाकर दम केंगी। इतना दुसती है, न जाने कहाँ भस्म हो जाता है। 
को! भला चाहती हो तो जाकर कोठरी में बैठो, जब घर के लोग खाने 
रूगेंगे तब तुम्हें भी मिलेगा। तुम कोई देवी नही हो कि चाहे किसी के मुँह में 
पानी न जाय; परंतु तुम्हारी पूजा पहले हो जाय। बूढ़ी काकी ने सिर न 


वन कहे: 


उठाया, न रोई, न बोली। चुपचाप रेगती हुई अपनी कोठरी में चली गई। 
आघात ऐसा कठोर था कि हृदय और मस्तिष्क की सपूर्ण जक्तितियाँ, सपूर्ण 
विचार और सपूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गए थे। नदी में जब करार 
का कोई बृहद्‌ खड कट कर गिरता है तो आसपास का जरू-समूह चारों ओर 
से उसी स्थान को पूरा करने के लिए दौडता है। 

भोजन तैयार हो गया। आऑगन मे पत्तल पड गए। मेह मान खाने लगे ॥ 
स्त्रियों ने जेबनार-गीत गाना आरम्भ कर दिया। मेहमानों के नाई और 
सेवकगण भी उसी मडली के साथ, किन्तु कुछ हट कर, भोजन करने बेठे थे, 
परन्तु सम्यतानुसार जब तक सब के सब खा न चुके कोई उठ नही सकता था ॥ 
दो-एक मेहमान जो कुछ पढे-लिखे थे सेवको के दीर्घाहार पर भुंँकला रहे 
थी। वे इस बन्धन को व्यर्थ और बे-सिर-पेर की बात समभते थे। 

बूढी काकी अपनी कोठरी में जा कर पश्चात्ताप कर रही थी कि में 
कहाँ से कहाँ गई। उन्हें रूपा पर क्रोध नही था। अपनी जल्बबाजी पर दु.ख 
था। सच ही तो है जब तक मेहमान छोग भोजन न कर चुकंगे घरवाले केसे 
खाएँगे। मुझसे इतनी देर भी नही रहा गया। सब के सामने पानी उत्तर 
गया। अब जब तक कोई बुलाने न आएगा न जाऊँगी। 

मन-ही-मन इसी प्रकार विचार कर वह बुलावे की प्रतीक्षा करने लूगी । 
परन्तु घी का रुचिकर सुबास बडा ही धैर्य-परीक्षक प्रतीत हो रहा था। उन्हें 
एक-एक पर एक-एक युग के समान मालूम होता था। अब पत्तरू बिछ गए 
होंगे। अब मेहमान आ गए होगे। छोग हाथ-पैर घो रहे है, नाई पानी दे रहा 
हैं। मालूम होता है लोग खाने बेठ गए। जेवनार गाया जा रहा है, यह विचार 
कर वह मन को बहलाने के लिए लेट गई। धीरे-धीरे एक गीत गृनगुनाने 
लगी। उन्हें मालूम हुआ कि मुभे गाते देर हो गई। क्या इतनी देर तक लोय 
भोजन कर ही रहे होंगे। किसी की आवाज नहीं सुनाई देती। अवश्य ही छोग 
खा-पीकर चले गए। मुझे कोई बुलाने नही आया। रूपा चिढ़ गई है क्या 
जाने न बुलाए, सोचती हो कि आप ही आवेगी, वह कोई मेहमान तो है नही 
जो उन्हें बुलाऊ। बढ़ी काकी चलने के लिए तैयार हुई। यह विध्वास कि एक 
मिनट में पूडियों और मसालेदार तरकारियाँ सामने आएँगी उनकी स्वादे- 
द्वियों को गुदगुदाने छगा। उन्हींने मन में तरह-तरह के मसूबे बाघें---पहके 


४ > कक 


तरकारी से पूटिया लाऊंगी. फिर दही और शक्कर से; कचौरियाँ रायते 
के साथ मजेदार माल्म होगी। चाहे कोई बुरा माने चाहे भला, मै तो मॉग 
मॉगकर खाऊगी। यही न लोग कहेंगे कि इन्हे विचार नहीं? कहा करे, 
इतने दिनों के बाद पूदिया मिल रही हें तो मूह जूदा कर के थोठे ही उठ 
आऊंगी | 

बह उकड, बैठकर हाथो के बल खमकती ऑगन में आई। परन्तु हाय 
दुर्भाग्य / अभिलापा ने अपने पुराने स्वभाव के अनुसार समय की सिथ्या 
कल्पना की थी। मेहमान-मडली अभी बेटी हुई थी। कोई खा कर उँगलियाँ 
चाटता था, कोई तिें नेत्रों से देखता था कि और छोग अभी खा रहे है या 
नही * कोई इस चिन्ता में था कि पत्तल पर पूडियाँ छुटी जाती हे किसी तरह 
इन्हे भीतर रख लेता | कोई दही खा कर जीभ चटकारता था, परन्तु दूसरा 
दोना माँगते सकोच्र करता था। इतने में बढ़ी काकी रे गती हुई उनके बीच में 
जा पहुँची । कई आदमी चौक कर उठ खड हुए। पुकारने लगे--अरे यह 
बुढिया कौत ह ? यह कहा स आ गई ? देखो किसी को छू न दे। 

पंडित बुद्धियम काकी को देखते ही क्रोध से तिछमिला गए, पूडियो का 
थारू लिए खई थे। थाल को जमीन पर पटक दिया और जिस प्रकार निर्देयी 
महाजन अपने किसी बेईमान और भगोई असामी को देखते ही कपटकर 
उसका टेटुआ पकड लेता है उसी तरह रूपक कर उन्होने बूढ़ी काकी के दोनों 
हाथ पकड़े और घसीटते हुए ला कर उन्हें अंधेरी कोठरी मे धम से पटक 
दिया। आधा-रूपी-बाटिका लू के एक ही भोके से नष्ट-विनष्ट हो गई। 

मेहमानों ने भोजन किया। घरवालों ने भोजन किया। बाजेवाले, 
धोबी, चमार भी भोजन कर चुके, परन्तु बढडो काकी को किसी ने न पूछा। 
बुद्धिरम और रूपा दोनों ही बूढ़ी काकी को उसकी निर्लेज्जता के लिए दंड 
देने का निरचय कर चुके थे। उनके बुढापे पर, दीनता पर, हत-ज्ञाव पर 
किसी को करुणा न आती थी । अकंली लाडली उनके लिए कुढ़ रही थी। 

लाइली को काकी से अत्यन्त प्रेम था। बेचारी भोली लडकी थी। 
बाल-विनोद और चंचलछूता की उसमें गंध तक न थी। दोनों बार जब उसके 
माता-पिता ने काकी को निर्देयता से घसीदा तो लाडली का हृदय ऐंठ कर रह 
गया। वह मुँकला रही थी कि यह लोग काकी को क्यों बहुत-सी पूड़ियाँ 


४ 


नही दे देते ? क्या मेहमान सब की सब खा जायेंगे ? और यदि काकी ने 
मेहमानों के पहले खा लिया तो क्या बिगड़ जाएगा ? वह काकी के पास जा 
कर उन्हें धैर्य देना चाहती थी, परन्तु माता के भय से न जाती थी। उसने 
अपने हिस्से की पूडियाँ बिलकुल न खाई थी। अपनी गुडियों की पिटारी में 
बन्द कर रक्खी थी। वह उन पूडियों को काकी के पास ले जाना चाहती थी। 
उसका हृदय अधीर हो रहा था। बूढी काकी मेरी बात सुनते ही उठ बैठेगी। 
पूडियोँ देख कर कसी प्रसन्न होंगी ! मुझे खूब प्यार करेंगी ! 

रात के ग्यारह बज गए। रूपा ऑगन में पडी सो रही थी। लाडली की 
आँखों में नीद न आती थी । काकी को पूडियाँ खिलाने की खुशी उसे सोने न 
देती थी। उसने गुडियों की पिटारी सामने ही रखी थी। जब विश्वास हो 
गया कि अम्मा सो रही है; तो वह चुपके-से उठी और विचारने लगी, कैसे 
चलू। चारों ओर मेँधेरा था। केवल चल्हों में आग चमक रही थी; और 
चूल्हों के पास एक कुत्ता लेटा हुआ था। लाडली की दृष्टि द्वार के सामने 
नीम की ओर गईं। उसे मालूम हुआ कि उस पर हनुमान जी बैठं हुए है । 
उनकी पृछ, उनकी गदा, सब स्पष्ट दिखलाई दे रही थी। मारे भय के उसने 
आँखें बद कर लीं, इतने मे कुत्ता उठ बैठा, छाडली को ढाढ़स हुआ । कई सोए 
हुए भनुष्यों के बदले एक जागता हुआ कुत्ता उसके लिए अधिकतर धैर्य का 
कारण हुआ । उसने पिटारी उठाई और बूढी काकी की कोठरी की ओर चली । 

बूढी काकी को केवरछू इतना स्मरण था कि किसी ने मेरे हाथ पकड़ कर 
घसीटे, फिर ऐसा माछूम हुआ जैसे कोई पहाड पर उडाए लिए जाता है। 
उनके पैर बार-बार पत्थरों से टकराए तब किसी ने उन्हें पहाड़ पर से पटका, 
वे मूछित हो गई। 

जब वे सचेत हुई तो किसी की जरा भी आहट न मिलती थी। समझा 
कि सब लोग खा-पी कर सो गए और उनके साथ मेरी तकदीर भी सो गई । 
रात कैसे कठेगी ? राम ! क्‍या खाऊँ, पेंट मे अग्ति धधक रही है ? हा ! 
किसी ने मेरी सुधि न ली ! क्‍या मेरा ही पेट काटने से धन जुट जायगा ? इन 
लोगों को इतनी भी दया नही आती कि न जाने बुढिया कब मर जाय ? उसका 
जी क्यों दुलावे ? में पेट की रोटियाँ ही खाती हूँ कि और कुछ ? इस पर यह 
हाल ! में अधी अपाहिज ठहरी, न कुछ सुन न बूमूँ, यदि आँगन में चली गई 


खण्क डे ० 


तो क्या बुद्धिराम से इतना कहते न बनता था कि काकी अभी लोग खा रहे 
है, फिर आना। मुर्भ घसीटा, पटका। उन्ही पूडियों के लिए रूपा ने सब के 
सामने गालियोाँ दी। उन्ही पूडियो के लिए इतनी दुर्गंति करने पर भी उनका 
पत्थर का कलेजा न पसीजा। सब को खिलाया, मेरी बात तक न पूछी। 
जब तब ही न दी, तब अब क्या देंगी ? 

यह विचार कर काकी निराशामय सतोष के साथ लट गई। ग्लानि से 
गला भर-भर आता था, परंतु मेहमानों के भय से रोती न थी। 

सहसा उनके कानों में आवाज आई---'काकी उठो, में पूडियाँ छाई हैँ।”' 

काकी ने लाडली की बोली पहचानी। चटपट उठ बैठी । दोनों हाथो से 
लाडल्मी को टटोला और उसे गोद में बेठा लिया। 

लाडली ने पूडियाँ निकाल कर दी। काकी ने पूछा--- क्या तुम्हारी 
अम्मा ने दी हे ”*” छाडली ने कहा-- नहीं यह मेरे हिस्से की है।' काकी 
पूड़ियों पर टूट पडी। पॉच मिनट में पिटारी खाली हो गई। 

लाडली ने पूछा-- काकी, पेट भर गया ? ” जैसे थोटी-सी वर्षा 5डक 
के स्थान पर और भी गर्मी पैदा कर देती है उसी भांति इन थोडी-सी पृडियों 
ने काकी की क्षुधा और इच्छा को उत्तेजित कर दिया था। बोली--- नही 
बेटी, जा कर अम्मा से और माँग लाओ।'' लाडली ने कहा--“अम्मा सोती 
हैं, जगाऊंगी तो मारेगी।" 

काकी ने पिटारी को फिर टटोला। उसमें कुछ खुचेत गिरे थे। उन्हें 
निकाल कर वे सा गई | बार-बार होंठ चाटती थी। चटखारे भरती थी । 

हृदय मसोस रहा था कि और पूड़ियाँ कैसे प्राऊँं। संतोष-सेतु जब टूट 
जाता है तब इच्छा का बहाव अपरिमित हो जाता है। मतवालों को मद का 
स्मरण कराना उन्हें मदाध बनाना है। काकी का अधीर मन इच्छा के प्रबल 
प्रवाह में बह गया। उचित और अनुचित का विचार जाता रहा। वे कुछ 
देर तक उस इच्छा को रोकती रही। सहसा छाडली से बोली--- मेरा हाथ 
पकड़ कर वहाँ ले चलो जहाँ मेहमानों ने बैठ कर 'भौजन किया है।” 

लाडली उनका अभिप्राय समझ तन सकी । उसने काकी का हाथ पकड़ा 
और हे जा कर जुठे पत्तलों के पास बिठला दिया। दीन, क्ष॒धातुर, हृत-मान 
अुढ़िया पतलो से पूच्यो के टुकड़े चुन-चुन कर भक्षण करने लूगी। ओह ! 


दही कितना स्वादिष्ट था, कचौरियाँ कितनी सलोनी, खस्ता कितने सुको- 
मल। काकी बुद्धिहीन होते हुए भी इतना जानती थी कि में वह काम कर रही 
हैँ जो मुझे कदापि न करना चाहिए। में दूसरों के जूठे पत्तल चाट रही हूं । 
परन्तु बृढापा तृष्णा-रोग का अतिम समय है, जब सपूर्ण इच्छाएँ एक ही केन्द्र 
पर आ सकती हे । बूढी काकी में यह केन्द्र उनकी स्वादेन्द्रिय थी । 
ठीक उसी समय रूपा की आँखे खुली । उसे मालूम हुआ कि लाडली मेरे 

पास नही है। वह चौकी, चारपाई के इधर-उधर ताकने रूगी कि कही नीचे 
तो नही गिर पडी। उसे वहाँ न पाकर वह उठ बैठी तो क्या देखती हैं कि 
लाडली जूठ पत्तलों के पास चुपचाप खडी है और बढ़ी काकी पत्तलों पर से 
पृष्ियों के टुकटे उठा-उठा कर खा रही है। रूपा का हृदय सन्न हो गया। 
किसी गाय की गर्दन पर छरी चलते देख कर जो अवस्था उसकी होती, 
वही उस समय हुई। एक ब्राह्मणी दूसरों का जूठा पत्तरू ठठोले, इससे अधिक 
दोकमय दुध्य असभव था।। पूडियों के कुछ ग्रासों के किए उसकी चचेरी सास 
ऐसा पतित और निक्षष्ट कर्म कर रही है ! यह वह दृध्य था जिसे ढेख कर 
देखने वालों के हृदय कॉप उठते हे । ऐसा प्रतीत होता। मानों जमीन रुक गई, 
आसमान चकक्‍कर खा रहा है, ससार पर कोई नई विपत्ति आने वाली है। 
रूपा को क्रोध न आया। शोक के सम्मुख क्रोध कहाँ ? करुणा और भय से 
उसकी आँखे भर आई। इस अधर्म के पाप का भागी कौत है ? उसने सच्छे 
हृदय से गगन-मडल की ओर हाथ उठा कर कहा--'परमात्मा, मेरे बच्चों 
पर दया करो, इस अधर्म का दड मुझे मत दो नही तो हमारा सत्यानाश 
हो जायगा। 

रूपा को अपनी स्वार्थपरता और अन्याय इस प्रकार प्रत्यक्ष-रूप मे कभी 
न देख पड़ा था। वह सोचने लगी--हाय ! कितनी निर्दय हूँ। जिसकी 
सम्पत्ति से मुझे दो सौ रुपया वाषिक आय हो रही है, उसकी यह दुर्गति ! 
और मेरे कारण ! ह दयामय भगवान्‌ ! मुभसे बडी भारी चूक हुई है, म॒झे 
क्षमा करो। आज मेरे बेठे का तिलक था। सेकड़ों मनृष्यों ने भोजन पाया। 
में उनके इशारों की दासी बनी रही। अपने नाम के छिए सैकड़ों रुपये व्यय 
कर दिए; परंतु जिसकी बदौलत हजारों रुपये खाए उसे इस उत्सव में भी 
भर-पेट भोजन न दे सकी । केवल इसी कारण तो कि वह वृद्धा है, असहाय है। 


रूपा ने दिया जलाया, अपने भडार का द्वार खोला और एक थाली मे 
संपूर्ण सामग्रिया सजा कर लिए हुए काकी की ओर चली। 

आधी रात जा चुकी थी, आकाश पर तारों के थाल सजे हुए थे और उन 
पर बंठे हुए देवगण स्वर्गीय पदार्थ सजा रहे थे, परतु उनमे किसी को वह 
परमानद प्राप्त न हो सकता था जो बूढ़ी काकी को अपने सम्मुख थाल देख 
कर प्राप्त हुआ। रूपा ने क्ठावरुद्ध स्वर में कहा-- काकी उठो, भोजन 
कर लो। मुझसे आज बडी भूल हुई, उसका बुरा न मानना। परमात्मा से 
प्रार्थना कर दो कि वह मेरा अपराध क्षमा कर दे।" 

भोले-भाले बच्चों की भाँति, जो मिठाइयाँ पा कर मार और तिरस्कार 
सब भूल जाता है, बृद्दी काकी बेठी हुई खाना खा रही थी। उनके एक-एक 
रोएँ से सत्ची सदिच्छाएँ निकल रही थी और रूपा बेठी इस स्वर्गीय दृश्य 
का आनद लटने में निमग्न थी। 


दद्दी की हांड़ी 
| चतुरसेन शास्त्री ] 


सन्रहवी शत्ताब्दी खतम हो रही थी और उसके साथ राजपुताने का 
ओजपूर्ण जीवन भी अस्तंगत हो रहा था। बादशाह आरूमगीर दक्षिण के 
कभी समाप्त न होने वाले युद्धों मे फसा था। वह वृद्ध हो गया था; और रोग 
उसे घेरे रहते थे। वह अपने ५० वर्ष भयानक परिश्रम के निरर्थक शासन के 
भविष्य को समझ गया था। वह रूठे हुए राजपुतों को जो मुगल राज्य के 
खम्भे थे, मनाने का व्यथे प्रयत्त कर रहा था। लोग उससे थक गए थे। बह 
अपने भकत-भर हाथों का स्वप्न देखता था, और मूखेतापूर्ण साम्प्रदायिकता 
पर परचात्ताप करता था। 

मारवाड के प्रतापी योधा जसवन्त सिह का देहान्त हो चुका था। और 
जनके वीर पूत्र अजीतसिह जालछौर में पडे वृद्ध बादशाह की मृत्यु की प्रतीक्षा 
कर रहे थे। औरणज्ञेब का सूबेदार नाज़िम कुली जोधपुर का गवनेर था। 
मारबाड की निरीह प्रजा जसवंत माहर को खोकर जैसे-तैसे मुशलों के 
अत्याचार सहन कर रही थी। मनृष्य जाति का महाशत्र्‌ आरलूमगीर कब 
मृत्यु शब्या पर गिरे, महाराज अजीतसिह और दुर्गादास को कब अभिसंधि 
आ्राप्त हो--जोधपुर का कब उद्धार हो--लक्षावधि भारवाडी प्रजा इसी 
प्रतीक्षा में थी। 

भें भेद भें 

ग्रीष्म समाप्त हो रहा था। सुन्दर प्रभात का सूर्य धीरे घीरे ऊपर चढ़ 
रहा था। आकाश में जहा-तहां बदली दीख पडती थी। सोजन गाँव से बाहर 
सुगल सेना पडाव ड़ाले पड़ी थी। यह सिउना के किले कुमक के कर जा रही 
थी। जिसका रक्षक मुर्तुजा बेग मेवाती था और जिसे दो भांस से राठौरो ने 
चेर रखा था 


चार सिपाही भूमते-कामते गांव में घुम रहे थे। उनके साथ एक खच्चर 

था। ऊपर बहुत सी खाद्य सामग्री थी। उनकी घनी काली दाढ़ी, लाल-लारू 
आँखे, चमकीले जिरह बखुतर और घमण्ड भरी चाल तथा कामुकता-भरी 
दृष्टि को देख कर स्त्रिया और बच्चे भयभीत हो रहे थे। बच्चे गलियों मे 
छिप जाते थे, और स्त्रिया धरो मे। गाव में सलन्नाठ था। सब छोग चुपचाप 
अपने अपने घरों में छिपे बेठे थे, उन्हें जिस जिनन्‍स की आवश्यकता होती, वह 
उन्हें गांव में जहां दीख जाती, उठा कर बिना सकोच खच्चर पर लाद 
लेते थे। वे अपनी खूख्वार आखों से गांव के आबाल वृद्ध को घ्रते हुए, घनी 
काली दाढी पर हाथ फेरतें हुए, कमर की तलवार को अनावश्यक रीति पर 
हिलाते हुए निर्भय घूम रहे थे। इक्का-दुक्का स्त्रिया घाट-खेत मे यदि 
ये देख पाते तो छेड देते थे। स्त्रिया भाग कर घरों में घुस जाती थी। 
बृद्ध पुरुष उन्हें देखते ही गर्दन नीची कर लेते थे। युवक गण चुपचाप दांत 
पीसते और ठंडी सास लेते थे। गाव में एक भी ऐसा माई का लाल न 
था जो उनकी लूटपाट और अत्याचार का विरोध करे। 

देखते देखते सूरज सिर पर चढ आया। चारों के शरीर पसीने से भीग 
कर तर हो गये, एक ने कहा--उफ गजब की गर्मी है। जल्दी करो, फिर 
आग' बरसने लगेगी। इस कमबख्त मुल्क में पानी भी तो नहीं बरसता ? 
दूसरे ने कहा--ठीक कहते हो, मगर दही ? दही तो अभी मिला ही नहीं । 
खा साहब हमें खा न जावेगे ? इस पर तीनों ने ठहाका मार कर हँस दिया। 

सामनें एक व॒द्ध पुरुष नंगे बदन अपने घर के द्वार पर चारपाई पर बैठा 
५-६ वर्ष कं एक बालक को खिला रहा था। बालक अत्यन्त सुन्दर और पुष्ट 
था। चारों यम-सद्श व्यक्तियों को अपनी ओर जाते देख बच्चा भय से वृद्ध 
की छाती में चपक रहा। 

उसने भय से कम्पित स्वर में कहा--“बाबां, तुर्के तुर्क आ 
रहे हे ] 7 

“कुछ डर नही बेटे । तुम घर में जाओ।* इतना कह कर वृद्ध ने बालक 
को घर में भेंज दिया । और आप स्वयं आगे बढ कर उनसे पूछने लगा--- आप 
लोग किसे दूढ़ रहे हैं?” 

“दही चाहिए बुड़्ढे, दही । दही घर में है ? एक ने करकंश स्वर में कहा 


ल्‍ै+ ही. >>» 


मेरे यहा दही नही होता, म ब्राह्मण हूँ, यह ठाकुरों का घर है, शायद 
पं. पर ठाकुर घर मे नही हे, तुम ठहरो, में पूछ कर दख आता हूँ ।' वृद्ध ने 
तना कहा और ठाकुर के घर की ओर कदम बढाया। 

हम लोग खुद देख लेगे। यह कह कर चारो उद्ृण्ड सिपाही धर में 
घुसने लगे। 

वृद्ध ने बाधा दे कर कहा--'यह नही हो सकता । वहा' स्त्रिया है, मर्द 
कोई घर पर नहीं हे, तुम लोग भीतर नहीं घुस सकते, तुम लोग यही 
ठहरो। 

बूढे की बात मुँह ही मे रही। उसकी बात का उत्तर दिए बिना ही एक 
सिपाही ने जोर से बूढे के मुह पर घूसा मारा । वृद्ध तुरन्त धरती में गिर पडा। 
चारों सिपाही घर के भीतर घुस गए। और क्षण-भर में दही की भरी हाडी 
उठा कर अपने रास्ते लगे। 

घर के भीतर से स्त्रियों की एक हल्की चीत्कार-ध्वनि सुनाई दी-- 
ग्रामवासी चित्र-लिखित-से देखते रहे। 

[३ | 

ठाकुर अधेड अवस्था को पार कर गया था। उसकी दाढी के १२ आने 
बाल पक गए थे, पर कमर उसकी भुकी न थी, मूछें चढी थी । बह लम्बे 
कद का छरहरा आदमी था, शरीर पर वह केवल धोती पहने था, पर भी 
नगे थे। 

घर लौट कर उसने द्वार ही पर सब' माजरा सुना, वह पल-भर वहा 
रुका, फिर भीतर घर में घुस गया। एक ही मिनट के बाद वह घर से बाहर 
था, उसके हाथ मे नगी तल़वार थी और उसकी भुृकुटी मे बरू पडे थे। उसने 
कसकर दोनो होठों को सम्पुट कर लिया था, उसकी आँखों से आग बरस 
रही थी। 

गाँव के बहुत लोग बहां जमा हो गए थे। सब ने ठाकुर को निपेध किया। 
एक-दो व॒द्धो ने उसका हाथ भी पकड़ कर रोका, छोग उसे समझा रहे थे--- 
बादशाह की सेना से बर रुना ठीक नही, तुच्छ दही की एक हाडी' थी, आखिर 
औकात ही क्या है, जाने दो, अपने बारू-बच्चो की खैर मनाओ, जो हो गया 
सो यया। 


0 


4 पि 


ल्‍न्‍__ दूँ ध्‌ दे 


ठाकुर लोहे के खम्भे की भाति मुट्ठी मे नगी तलवार लिए सब के बीच 
मे खडा था। उसकी दृष्टि उन सब से परे अदृश्य मे थी--सब की बाते सुन 
कर उसने बादल के समान गर्ज-भरे स्वर में कहा-- 

“यह सब ठीक है भाइयो, परन्तु यदि वे मुभसे मागते तो में नाही ने 
करता। आप जानते ही है कि में गरीब राजपूत हूँ, पर फिर भी मेरे द्वार से 
कोई खाली नही हौटता। फिर ये तो राज के आदमी थे, इनकी सेवा करना 
अ्जा का धर्म भी था; परन्तु मेरे घर मे मेरी गैरहाजिरी में घुस जाना ओर 
जबर्दस्ती दही उठा ले जाना में सहन नहीं कर सकता । आज बे दही की हाडी 
ले गए है---कल को वे मेरी बहु-बेटी को भी पकड कर के जा सकते हैं । 

उसने एक कठोर दृष्टि से भीड की ओर दं खा, एक बार कस कर नरूवार 
थाभी, और आगे वढा । वह लोह-पुछप की भाति कदम बढ्ाता जा रहा था । 
भीड पीछे हट गयी थी। धीरे-धीरे उसके पेर तेज होने छगे | गाव के लोग 
चुपचाप पीछे दौइ रहे थे। 

[४ | 


वे चारो मजे में गप्पे उद़ते, खच्चर को टरकाते धीरें-घीरे आग बट 
रहे थे। अभी वे गाव के सिवाने से बाहर न निकल थे। ठाकुर न पीछे से 
ललऊककार बतायी---ख ई रहो, ओ लटेरो 

चारों लौट कर खडे हो गए। देखा---बूढा राजपूत नगी तलवार लिए 
आगे बढ रहा है। उसके पैर में जूता नही है, बदन में सिर्फ घोती है, सिर पर 
पाग है। वह कालपुरुष की भाति आ रहा था। 

चारों मुगकों ने तलवारे खीच ली। राजपूत ने एकाइक पीछे मुंद्द कर 
देखा । क्षण-भर खडे हो कर उसने गाववालों से कहा--- 

“बस, यहां से आगे कोई न बढ़े, भरा अकेले का उनसे ऋग 7 7 ! उसमे 
किसी का साभा नहीं है, मे उनसे नित्रट छंगा।” 

भीड़ वही रुक गयी। छाकुर कुछ फदम और आग बढ़ा । चारो सिपाही 
बहीं खड़े थे । एक क॑ हाथ में दी की हादी थी। ठाकुर ने छलकार कर 
कहा--- मेरी दही की हांगी रख दे ।'' 

सिपाही ने तलवार हवा में घुमा कर कछहा--भदा ब काफिर, नगरी यह 
औकात ! अभी तुझे इस गुरताखी का मजा चखाता हैं। ठाकुर ने सह की 


लक देंएू ++ 


भांति उछाल भरी । वह उन चारोंके बीचमें था । एक ही वार में बकवाद 
करनेवालेका सिर उसने भुट्रेगसा उडा दिया--शेष तीनों जमकर युद्ध करने 
छरूंगे। कुछ छणके बाद दूसरा आदमी भी धराशायी हुआ। शेष दो उछल- 
उछलकर तलवारों की मार करने रंगे। राजपुतने एक जनेऊआ हाथ देकर 
तीसरे के भी दो टुकडे कर दिये। 

चौथा आदमी भाग खड्य हुआ। राजपूतने दहीकी हाडी उठायी और 
और गावकी ओर चला। उसके शरीर में बहुतसे घाव लगे थे, उनसे खून 
की धार बह रही थी। उन सब की उसे परवा न थी। तलवार उसी भांति 
उसकी लोहमुष्टिमे बन्द थी--गावके लोग सनन्‍नाटेमे आकर देख' रहे थे। 
एक शब्द भी किसी के मुह पर न था। ठाकुर आगे-आगे था, और उसकी 
देहसे टपकती हुई रक्तकी बूदोंके दोनो ओर गांवके आबालव॒ुद्ध छौट रहे थे। 

[५] 

घर के आंगन मे आ कर उसने दही की हाठी गोबर से लिपे हुए तुलसी 
के चबूतरे पर रख दी। फिर उसने हाथ जोड कर तुलसी के वृक्ष को नमस्कार 
किया। गाव के लोगो ने उसे घावों पर पट्टी बांधने को कहा, परन्तु उसने एक 
ने सुना। उसने सब को घर से बाहर चले जाने की आज्ञा दी--इसके बाद 
वह घर के भीतर गया। कोठरी का एक कोना खोदा---कुंछ भुहरे और 
सौने के गहने थे। वह पोटली उसने हाथ में छी। अपने ११ वर्ष के एकमात्र 
बेटे का हाथ पकडा और घर के बाहर आया। एक शब्द भी उसके मुख से 
नहीं निकला था। गाक-भर उसके हारपर एकत्रित था--सब विस्मय और 
भयपूर्ण दृष्टि से उसे घूर रहे थे। उसने उसी मेघ के समान गरजती आवाज 
में वृद्ध ब्राह्मण को निकट आने को कहा। पास आने पर उसने पुत्र का हाथ 
और वह सोने की पोटली ब्राह्मण के हाथ में दे कर कहा--- आज से यह पुत्र 
तुम्हारा हुआ दादा ! यह इसके मरण-पोषण का खर्च है।” उसकी वाणी 
कम्पित हुईं। पर उसने गये से गर्दन तान छी। रक्त भर-फर उसके शरीर से 
गिर रहा था। और वह दाहिने हाथ मे तलवार कस कर पकड़े हुए था। 

वह फिर घर के भीतर गया। घर में पत्नी, माता और विधवा बहिन 
थी। तीनों के सामने पहुँच कर उसने कहा--तुम तीतों इस चबूतरे पर आ 
बेठी---और भगवान का स्मरण करो, आज भगवान्‌ की गोद में जाने का 


समय आ गया। तीनों अकम्पित पद से वहा आ कर बैठ गयी। सब से प्रथम 
उसने माता के चरण छू कर पदरज आखों मे लगायी। उसकी तलवार उठी 
और बृद्धा का सिर कट कर तुलसी के पेड पर जा गिरा। इसके बाद उसने 
बहिन के सिर पर हाथ रखा---उसकी आंखों मे तरी आयी, पर दूसरे ही 
क्षण तलवार लडकी की ग्देन पर पडी और उसका सिर भी वृद्धा के बराबर 
जा गिरा। इसके बाद पत्नी की ओर उसने देखा--वह पति के चरणों में 
सिर दिये लोट रही थी। ठाकुर के शरीर का रक्त उसके ऊपर.टपक-टपक 
कर सौभाग्य का सिंचन कर रहा था। ठाकुर ने कहा--उठो, राम्‌ की मां, 
एक बार गले मिल ले, फिर तो हम स्वर्ग में मिलेगे। 

पत्नी को उठा कर उसने हृदय से लगाया। उसने कहा--हम लोगों ने 
बचपन से बुढापे के द्वार तक दोड रूगायी। जीवन में हमने सिर्फ एक पुत्र 
पाया। उसे आज अचानक छोडना पडा। पर कुछ हर्ज नही प्यारी, आज नही 
तो कल मरते ही। राजपूत की भाति मरने में कुछ और ही आनन्द है। आओ, 
अधिक मोह न करो। 

ठकुरानी ने गर्दन भूका दी और वह घुटनों के बल धरती पर बैठ गयी। 
राजपूत ने खूब जोर से अपना होठ दातों में भीचा, उनसे रक्त भी निकल 
आया। उसने एक भरपूर हाथ पत्नी की गर्देत पर दिया और वह सिर भी 
अपनी सास की पंक्ति मे जा गिरा। 

क्षण-भर उसने तीनों देवियों की फडकती लाझों को देखा। इसके बाद 
उसने घर में चारों तरफ दृष्टि दौडायी। रसोई से आग जल रही थी। घी 
का बड़ा-सा हण्डा भरा धरा था--वह सब उसने छप्पर पर उड्ेल दिया, 
घर धांय-धाय जलने लगा। 

अब वह उसी तलवार को उसी प्रकार कस कर कलाई में थाम्हे बाहर 
आया। गाव के नर-तारी घाड़ें मार-मार कर रो रहे थे। 

वह चबूतरे पर चढ़ कर इधर-उधर टहलने लरूगा। 

[६ | 

अल्ला-हो-अकबर के विकट चीत्कार से गांववारों के कलेजे दहल गए। 
स्त्रियां और बच्चे भाग कर घरों में घुस गए। मुगल सेना तलबारें चमकाती 
हुई घड़घड़ाती गाँव में घुस आयीं। छोग भयभीत होकर भागे। ठाकुर ने 


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कठोर दुष्टि से एक बार गाव के कायर पुरुषों को देखा। वह एक हुकार भर 
कर भीमवेग से शत्रुओं पर टूट पडा। सैकडों शस्त्र क्षण भर में उसक॑ घायल 
शरीरमसे धस गए और उसके अग कट कठकर गिरने छूगे। वह भी गिरा। 

उसने अपनी मुमूर्ष आँखों को एक बार उठाया। उसने देखा--गाव 
का बच्चा-बच्चा तलवारे ले कर शत्र-सेना पर टूट पडता है। उसने सतोष 
की एक सास ली और दम तोड दिया। 

वह गाव मुगलों ने जला कर खाक कर दिया। परन्तु जब तक गांव का 
एक बच्चा भी जिन्दा रहा--तलवार चलाता रहा। 


निदिया लागी 


[ भगवतीग्रसाद बाजपेयी ] 


कालेज से लौटते समय में अक्सर अपने नये बेंगले को देखता हुआ घर 
आया करता। उन दिनों वह तैयार हो रहा था। एक औवरसियर साहब 
रोजाना, सुबह-शाम, देख-रेख के लिए आ जाते थे। वे मभले-भेया के 
सहपाठी मित्रों में से थे। लम्बा कद, गौर वर्ण, लम्बी नाक---खूबसूरत और 
मुख पर उल्लास का अभिनव अछोक। गम्भीर भी होते तो प्राय मालूम 
यही होता कि मुसकरा रहे हे । 

नाम उनका बेनीमाधव था। और अवस्था ? अवस्था उनकी अब 
पेतालिस वर्ष से ऊपर जान पडती थी। मिस्त्री और मजदूर, सब मिला 
कर, कोई पचीस-तीस व्यक्ति काम कर रहे थे। मजदूरों में कुछ स्त्रियाँ 
भौथी। 

एक दिन मेने देखा छत कूटी जा रही है। कटने वालो मे स्त्रियाँ द्वी है. 
अधिकाश रूप से । दो पुरुष भी हे, लेकिन वे जरा हटकर, एक कोने में हे । 
स्त्रियाँ छत कूटती हुई एक गाना गा रही हे। यों उनका गायन कुछ विशेष 
भधुर नही है; किन्तु अनेक सम्मिलित स्वरों के बीच मे एक अत्यन्त कीमरूू 
स्वर भी है। तभी में उनके पास जाने को तत्पर हो गया। मुझे देखता था कि 
वह जो गाना गा रही है और जिसका कठ इतना मधुर है, उसका रूप भी' 
कुछ है या नही। में मानता हूँ कि यह मेरी दुर्बलता थी; किन्तु उन दिलों 
मेरी' समझ में यह बात कैसे आती ! 

एकाएक पहले तो ओवरसियर साहब सामने आ गये। बौछे---आ 
गये छोटे-भैया ! 

मैंने उनकी ओर देख कर जरा-मा मुसकरा दिया ओर कहा-“-जान तो 
मुझे भी ऐसा ही पडता है। 

हा 


हँसते हुए उन्होने तब कहा--लेकित दर-असल आप आये नहीं। आप 
ममभकते है दुनिया की नजरों मे जो आप यहाँ मौजूद है, इतने से ही में यह 
मान ले कि आप पूरे सोलह-आने-भर आ गये हे” और जो कही आप 
अपना कुछ छोड आये हो, तो ? 

वे तब इतना कहते-कहते मेरे निकट--बिकूकुल निकट आ गये ! 
बोले---जब में अपने इजीनियरिंग कालेज मे पढता था, तब में कैसा था, सच 
जानिए, आपको देख क्र जब मुझे उसकी याद आ जाती है, तो जी मसोसने 
लगता है । तबीअत चाहती है कि अपने को क्या कर डालें, जिससे कुछ शान्ति 
मिल्ले। लेकिन फिर यही सोच कर सन्‍्तोष कर लेता हूँ कि मनुष्य की तृप्णा 
का अन्त नहीं है। न आकाश मे, न महासागर के अतल से, न गिर-गद्द र 
मे-संसार में कही भी, कोई ऐसा स्थान नही मिल सकता, जहाँ पहुँच कर 
मनुष्य कामना से मुक्त हो सके। 

बेती बाबू के मूल पर अगमनीय गम्भीरता की छाप थी, यद्यपि अपने 
विमल हास से व॑ उसे छिपाना चाहते थे। मेने कहा--आप मेरे अध्ययन 
की चीज है, यह मुझे आज मालम हुआ। 

एक ओर चहूते हुए वे बोले--अभी आप को कुछ भी नहीं मालूम 
हुआ है । 

किन्तु बेनी वाब्‌ की इतनी-सी बात से मेरे मन का कुतूहुल अभी शान्त 
नहीं हो पाया था, इंसलिए में उनके पीछे-पीछे चल दिया। 

घूमते, काम देखते हुए, एक मिस्त्री के पास जा कर वे खड़े हौ“गये। 
वह आर (87०) बनाने जा रहा था। बोले--देखों जी मिस्त्री, पत्तियाँ 
और फूल बनाना ही काफी नही है। टहनी और उसमें उभड़े हुए कांटे 
भी दिखाने होते हैं। माना कि नकरू तकल है, असरः चीज वह कभी 
हो नही सकती; किन्तु असलछ चीज की जो असलियत है, गुण के साथ 
दुर्गंण भी, तकल में यदि उसको स्पष्ट न किया जा सका, तो वह नकरू भी 
नकल नही हो सकती । बनाने में तुझको अगर दिक्कत हो, तो में नमूना 
दे जा सकता हूँ; लेकिन मेरी तबीअत की चीज अगर तुम न बना सके, 
तौ मे कह नही सकता कि आगे चर कर तुम्हें उसका क्या फल भोगना 
पड़ेगा । 


मिस्त्री वृद्ध था। उसके बाल पक गये थे। उसकी आँखों पर पुराती चाल 
का चश्मा चढ़ा हुआ था। बडे गौर से वह बेनी बाबू की ओर देखने लगा, 
लेकिन उसने कुछ कहा नहीं। तब बेनी बाबू वहाँ और अधिक ठहर न 
सके । 

अब वे आगन में एक टब के पास खडे थे। नर का पानी टब मे गिर रहा 
था। में थोड़ा पीछे था। जब उनके निकट पहुँचा, तो वे बोले---आपने इस 
मिस्त्री की जाँखों को देखा ? वह कुछ कह नही सका था; लेकिन उसकी 
आँखों ने जो बात कह दी, में उसे सहन नही कर सका। वह समभता है, मेने 
फ्ल भोगने की बात कह के उसको चोट पहुँचाने, उसका अपमान करने, 
की चेष्टा की है, किन्तु वह नही जानता, जान भी नही सकता, कि मेरी बात 
का कोई उत्तर न देकर उसने मुझपर कसा भयकर आघात किया है ? एक 
वह नहीं, मालूम नहीं, कितने आदमी आपको ऐसे मिल सकते हे, जो मुझे 
गरूत समभते है। आज पनद्रह वर्षो से, बल्कि और भी अधिक काल से, मुझे 
जहाँ-कही भी मकान बनवाने का काम पड़ा है, मेने इस मिस्त्री को अवश्य 
बुलाया है । मेने काम के सम्बन्ध मे कभी-कभी तो उसे इतना डॉटा है कि वह 
रो दिया है, तो भी कभी ऐसा अवसर नही आया कि उसने मुभे तीखा उत्तर 
दिया हो। उसका वही पुराना चश्मा है, वेसी ही भीतर तक प्रविष्ट हो जाने 
वाली आखे। उसने कभी मजदूरी मुभसे तय नहीं की। और कभी ऐसा 
अवसर नही आया, जब काम समाप्त हो जाने पर, मजदूरी के अतिरिक्त, 
उसने दस-पन्द्रह रुपये पुरस्कार न प्राप्त किये हों .. . .किन्तु इन सब बातो 
को अच्छी तरह समभलें हुए भी डॉटना तो पडता ही है, क्योंकि उससे कला- 
कार की सूप्त कल्पना को जागरण मिलता है। 

अब बेनी बाबू घृमते-फिरते वही जा पहुँचे, जहाँ स्त्रियाँ छत कूट रही 
थीं। उन्होंने एकाएक जो हैदधारी हम लोगों को देखा, तो उनका गाना बन्द 
हो गया। तब मेरे मन में आया कि इससे तो यही अच्छा था कि हम छोग 
यहाँ न आते। और कुछ नहीं, तो सगीत का बह मृद्ुल स्वर तो काएों में 
पडता। और वह सगीत भी कैसा ?--एक दम असाधारण। उसकी ठेक 
तो कभी भूछ ही नही सकती। जैसी नन्‍हीं वैसी ही भोली ।--- 

'निदिया छाग्री---में सोब गई गुइयाँ ! 


कया घ्‌ र्‌ कम्ब० 


बेनी बाव्‌ ने खडें-खडे इधर उधर देखा और कहा--देखो इधर, इस 
तरह नही पीठना होता कि चोटों की आवाज को सिलसिला बिगड़ जाय। 
मुगरी की आवाज, सारी-की-सारी एक बारगी, एक साथ, होनी चाहिये। 
और देखो, आज इस छत की पिटाई का काम खतम हो जाना. चाहिये । 

रामलखन बौला--सरकार, आज केसे पूरा होगा ? दिच ही कितना 
रह गया है। 

बको मत रामलखन ! काम नही पूरा होगा, तो पैसा भी पूरा नहीं 
होगा। समझते हो न। काम का ही दूसरा नाम पैसा है।' 

रामलूखन चुप रह गया। 

बेनी बाबू भी चल दिये। छेकिन चलने के साथ ही पिटाई की आवाज, 
उसकी धमक, उसकी गति और चूड़ियों की खनक और निदिया लाग्री का 
स्वर अतिशय गम्भीर हो गया। सेने बेनी बाबू से कहा---आप काम लेना 
खूब जानते हैं। 

वे हँसते-हेंसते बोले--भे जानता बहुत-कुछ हूँ छोठे-भैया, लेकिन 
जानना ही काफी नही होता। ज्ञान से भी बढ कर जो वस्तु है, उसको भी तो 
जानना होता है। और उसे में अभी तक जान नहीं सका। 

मेंने पूछ दिया---वह क्या ? 

वे बौले---पसत्य का ग्रहण । 

मेने कहा--सिर्फ पहेली न कहिए, उसे समभाते भी चलिए। 

वे तब एक पेड के नीचे, सडक पर ही एक ओर, कुसियाँ डलूवा कर, 
बैठ गये और बीले---ये स्त्रियों, जो यहाँ मजदूरी करने आई हूँ, कितने सबेरे 
घर से चली है और कब पहुंचेंगी ! कोई घर में अपने बच्चे को छोड़ आई 
है, किसी का पति खेत में काम करने गया होगा। किसी के कोई होगा ही 
नहीं। और काम करते-करते इनको अगर उनकी सुधि आ ही जाती है और 
काम की गति में क्षणिक मन्दता उत्पन्न हो ही उठती है, तो वह भी' आज की 
हमारी इस सामाजिक व्यवस्था को सहन नही है। और तारीफ यह है कि 
हम समझ छेते है कि हम बडे ज्ञानी है । हम यही देख कर संतोष कर लेते हें 
कि ओ.इब्ी यहाँ पर मजदूरी कर रही है, हमको सिर्फ उसी से मतलब है, 
उसी की मजदूरी हम दे रहे है; किन्तु हम यह सोचने की जरूरत ही नहीं 


रतन ज्‌ पा 


समभंते कि वह स्त्री अपने जगत्‌ लेकर क्या है। जो बच्चा उसने उत्पन्न किया 
है, वह भी तो अपने पालन-पोषण का भार अपनी माँ पर रखता है; पर हम 
लोग वहाँ तक सोचना ही नही चाहते। हमारे स्वार्थो ने सत्य को कितनी 
निरंकुशता के साथ दबा रखा हैं। 

बेनी बाबू चुप हो गये। एक ओर खुले अम्बर में, विहगावलियाँ अपने 
पंखों को फैलाये, नितान्त निबंन्ध, हँसी-खुशी के साथ, उडी चली जा रही 
थी। एक साथ हम दोनों उधर देखने रूगे। किन्तु बराबर उधर देखने के बदले 
मेंने एक बार फिर बेनी बाबू को ही देखा। उनके मस्तक के ऊपर चेंदोवा 
खुल आया था। उसमे नन्‍हें-नन्‍्हें एक-आध बाल ही अवशिष्ट थे। वे अब 
साध्य आलोक में चमक रहे थे । उनकी खुली आँखे यद्यपि चदमे के भीतर थी, 
तो भी मुझे प्रतीत हुआ, जैसे वे कुछ और भी फैल गई है । इसी क्षण वे बोले--- 
अब यह काम और आगे न करूँगा। लेकिन 

उनका यह वाक्य अधूरा रह गया। जान पडा, वे कोई निरचय कर 
रहे है और रुक-रुक जाते है। रुक इसलिए नही जाते कि रुकना चाहते हे। 
रुक इसलिए जाते हे कि रुकना नही चाहते। 

तभी वे फिर बोले---तुम उस बात को अभी समझ नही सकोगे, लेकिन 
ऐसी बात नही है कि उस बात के समभने की तुम्हारी क्षमता कुन्द है। देखता 
हूँ, तुम विचारशील हो। और तभी में कहना भी चाहता हूँ कि आदमी तो 
अपने विश्वासों को लेकर खडा है, लेकिन जो आदमी अपने विश्वासों को 
लेकर भी नही खडा होता, वह भी क्या आदमी है ? वह आदमी नही है। वह 
पश्षु है--पशु। केकिन कैसे कहूँ कि पशु भी अपने विश्वासों के विरुद्ध खडा 
हो सकने वाला प्राणी है। बह तो . . . वह तो, बल्कि अपनी प्रवृत्तियों का ही 
स्वरूप होता है। और वह मनुष्य ? छि; इससे भी अधम क्या कोई स्थिति है ! 

मेंने देखा, यह वातावरण तो अब अतिशय गम्भीर हो गया है ! और 
उन दिनों इस तरह की निरी गस्भीरता मुझे जरा कम पसन्द आती थी; 
बल्कि साथी छोग जब ऐसे व्यक्तियों का मजाक उडाते, तो उस दल में में 
भी सम्मिलित हो जाया करता था। बात यह थी कि उस समय एक दूसरा 
दृष्टिकोण हम छोगों के सामने रहता था। हम सब यही मानते थे कि जीवन 
तो एक हेंसी-खेल की चीज है । सर्वधा अनिश्चित और चरम अकल्पित जीवन 


पल फप्ड कक 


के थोडे-से दिनों को रोना रोने, या सोच-विचार में निपीडित-निर्जीव कर 
डालने में कौन-सी महत्ता हैं ? 

इसीलिए मेने कह दिया--इन लोगों के गाने में बीच का यह--होँ 
यह स्वर मुझे बडा कोमल लगता है। 

निर्मेषमात्र मे, सम्यक्‌ बदल कर--- 

जाओ नजदीक से जाकर सुन आओ। हैट यही रख जाओ। फिर भी 
अगर गाना बन्द कर दे, तो कहना---काम में हज नही होना चाहिए; क्योंकि 
गाने के साथ छत कूटने का काम अधिक अच्छा होता है, ऐसा में सुनता आया 
हैं ।--बेनी बाबू ने मुसकराते हुए कहा। 

में चला गया। चुपचाप बहुत धीरे-धीरे, पैर सम्हाल-सम्हाल कर। तो 
भी उनको मालूम हो ही गया। काम की गति में कुछ तीन्नरता जरूर जान 
पडी, किन्तु गाना बन्द हो गया। 

मेने कहा--तुम लोगों ने गाना क्‍यों बन्द कर दिया ? 

खिलखिल के कुछ मदिर कलहास । कभी इधर---कभी उधर | 

किसी ने अपनी सखी से कहा, उसे जरा-सा धक्का देकर---गा री 
पत्ती, चुप क्यो हो गई ? 

तू ही क्यो नही गाती ? छोटे-भैया के सामने . . 

हैँ, बडी लाजवन्ती बनी है ! जेसे दुलहे का मुह ही न देखा हो ! 

मेने कहना चाहा---छडो मत। में चला जाता हूँ । लेकित में कुछ कह 
न सका। चुपचाप चला आया । चला तो आया; किन्तु उस खिलखिरक और 
अपने सामने गाने से लजानेवाली उस पत्ती को मेंने फिर देखने की चेष्टा 
नही की। 

कैसे उल्लास के साथ आया था , किन्तु कैसा भीषण दन्द्र केकर चल दिया। 

बेनी बाबू ने बडे प्यार से पूछा---कह जाओ। 

मेने कहा--क्या कह जाऊँ ? वही बात हुई। उन छोगों ने गाना बन्द 
कर दिया। 

'छिए तुमने वह बात नहीं कही ।/ 

'उसे में कह नही सका।' 

(तो यह कहो कि तुम खुद ही लजा गये ! 


ढ-न्‍न प्‌ ५ जिन 


में चुप रहा। जिसने कभी चोरी नही की, जो यह भी नहीं जानता कि 
चोरी की केसे जाती है, वह चीज क्या है, यदि वह कभी उसके दलदल में पड 
जायगा, तो उससे सफाई के साथ निकल ही केसे सकेगा ? वह तो मिश्चय- 
पूर्वक फेंस जायगा। वही गति मेरी हुईं। क्या में जानता था कि बेनी बाबू 
मुझे ऐसी जगह ले जायेंगे, जहाँ पहुँच कर फिर मुक्ति का कोई मार्ग ही 
दृष्टिगत न होगा ? 

बेनी बाबू बोले--अच्छा, एक काम कर आओ । रामलूखन से कहना, 
अगर आज यह काम किसी तरह पूरा होता न दीख पड, तो कल ही पूरा कर 
डालना ठीक होगा। बेनी बाब्‌ से मेने कह दिया है कि मजदूरों से उतना ही 
काम लिया जाय, जितना वे कर सके। 

में उनकी ओर देखता रह गया । मेरे मन में आया--यह आदमी है 
कि देवता | 

मुझे अवाक्‌ देख कर उन्होंने पुछा--सोचते क्‍या हो? 

मेने कहा--कुछ नहीं। इतने दिन से आप का परिचय प्राप्त है; किन्तु 
कभी एसा अवसर नही आया कि आप को इतने निकट से देख पाता। 

वे बोले---पह सत्र कोई चीज नही है छोटे-सैया ! न्याय और सत्य 
से हम कितने दूर रहते है, शायद हम खुद नही जानते च्छा जाओ, 
जो काम तुम्हें दिया गया है, उसको पूरा तो कर आओ। 

में फिर उसी छत पर जा पहुँचा; पर अब की बार मेंने देखा, गान चरू 
रहा है। लेकिन एक ही गाना तो दिन-भर चक नही सकता। तो भी मुझे 
उसी गाने के सुनने की इच्छा हो आई। साथ ही मेने यह भी सोच लिया कि 
अभी कुछ समय पहले बेनी बाबू ने कहा था, मनुष्य की कामताओं का अन्त 
नहीं है । 

मेंने जो रामलखन को बुलवाया, तो वह सिटपिटा गया। बोला--- 
छोटे सरकार, क्या हुक्म हे ? 

मेने कहा--जेनी बाबू क्‍या तुम लोगों के साथ कुछ ज्यादा सख्ती से 
काम छेते है 

वह चुप ही बना रहा, सत्य-क्ृष्ण कुछ भी नहीं कह सका। तब मेने 
समझ लिया, डर के कारण वह उनके विरुद्ध कुछ कहना नही चाहता, इसी- 


- ५६ - 


लिए चुप है; लेकिन जब मेने कहा--में उनसे कुछ कहूेँगा नही। में 
तो सिर्फ असल बात जानना चाहता हूँ। बिलकुल निडर होकर 
बतलाओ। 

तब उसने कहा--काम सख्ती से लेते हे, तो मजदूरी भी तो दो पैसा 
ज्यादा और वक्‍त पर देते हें । ऐसे मालिक मिले तो में जिन्दगी-भर उनकी 
गुलामी करूँ। 

सेने कहा--तुम ठीक कहते हो। उन्होंने मुझसे कहला भेजा है कि अगर 
काम आज नही पूरा होता है, तो कल ही पूरा कर डालना । ज्यादा तकलीफ 
उठाने की जरूरत नही है। 

रामलखन बोला--पर छोटे भैया, उन्होंने पहले ही बहुत सौच-समभक 
कर हुक्म दिया था। काम अगर आज पूरा न होता, तो कूटने के लिए चुना 
कल हम लोगो को इस हालत में न मिलता। वह सूख जाता । तब उस 
पर कुटाई ठीक तरह से कैसे होती ? इसके सिवा कल गुड़ियों का त्योहार 
है---छूट्टी का दिन है। मेने पीछे जो सोचा, तो मुझे इन सब बातों का 
ख्याल आ गया। काम पूरा हो जायगा। बहुत-कुछ तो हो भी गया है। 
थोडा-सा ही बाकी रह गया है। वह भी शाम होते-होते पूरा ही जायगा। 
तकलीफ तो थोडी हुई--किसी-किसी के हाथों मे छाले पढ़ गये, छेकिस 
थह बात आप उनसे जाकर न कहें सरकार, इतनी बात मेरी भी 
रख लें। 

रामलूखन की बात मान कर सचमुच मेने बेनी बाबू से यह नहीं कहा 
कि कुछ स्त्रियों के हाथों में छाले पड़ गये हैं। 

किन्तु उसी दिन, सायकारू। 

एक ओर जीने की दीवार गिर गई। छुट्टी हो गई थी। मजदूर लोग 
इधर-उधर से आ-आकर जाने लगे थे कि अररर धम्‌ का भीषण स्वर और 
एक क्षीण आह ! 

लोग दौड़ पड़े। छोग गिने भी गये। सब मिलाकर उन्तीस आदमी 
आज काम पर थे, लेकिन है केवल सत्ताइस ! 

“-तौो दो आदमी दब गये, कया ? 

“-हाँ, यह हलका स्वर जो आ रहा है ! यह | --यह ! 


ईटे उठाई जाने लगी, तो एक स्त्री ने कहा--हाय ! पत्ती है--पत्ती। 
तभी में सोच रही थी--वह दीख नही पडती, झ्ायद आगे निकरू गई ! 
हाय यह तो चल बसी ! 

उससे कौन कहता कि हाँ, वह आगे निकल गई! 

लेकिन एक क्षीण स्वर तब भी ध्वनित होता रहा ' 

“अरे और उठाओ ईटो को। हो, इस खजड को। अभी एक आदमी 
और भी तो है। 

एक साथ कई आदमियो ने मिल कर एक दीवार के टुकडे को उठाया। 
वह इंटों के ऊपर गिरा था और बीच मे थोडी जगह शेष रह गई थी। उसी मे 
मुडा हुआ अचेत मिला गिरिधर ! 

कुछ दिनो में गिस्धिर अच्छा हो गया। उसकी एक रीढ टूट गई थी; 
लेकिन उसका जीवन उसकी रीढ से अधिक बलिप्ट जो था। 

उस बंगले को, फिर आगे, बेनी बाबू नही बनवा सकें। वुःछ दिनों तक 
काम बन्द रहा ओर वे बीमार पड गये । 

मन्‌ प्य का यह जीवन क्या इतना अस्थिर है ! क्‍या वह फूल के दल से 
भी अधिक मृदुल है ? क्या वह छई-मुई है ” उन दिनो में यही सोचता रहा' 
था। वे बीमार थे, और उनकी बीमारी बढती जाती थी। में देख रहा था, 
शायद बनी बाबू तैयारी कर रहे है ! लेकिन एक दिन मेने उन्हे दूसरे रूप में 
देखा। मेने देखा कि मृत्यु को उन्होंने मसरू डाला है, पीस डाला है! वह 
छठपटा रही है! वह भाग जाना चाहती है! 

वे एक पलंग पर लेटे हुए थे, बहुत धीरे धीरे बाते कर 
रहे थे। उनके पास एक नौजवान बैठा हुआ था। वह मौन था 
और बेनी बाबू उससे कुछ पूछ रहे थे। उसी क्षण में पहुँच गया। वे उठने 
को हुए, तो नौकर ने उन्हें उठा दिया और उनके पीछे तकिये छूगा दिये । 
पहले आखों पर चदमा नहीं था; अब उन्होंने चश्मा चढ़ा लिया। 

संकेत पाकर में उनके पास हौ कुरसी डाल कर बेठ गया था। 

के बोले--सुनते हो मृल्लू, में तुमको रोने नही दूंगा। रोने दूं, तो में 
अपने को खो दूगा। लेकिन में इतना सस्ता नहीं हूँ। में मरना नहीं चाहता, 
इसीलिए मैं तुमको प्रसन्न देखना चाहता हेँ। बतराओ, तुम किस तरह. 


ला पट 


से प्रसन्न हो सकते हो ” में और साफ कर दूं ? में तुमको कुछ देना चाहता 
हैँ । बोलो, तुम कितने रुपये पाकर खुश हौ सकते हो ? लेकिन तुम यह सोचने 
की भूल न करना कि वे रुपये तुम्हारी स्त्री की कीमत है ! एक स्त्री---एक 
नवयुवती, एक सुन्दरी---को, कया रुपयों से तोला जा सकता है ? छि. यह 
तो एक मूर्खता की बात है---जंगलीपन की । लेकिन मेने अभी तुमको बतलाया 
न, में तुमको खुश करना चाहता हूँ। 

“-+भऔह एक नवयथुवती--एक सुन्दरी ! 

“सी क्या पत्ती सुन्दर थी ? 

“तो उसका कठ ही कोमल न था, वरन्‌ 

बेनी बाबू बोले--में जानता हूँ, तुम कुछ कहोगे नहीं। अच्छा, तो में 
ही कहे देता ह---उसके बच्चे की परवरिश के लिए, दस रुपये हर महीने 
मुभसे बराबर ले जाया करना ! समझे ! यह लो दस रुपये ! 
आज पहली तारीख है। हर महीने की पहिली तारीख को ले जाया 
करना । 

जेब से नोट निकाल कर उन्होंने मुल्लू के आगे फेंक दिया। मुल्लू तब 
कितना खुश था इसको मेने जाना। किन्तु बेनी बाबू ने जितना-कुछ जाना, 
उसको में न जान सका। 

मुल्ल जब छलकते आनन्दाश्रुओं के साथ चल दिया, तो बेनी बाबू 
बोले---मेरा खयाल है, अब यह खुश रहेगा । क्‍यों ” तुम क्या सोचते हो ? 

में चकित था, प्रतिहत था, अभिभूत भी था, तो भी मेने कह दिया--- 
आपने यह क्‍या किया ? 

ओह तुम मुभसे पूछते हो, छोटे भैया | ---यह क्या किया ! यह मेने 
अपने को भुलाने के लिए किया है ; क्योंकि मनुष्य अपने को भुलावे में रखने 
का अभ्यासी है ! मेने देखा--मे एक भूल कर रहा हूँ | ---मे मृत्यु को बुरा 
रहा हूँ। तब मेने सोचा--मे ऐसी भूल नहीं करूँग्रा, जिसमें अपने आपको 
भी में भुला सक्‌ ! जीवन में एक ऐसा क्षण भी आता है, जब हमको अपने- 
आपको भूलाना पडता है। यह मेरा ऐसा ही क्षण है। लेकिन यह मेरी भूल 
नही है। यह तो मेरा नवजीवन है---जागरण ।' 

कं क्र कः 


किक प्‌ ९ करन 


यह कच्या तो झी त्तामराप्त हो गई है । किन्तु इस कथा के प्राण में जो 
अन्तर्कपा है उच्सी कौ बज कहता हूँ। उपर्युक्त घटना के पीछे कुछ वत्सर 
और जूह गय्नेहें ।स्यू कड़ा अब मु्भे रहने के लिए दिया गया है। में अब 
अकेला ही द समें रहता ह॥कई सहस्र पुस्तकों के महत्‌ ज्ञान से आवृत मैं--- 
लोग बहते छै--ओफेझर [ह। जीवन और जगत्‌ का तत्वदर्शी। लेकिन से 
अपनी सम्तस्या। कि पलकों ?---अपना अन्तर खोलकर किसको दिखलाऊँ ? 
बच्चे सुतते तंज हल्से--बीबी सुने तो कहे---पागल हो गये हो ! 

कभी-कभी एब्तब्केलवोर सन्नाटे में स्वप्नाविष्ट-सा में कुछ अस्पष्ट 
व्वनियाँ सुनने स्टाक्ता हूैं। कोई खिल-खिल हँस रही हैं। कोई धक्का देकर 
कह रही है---॥आ पै फ्की! और च्रियाँ खनक उठती है, छत कुटन रूगती हैँ 
औरण्ककोमपत--भ्सत्नर्व व्कोसमल गायन स्वर फूट पडता है---निदिया लागी 

ओर उस्तके दृध्थोंड्मेज्यों छाले प८ गये है वे वहाँ से उठकर मेरे हृदय 
से आकर नच्चित्कल्गे हूँ 


अपना-अपना भाग्य 
[ जेनेन्द्रकुमार ] 


बहुत कुछ निरुद्श्य घूम चुकने पर हम सडक के किनारे की एक बेंच 
पुर बैठ गये। 

नेनीताल की सध्या धीरे-धीरे उतर रही थी। रुई के रेशें से, भाष-से 
बादल हमारे सिरों को छ-छकर बेरोक घ॒म रहे थे। हल्के प्रकाश और अँधि- 
यारी से रंगकर कभी वे नीले दीखते, कभी सफेद और फिर देर मे अरुण पड़ 
जाते, वे जैसे हमारे साथ खेलना चाह रहे थे। 

पीछे हमारे पोलोवाला मैदान फैला था। सामने अँगरेजों का एक 
प्रमोद-गृह था, जहाँ सुहावना, रसीला बाजा बज रहा था और पादर्व में था 
वही सुरम्य अनुपम नैनीताल । 

ताल मे किद्तिया अपने सफेद पाल उडाती हुई एक दो अँगरेज् यात्रियों 
को लेकर, इधर-से-उधर और उधर-से-इघर खेल रही थी। कही कुछ अँगरेज् 
एक-एक देवी सामने प्रति-स्थापित कर, अपनी सुई सी शक्ल की 
डोंगियों को, मानो शर्ते बॉघकर सरपट दौडा रहे थे। कही किनारे पर 
कुछ साहब अपनी बसी डाले, सघेर्य, एकाग्र, एकस्च, एकनिष्ठ मछली- 
चिन्तन कर रहे थे। 

पीछे पोलो-लॉन में बच्चे किलकारियाँ भरते हुए हाकी खेल रहे थे 
शोर, मार-पीट, गाली-गलौज भी जैसे खेल का ही अदा था। इस तमाम 
खेल को उतने क्षणो का उद्देश्य बचा, वे बाऊुक अपना सारा मन, सारी देह, 
समग्र बढ और समूची विद्या लगाकर मानो खतम कर देना चाहते थे। 
उन्हें जागे की चिन्ता न थी, बीते का खयाल न था। वे शुद्ध तत्काल के प्राणी 
थे। वे शब्द की सम्पूर्ण सचाई के साथ जीवित थे । 


#+ हैं है 


सडक पर से नर-दारियों का अविरल प्रवाह आ रहा था और जा 
रहा था। उसका न ओर था, न छोर। यह प्रवाह कहाँ जा रहा था, और कहाँ 
से आ रहा था, कौत बता सकता है? उस उम्र के, सब तरह के लोग 
उसमें थे। मानो मनुष्यता के नमूनो का बाजार सजकर सामने से इठ- 
लाता निकला चला जा रहा हो। 

अधिकार-गर्व में तने अगरेज उसमें थे और चिथडो से सजे घोडों की 
बाग थामें, वे पहाडी उसमे थे, जिन्होंने अपनी प्रतिष्ठा और सम्मान को 
कुचलकर गृन्य बना लिया है और जो बडी तत्परता से दुम हिलाना सीख 
गये है । 

भागते, खेलते, हँसते, ग़रारत करते, छाल-लाल अगरेज़-बच्चे थे और 
पीली-मीली आँखे फाटे, पिता की उंगली पकडकर चलते हुए अपने हिन्दु- 
स्‍तानी नौनिहाल भो थे। 

अगरेज़ पिता थे, जो अपने बच्चों के साथ भाग रहे थे, हँस रहे थे और 
खेल रहे थे। उधर भारतीय पिवृदेव भी थे, जो बुजुर्गों को अपने चारों तरफ 
लपेटे घन सम्पन्नता के लक्षणों का प्रदर्शत करते हुए चल रहे थे। 

अगरेज-रमणियाँ थी; जो धीरे नहीं चलती थी, तेज चलती थी। 
उन्हें न चलने में थकावट आती थी, न हँसने में मौज आती थी। कसरत के 
नाम पर घोड़े पर भी बैठ सकती थी, और घोडे के साथ-ही-साथ, ज़रा जी 
होते ही, किसी-किसी हिन्दुस्तानी पर कोडे भी फटकार सकती थीं। बह 
दो-दो, तीन-तीन, चार-चार की टोलियो मे नि.शंक, निरापद इस प्रवाह में 
मानों अपने स्थान को जानती हुई, सडक पर से चलती जा रही थी। 

उधर हमारी भारत की कलू-छक्ष्मी सड़क के बिलकुल किनारे, दामन 
बचाती और सम्हालूती हुई, साडी की कई तहों में सिमट-सिमटकर, छोक- 
लाज-स्त्रीत्व और भारतीय गश्मिा के आदर्श को अपने परिवेष्टनों से छिपा- 
कर सहमी-सहमी धरती में आख़ गांड, क़दम-क़दम बढ़ रही थी। 

इसके साथ ही भारतीयता का एक और नमना था। अपने कालेपन को 
खुरच-खुरतकर बहा देने की इच्छा करनवाले अगरेज़ी-दा पुरुषोषम भी थे, 
जो नेटियों को देखकर मुह फेर लेते थे और अँगरेज को देखकर आँखें बिछा 
देते थे और दुम हिलाने लगते थे। वैमे वह अकब्कर चलते थे---मानो भारत- 


भूमि को इसी अकड के साथ कुचल-कुचलकर चलने का उन्हें अधिकार 
मिला 


रउिए 2] 


(२ ) 

घण्टे-के-घण्टे सरक गये । अन्धकार गाढा हो गया। बादल सफेद होकर 
जम गये। मनुष्यो का वह ताता एक-एक कर ' क्षीण हो गया। अब 
इकक्‍्का-दुवका आदमी सडक पर छतरी लरूग़ाकर तिकरू रहा था। हम 
वही-के-वही बैठे थे। सर्दी-सी मालम हुई। हमारे ओवर-कोट भीग 
गये थे। 

पीछे फिरकर देखा । वह छाल बर्फ की चादर की तरह बिलकुल स्तब्घ 
और सुन्न पडा था। 

सब ओर सन्नाटा था । तल्‍लीताल की बिजली की रोशनियाँ दीपमालिका- 
सी जगमगा रही थी। वह जगमगाहट दो मील तक फंले हुए प्रकृति के जल- 
दर्पण पर प्रतिबिम्बित हो रही थी और दर्पण का कॉपता हुआ, लहरे लंता 
हुआ, वह जल प्रतिबिम्बों को सौ गूता, हजार गुना करके, उनके प्रकाश को 
मानो एकत्र और प्‌जीभूत करके व्याप्त कर रहा था। पहाड़ो के सिर पर 
की रोशनियाँ तारो-सी जान पडती थी। 

हमारे देखते-देखते एक घने परे ने आकर सबको ढक दिया। रोशनियाँ 
मानो मर गई। जगमगाहट लुप्त हो गई। वह काले-काले भूत-से पहाड 
भी इस सफ़ेद पर्दे के पीछे छिप गये। पास की वस्तु भी न दीखने लगी। 
मानो यह घनीभूत प्रलय थी। सब कुछ इसी घनी गहरी सफ़ेंदी में दब 
गया। एक शुक्र महासागर में फेलकर संसूति के सारे अस्तित्व को 
डुबो दिया। ऊपर-तीचे चारो तरफ, वह निर्भेद्च, सफेद शुन्यता ही फैली 
हुई थी। 

ऐसा घना कुहरा हमने कभी नही देखा था। वहू ठप-टप टपक रहा था। 

मार्ग अब बिलकुल निर्जन-चुप था। वह प्रवाह न जाने किस घोसलों 
से जा छिपा था। 

उस बृहदाकार शुभ्र शुन्य मे, कहीं से, ग्यारह बार ठनू-टन हो उठा। 
जैसे कही दूर कन्न में से आवाज़ आ रही हो। 

हम अपने-अपने होटलों के छिए चल दिये। 


न्‍्नद्ू ्े जज 


(हे) 

रास्ते में दो मित्रों का होटल मिला। दोनों वकील-मित्र छुट्टी लेकर 
चले गये। हम दोनों आगे बढें। हमारा होटरू आगे था। 

ताल के किनारे-किनारे हम चले जा रहे थे। हमारे ओवर-कोट तर 
हो गये थे। बारिश नही मालम होती थी, पर वहाँ ऊपर-नीचे हवा के कण- 
कण में बारिश थी। सर्दी इतनी थी कवि सोचा, कोट पर एक कम्बल और 
होता तो अच्छा होता। 

रास्ते में ताल के बिलकुल किनारे एक बेच पडी थी। में जी मे बेचैन 
हो रहा था। भटपट होटल पहुँचकर इन भीगे कपड़ो से छुट्टी पा, गरम 
विस्तर में छिषकर सो रहता चाहता था, पर साथ के मित्र की सनक 
कब उठेगी, कब थमेगी--इसका पता न था। और वहे कंसी क्‍या 
होगी--इसफा भी कुछ अन्दाज न था। उन्होंने कहा--आओ, जरा यहा 
बैठे । 

हम उस चूते कुहरे मे रात क॑ ठीक एक बजे तालाब के किनारे उस 
भीगी वर्फ-सी ठडी हो रही लोहे की बेच पर बैठ गये । 

५-१०-१५ मिनट हो गये। मित्र के उठने का इरादा न मालूम हुआ। 
मेने खिसियाकर कहा-- 

“चलिए भी। 

“अरे ज़रा बेठो भी । 

हाथ पकड़कर जरा बैठने के लिए अब इस जोर से बैठा छिया गया 
तो और चारा न रहा---लाचा र बैठे रहना पडा । सनक से छुटकारा आसान 
न था, और यह जरा बैठन। जरा न था, बहुत था। 

चुपचाप बैठे तंग हो रहा था, कुड रहा था कि मित्र अचानक बोले- 

“देखो वह क्या हे ? 

मेने देखा--कुहरे की सफ़ेदी मे कुछ हो हाथ दूर से एक कालीन्पी 
म्रत हमारी तरफ बढी भा रही थी। मेने कहा-- होगा कोई।” 

तीन गज की दूरी से देख पट, एक छड़का सिर के बड़े-बड़े बालों को 
सुजरूाता हुआ चला आए रहा है। नंगे पर है, नंगे सिर। एक मेली-सी कमीज 
लटकाये है। पैर उसके न जाने कहा पढ़ रहे हे, ओर वह न जाने कहाँ जा 


|. 88: 55 


'रहा है--कहाँ जाना चाहता है? उसके कदमों में जैसे कोई त'अगला हैं, 
न पिछला है; न दायाँ है, न बायाँ है। 
पास की चुगी की लालटेन के छोटे-से प्रकाश-वृत्त में देखा -कौई 
दस बरस का होगा। गोरे रग का है, पर मेल से काला पड़ गया है। आँखे 
अच्छी बडी, पर रूखी है) माथा जैसे अभी से भुरियाँ खा गया है 
वह हमे न देख पाया । वह जैसे कुछ भी नही देख रहा था। न नीचे 
की धरती, न ऊपर, चारों तरफ फैला हुआ कुहरा, न सामने का तालाब और 
न बाकी दुनिया । वह बस अपने विकट वर्तमान को देख रहा था। 
मित्र ने आवाज दी--ए।!” 
उसने जेसे जागकर देखा और पास आ गया। 
“तू कहाँ जा रहा है रे?” 
उसने अपनी सूनी आँखें फाड दी। 
“दुनिया सो गई, तू ही क्यों घूम रहा है ? 
बालक मौन मूक, फिर भी बोलता हुआ चेहरा लेकर, खडा रहा। 
“कहाँ सोयेगा ? ” 
“यही कही।” 
“कल कहाँ सोया था ? ” 
“दृकान पर ।” 
“आज वहाँ क्यो नही ” ” 
“मौकरी से हटा दिया।” 
“क्या नौकरी थी ? ” 
“सब काम। एक रुपया और जूठा खाना।” 
“फिर नौकरी करेगा।” 
हा [ 
“बाहर चलेगा ? ” 
दर हाँ | हि 
“आज क्या खाना खाया ? ” 
“कुछ नही ! 
“अब खाना मिलेगा ? ” 


खम्न दर प्‌ हक 


नही मिलेगा। 

“यो ही सो जायगा ? ” 

“हाँ | १2 

५ कहाँ 22 

“यही, कही। 

“इन्ही कपडों से ? ” 

बालक फिर आँखों से बोलकर मूक खड़ा रहा । आँखें मानो बोलती 
थी---यह भी कैसा मूक प्रइन।” 

“मॉ-बाप है ?” 

4 ४.5 । 4) 

हु बह हा 

“१५ कोस दूर गाँव में ।” 

“तू भाग आया ? 

४ हाँ । 7) 

“क्यों?” 

“मेरे कई छोटे भाई-बहन हे---सो भाग आया, वहाँ काम नही, रोटी 
नहीं। बाप भूखा रहता था, ओर मारता था। माँ भूखी रहती थी, और रोती 
थी। सो भाग आया । एक साथी और था। उसी गाँव का। मुझसे बड़ा था। 
दोनों साथ यहाँ आये। वह अब नही है।” 

“कहाँ गया ? 

“मर गया।* 

“मर गया ?” 

“हा, साहब ने मारा, मर गया ! / 

“अच्छा, हमारे साथ चल।” 

वह साथ चल दिया। लौटकर हम वकील-दोस्तों के होटल में पहुँचे 

“बकील साहब | 

वकील लोग, होटलू के ऊपर के कमरे से उतरकर आये। काश्मीरी 

दोझाला लपेटे थे, मोज़े चढ़े परों मे चप्पल थी। स्वर में हल्की-सी भुकलाहट 
थी, कुछ लापरवाही थी। 
हि 


“आ-हा फिर आप [--कहिए।" 

“आपको नौकर की जरूरत थी न ?--देखिए प्रह लड़का है | 

“कहाँ से ले आये ?--इसे आप जानते हे? 

“जानता ह--यह बेईमान नहीं हो सकता।' 

“अजी ये पहाडी बडे शैतान होते हे। बच्चे-बच्चे मे गुत छिपे रहते 
है। आप भी क्‍या अजीब है--उठा छाये कही से--लो जी, यह नौकर 
लो। 

“मानिए तो, यह लूडका अच्छा निकलेगा।'' 

आप भी , जी, बस खूब है। एऐरे-गैरे को नौकर बना लिया 
जाय और अगले दिन वह न जाने क्या-बया लेकर चम्पत हो जाय।' 

“आप मानते ही नही, में क्या करूँ? ” 

“माने क्‍या खाक "आप भी . .जी अच्छा मज़ाक करले हे । 
अच्छा अब हम सोने जाते है।” 

और वह चार रुपये रोज़ के किरायेवाले कमरे में सजी मसहरी पर 
सोने ऋटपट चले गये। 

(४ ) 


वकील साहब के चले जाने पर होटल के बाहर आकर मित्र ने अपनी 
जेब म हाथ डालकर कुछ टठोला। पर भट कुछ निराभ भाव से हाथ बाहर 
कर मेरी ओर देखने लगे। 

६ क्या है है जै 

“इसे खाने के लिए कुछ---देना चाहता था, अँगरेजी में मित्र ने कहा--- 
“मगर, दस-दस के नोट है।” 

“नौट ही शायद मेरे पास हे, देखू ? 

सचमुच मेरे पाकिट में भी नौट ही थे। हम फिर अगरेजी में बोलने 
लगे। लडके के दाँत बीच-बीच में कटकटा उठते थे। कड़ाके की सर्दी थी। 

मित्र ने पूछा-- तब ? ” 

मेने कहा-- दस का नोद ही दे दो।” सकपकाकर मित्र मेंरा मुह 
देखने लगे---अरे यार ! बजट बिगड जायगा। हृदय में जितनी दया है, 
पास में उतने पैसे तो नहीं हे 


« ६७ 


“तो जाने दो, यह दया ही इस ज़माने में बहुत है।---मेने कहा। 

मित्र चुप रहे। जैसे कुछ सोचते रहे। फिर लड़के से बोले--- अब आज 
तो कुछ नही हो सकता। करू मिलना। वह होठल डि पब' जानता है। 
वही करू १० बजे मिलेगा ? ” 

हो 7 5 कुछ काम देगे, हजूर ! 

“हॉ-हाँ, ढूंढ दूगा।” 

“तो जाऊँ?” 

“हॉ”, ठढी साँस खीचकर मित्र ने कहा-- कहाँ सोयेगा ? ” 

“यही कही; बेच पर, पेड के नीचे किसी दूकान की भट्ठी में।” 

बालक फिर उसी प्रेत-गति से एक ओर बढा। और कुहरे में मिल 
गया। हम भी होटल की ओर बढे । हवा तीखी थी--हमारे कोटों को पार 
कर बदन में तीर-सी लगती थी। 

सिकुडते हुए मित्र ने कहा--- भयानक शीत है। उसके पास ! कम--- 
बहुत कम कपडे, ... . . है 

“यह ससार है यार ! “--मेने स्वार्थ की फिलासफी सुनाई--- चलो 
पहले बिस्तर में गर्म हो लो, फिर किसी और की चिन्ता करना।” 

उदास होकर मित्र ने कहा--स्वार्थ | --जो कहो लाचारी कहो, 
निठुराई कहो, या केहयाई ! ” 

भेद मंद भर 

दूसरे दिन नेनीताल- “वर्ग के किसी काले गुलाम पशु के दुलारे का 
बेटा वह बालक निश्चित समय पर हमारे होटल डि पर मे नही आया। 
हम अपनी नेनीताल सैर खुशी-खशी खतमकर चलने को हुए। उस लड़के 
की आस लगाये बेठे रहने की जरूरत हमने न समझी । 

मोटर में सवार होते ही थे कि यह समाचार मिक्ना कि पिछली 
रात, एक पहाड़ी बारूक सडक के किनारे पेड के नीचे दिठुरकर मर 
गया। 

मरने के लिए उसे वही जगह, वही दस बरस की उम्र और वही काले 
चिथडो की कमीज़ मिली आद्रमियों की दुनिया ने बस यही उपहार 
उसके पास छोडा था। 


« दि८ «« 


पर बताने वालों ने बताया कि गरीब के मुंह पर छाती, मुट्ठी 
और पेरों पर, बरफ की हलकी-सी चादर चिपक गई थी मानो दुनिया की 
बेहयाई ढकने के लिए प्रकृति ने शव के लिए सफेद और ठण्डे कफन का प्रबन्ध 
कर दिया था 

सब सुना और सोचा---अपना अपना भाग्य 


दुःख का अधिकार 
| यशपाल | 


पोशाक मनुश्य को विमन्न श्रेणियों मे बांटने वाली सीमा है। पोशाक 
ही समाज में मनुष्य का अधिकार और उसका दर्जा निश्चित करती है। 
वह हमारे लिये अनेक बद दरवाजे खोल देती है। परन्तु कभी ऐसी भीं 
परिस्थिति आ जाती हैं जब हम नीचे भुककर मनृष्य की निचली श्रेणियों 
की अनुभूति को समभना चाहते हे; उस समय यह पोशाक ही बन्धन और 
पैर की बेडी बन जाती है। जैसे वायु की लहरे कटी हुई पतग को सहसा भूमि 
पर नही गिर जाने देती; उसी प्रकार हमारी पोशाक, खास परिस्थितियों 
में हमे भूकने से रोके रहती है 

बाजार में फुटपाथ पर कुछ खरबूजे डलिया में और कुछ ज्ञमीन पर 
फेलाये एक अधेड उमर की औरत बेठी रो रही थी। खरबूजे बिक्री के लिये 
थे परन्तु उन्हे खरीदने के लिये कोई कैसे आगे बढता, जब उन्हें बेचने 
वाली कपडे से मुंह छिपाये सिर को घुटनों पर रखे फफक-फफककर रो 
रही थी ! 

आस-पास की दुकानों के पटडो पर बैठे---या नीचे खड़े आदमी घृणा 
से उसी के सम्बन्ध मे जिकर कर रहे थे। उसका रोना देख मनमें एक व्यथा 
सी उठी, पर उसके रोने का कारण जानने का उपाय ? 

यह पोशाक भी व्यवधान बन कर खडी हो गईं। घणा से एक तरफ 
थूकते हुए एक आदमी ने कहा--- क्या ज्ञमाना है! जवान रूडके को मरे 
एक दिन नहीं बीता और यह बेहया दुकान लगा के बैठी हैं। ” अपनी दाढ़ी 
खुजलाते हुए दूसरे साहब कह रहे थे---“अरे, जैसी नियत होती है, वैसी ही 
अल्हा बरकत भी देता है | ” 


एक तरफ कुछ दूर खडे हुए एक आदमी ने दियासछाई से कान खू जलाते 
हुए कहा--- अरे, इन लोगों का क्या ? यह कमीने छोग' टुकडों पर जान 
देते हैं। इनके लिये बेठा-बेटी खसम-लुगाई, धर्में-इमान, सब रोटी का टुकडा 
है |” 

परचन की दुकान पर बैठे लाला जी ने कहा-- भरे भाई, उनके लिये 
मरें-जिये का कोई मतलब न हो, पर दूसरे के धर्म का तो ख्याल करना चाहिये! 
जवान बेटे के मरने का तेरह दिन का सूतक होता है और यह यहाँ सडक पर 
आज़ार में जा खरबज़े बेचने बैठी है ! हज्जार आदमी आते हैं, जाते है। कोई 
क्या जानता है कि इसके घर में सृतक है | कोई इसके खरबूजे खाले, तो 
उसका इमान-धर्म क्या रहेगा क्या अंधेर है ।” 

मे 8 मंद 

पास-पडोस में पुछने पर जान पडा--उसका तेइस बरस का जवान 
लडका था। उसकी एक बहू है और एक पोता-पोती | शहर के पास डेढ बीघा 
भर जमीन में कछियारी करके वह अपना निर्वाह करता था। खरबूजों की 
डलिया बाज़ार मे पहुँचाकर कभी लडका सौदे के पास बैठता, कभी माँ ! 
परसों के रोज सुबह मुह अँबेरे लडका बेलों मे से पके खरबूजे चुन रहा था। 
गीली मेड की तरावट में विश्राम करते हुए सॉप पर पैर पडने से साँप ने 
लड़के को काट खाया। 

माँ बावली होकर ओऔका बुला छाई। भाड़ना-फूंकना हुआ। नागदेव 
की पूजा हुई। पूजा मे दान-दक्षिणा चाहिये, घर में जो कुछ आटा और जनाज 
था, दान-दक्षिणा में उठ गया। माँ, बह और पोते “भगवाना” से छिपठ- 
लिपट कर रोगे। पर भगवाना जो एक दफ़े चुप हुआ तो फिर न बोला । 
सपप के विष से उसका सब बदन काछा पड गया था। 

ज़िंदा आदमी नंगा भी रह सकता हैं, परल्तु मुर्दे को नंगा कंसे विदा 
किया जाय। उसके लिये तो बजाज की दुकान से नया कपड़ा छाना ही होगा । 
चाहे उसक्रे लिये माँ के छन्नी-ककता ही क्यों न गिरती रखते पड़ें। 

मे रे 2] 


भगवाना चला गया और घर में जो कुछ चनी-भूसी थी, सौ उसे विदा 
करने मे चला गईं। बाप नही रहा तो क्‍्या। लड़के सुबह उठते ही भूख 


- ७१ -- 


बिलबिलाने छगे। दादी ने उन्हे खाने को ख रबूजे दिये, लेकिन बह को क्या 
दे ? उसका बदन बुखार से तवे की तरह तप रहा था, आज बेटे के बिना उसे 
दुअन्नी-चवन्नी कौन उधार देगा। 

रोते-रोते आँखे पोंछते बुढिया भगवाना के बटोरे हुए खरबूज्े डलिया 
में समेटकर बाजार को चली। और चारा ही क्या था। 

वह आई थी खरबूज़े बेचने का साहस कर, परन्तु चादर से सिर लपेटे 
सिर को घुटनों पर टिकाये, फफक-फफककर रो रही थी। 

मै नें भर 

“कंल जिसका बेठा चलछ बसा, आज वह बाजार में सौदा बेचने चली 
है। हाय रे पत्थर का दिल। ” उसके दु ख का अन्दाजा लगाने के लिये पिछले 
साल अपने पडोस मे पुत्र की मृत्यु से दुखी माता की बात सोचने लगा. . . 
जो पुत्र की मृत्यु के बाद पन्द्रह दिन तक परलेंग से उठ नही सकी थी। पनद्वह- 
पन्द्रह मिनट बाद जिसे पुत्र-वियोग से मूर्च्छा आ जाती थी और मूर्च्छा न 
आने की अवस्था मे आँखो से ऑसू न रुकते थे। दो-दो डाक्टर हरदम सिरहाने 
बेठे रहते थे। हरदम सिर पर बरफ रक्‍्खी जाती।, . .शहर भर के लोगों 
के मन उस्र. पत्रछप्रर से दवित हो उठे थे। 

जब मन को सूझ का रास्ता नही मिलता, तो बेचैनी से कदम तेज हो 
जाते हैं। उसी हालत में नाक ऊपर उठाये, राह चलतों से ठोकर खाता, 
में चला जा रहा था यह सोचता हुआ--- शौक करने के लिये, गम मतानें 
के लिये भी सहुलियत चाहिये और दु खी होने का भी एक अधिकार होता 
हि 


हि 


शान्ति हंसी थी 


[ अज्लेय ] 


“जानकीदास मुजरिम, तुम पर जुर्म लगाया जाता है कि तुमने तारीख 
१४ दिसम्बर को शाम के आठ बजे हालीउड पार्क के दरवाज़े पर दगां किया, 
और कि तुम्हारी रोजी का कोई जरिया नही है। बोलो, तुम्हे जवाब में कुछ 
कहना है?” 

जवाब के बदले जानकीदास को टुकर-टुकर अपनी ओर देखता पाकर 
न जाने क्‍यों मजिस्ट्रेट--हाँ, मजिस्ट्रेट---पसीज उठे। उन्होंने कहा--- 
“जो कुछ तुम्हे जवाब मे कहना हो सोच लो। मे तुम्हे पाँच मिनट की मोहलूत 
देता हूँ।” 

मूड ्ः भेद 

पाँच मिनट। 

जानकीदास के बज्माहत मन को, मानो 'कोडे की चोट-सा, मानों बिच्छू 
के डंक-सा यह एक फ़िक़रा काटने छूगा, बताने की वह फिजूल कोशिश 
करने लगा--पॉच मिनट ! ” 

पाँच मिनट--- 

जैसे नदी के किनारे पर पडा हुआ कछुआ, पास कही खटका सुनकर, 
तनिक-सा हिल जाता है और फिर वैसा ही रह जाता है लोंदा-का-लोंदा, 
वैसे ही जानकीदास के मन ने कहा--शान्ति हँसी थी” और रह 
गया । 

पॉच मिलट--- 

कुछ कहना है अवश्य, सफ़ाई देनी है अवश्य 

पाँच मिनट. . , 

शान्ति हँसी 


कब ? कहॉ ? क्‍यों हँसी थी ? और कौन है वह, क्यों है, मुझे क्‍या है 
उससे ? 
पॉच मिनट 
उसे धीरे-धीरे याद-सा आने लगा किन्तु याद की तरह नही। बुखार 
के बुरे सपनों की तरह ! 
मैर 


शान्ति ने रोटी उसके हाथ मे थमाकर उसी में भाजी डालते-डालते 
कहा था--“इस बकक्‍त तो खा लेते है, उस जून मेरी एकादशी है।” 

उसने पूछा था-- क्यों ? ” 

“क्यों क्या ? तुम्हे खिला दगी--- और हँस दी थी । 

उस जून के लिए रोटी नही है, यह कहने के लिये हँस दी थी । 

दोपहर मे, सड़कों पर फिरता हुआ जानकीदास सोच रहा था, इतनी 
बडी दुनियाँ मे, इतने कामों से भरी हुई दुनियाँ मे, क्या मेरे लिये कोई भी 
काम नही है ? वह पढा-लिखा था, अपने मॉ-बाप से अधिक पडा-लिखा था, 
पर उन्हे मरते समय तक कभी कष्ट नही हुआ था। चाहे धनी वे नही हुए, 
तब वह क्यो भूखा मरेगा ? और जान्ति, उसकी बहिन, भी हिन्दी पढी है 
और काम कर सकती है। 

जहाँ-जहाँ से उसे आशा थी, वहाँ सब वह देख चुका था। बल्कि जहाँ 
आशा नही थी, वहाँ भी देख-देखकर वह लौट चुका था। 

अब उसे कही और जाने को नहीं था--सिवाय' घर के, और वहाँ 
उस जून के लिये रोटी नही थी और यह बताने को शान्ति हँसी थी 
हँसी थी. . 

तब तक, भले ही उसके मन में सम्पन्नता का, पढाई का, दरजे का, 
इ ज्ज़त-आबरु का, बुजआ मनोवृत्ति का, कुछ अभिमान, कुछ निशान बाकी 
रहा हो अब नही रहा। उसके लिये कुछ नही रहा था। केवल एक बात 
रही थी कि उस जून के लिये रोटी नही है और शान्ति हँसी थी। 

राह चलते उसने देखा, दाये ओर एक बडा-सा ऑगन है, एक भव्य 
मकान का, जिसमें तीन-चार सुन्दर बच्चे खेल रहे हे। एक और एक 
लड़की, बिना आग के एक छोटे से चुल्हे पर, रूकडी की हँडिया चढाये रसोई 


पका रही है और खेलने वाले लडके से कह रही है आओ भइया, रोटी 
तैयार है।” 

वह एकाएक ऑगन के भीतर हो लिया। लूब्के सहमकर ख$ हो गये--- 
शायद उसका मृह देखकर । 

उसने एक लड़के से कहा-- बेटा जाकर अपने पिता से पूछ दो, यहा 
कोई पढाने का काम है? 

लडके ने कहा, हम नही जाते, आपही पूछ लो।'* 

जानकीदास ने दूसरे से कहा--- तुम पूछ दोगे ? बड़े अच्छे हो तुम... 

उस रूडके ने एक वार अपने साथी की ओर देखा, मानो पूछ रहा हो--- 
“में भी ना कह दू ?” लेकिन फिर भीतर चला गया और आकर बोला-+- 
“पिताजी' कहते हूँ, कोई काम नही है। 

जानकीदास ने फिर कहा--- एक बार और पुछ आओ, कोई जिल्द्र 
साजी का काम है ? या बढ़ई का ” या और कोई ? ” 

लड़के ने कहा-- अबकी तो पूछ लेता हूँ, फिर नही जाने का। आकर 
बोला--- पिता जी कहते हं--- यहाँ से चले जाओ। कोई काम नहीं है। 


फिजूल सिर मत खाओ। 
जानकीदास बाहर निकलरू आया । 
मद भर में 


कोई पढाने का काम है ? किसी क्‍लक की जरूरत है? जिल्दसाज़ी 
की ? बढ़ई की ? रसोइया की ? भिष्ती की ? टहुलूये की ? मोची-मेहतर 
की? 
कोई ज़रूरत नहीं है। सबके अपने-अपने काम हैं, केवछ जानकीदास 
की कोई जरूरत नही है और उस जून खाने कौ नही है, और ज्ञास्ति ढँसी थी 
भें भेद म६ 


शाम को हालीउड पाक के दरवाजे के पास जो भीड खड़ी थी, उन्हीं 
में वह भी था। दुनियाँ है, घर है, शान्ति है, रोटी है, यहू सब वह भूछ गया 
था। भूल नही गया था, याद रखने की क्षमता, मन को इंकट्ठा, अपने वश्ष में, 
रखने की सामर्थ्य वह खो बैठा था। न उसका कोई सोच था, न उसकी कोई 
इच्छा थी। बहाँ भीड थी, लोग खड़े थे---इसी लिये वह भी था। 


- ७७ -- 


भीतर असरू्य बिजली की बत्तियाँ जगमगा रही थी। बड़े-बड़े भूले 
रंग-बिरगी रोहानी मे, किसी स्वप्त-आकाश के तारों से लूग रहे थे। कहीं 
एक बहुत ऊँचा खंभा था, जिसकी कुल लरूम्बाई नीली और लाल लेपों से 
सजी हुई थी और ऊपर उसके एक तख्ता बँघा हुआ था। 

उसी के बारे में बाते हो रही थी। और जानकीदास मंत्र-मुग्ध-सा 
सुन रहा था। 

वह जो है न खंभा, उसी पर से आदमी कूदता है। नीचे एक जलता 
हुआ तालाब होता है, उसी में।” 

“उससे पहले दूसरा खेल भी होता है, जिसमें कुत्ता कूदता है।” 

“नही वह बाद में है। पहले साइकिल पर से कूदनेवाला है। वह यहाँ 
से नही दीखता ।” 

“बह कितने बजे होगा ? 

“अभी थोडी देर में होने वाला हँ---आठ बजे होता है ।” 

“बह आवाज क्‍या है?” 

“अरे जो वह गुम्बद मे मोटरसाइकिल चलाता है, उसी की है।” 

जानकीदास का अपना कुछ नही था। इच्छाशक्ति भी नहीं। जो दूसरे 
सुनते थे, वही उसे दीख जाता था। 

“बह देखी ।” 

भूले चलते लगे थे, चरखडियाँ घूमने लगी थी; उन पर बैठे हुए लोग 
नहीं दीखते थे। पर प्रकाश में कभी-कभी उनके सिर चमक जाते थे और 
कभी किसी लडकी की तीखी और कुछ डरी-सी हँसी वहाँ तक पहुँच जाती 
थी। डरी-सी कित्तु प्रसन्न, आमोद-भरी . 

जानकीदास देखता था और सुनता था और निशचल खडा हुआ भी 
उत्तेजित हो जाता था। वही क्‍यों, सारी भीड़ ही धीरे-धीरे उत्तेजित होती 
जाती थी। 

तभी अन्दर कहीं बिगुल बजा, तीखा, किसी प्रकार के सोच या चिन्ता 
से मृवत पुकारता हुआ। 

किसी ने फहा--- अब होगा साइकिल वार खेल । चलो अन्दर चरलें।' 

“तुम नहीं चलोगे ? 


द चलो | 7 

“में भी चलता हूँ यार ” यह तो देखना ही चाहिये---* 

“आओ न--जल्दी। फिर जगह नही रहेगी। 

भीड दरवाजे की ओर बढी। उत्तेजना भी बढी, फैली, फिर बढी। 

जानकीदास भी साथ पहुँचा, टिकट्धर के दरवाजे पर। 

लोग टिकट लेकर भीतर घुसने लगे। जानकीदास खडा देखने कूगा। 

तभी एक ऊडका एक छोटी लडकी का हाथ पकडे, उसे घसीटता' हुआ, 
जल्दी से टिकटघर पर पहुँचा और टिकट लेकर, बडे उत्तेजित, उत्तेजना 
से भराये हुये स्वर मे बोला कमला अगर देर से पहुँचा तो याद रखना, 
मार डालगा ? उमर भर में एक मौका मिला हैं 

आगे जानकीदास नही सुन सका। रूपककर टिकटघर पर जा पहुँचा । 
टिकट मॉगी। ली । जेब मे डाली । दूसरा हाथ अन्दर की जेब में डाल्ा--पैसे 
निकालने के लिये--चार आने। डाला और पद रहने दिया । निकाढा 
नही, उत्तेजना टूट गई। 

जेब में एक पैसा भी नहीं था। 

भेद ५ भैं४ 

“मुजरिम तुम्हें कुछ कहना है ?” 

जानकीदास ते फिर एक बार दीन दृष्टि से मजिस्ट्रेट की ओर देख 
लिया, बोला नहीं। उसका मन कछुये की तरह तनिक और हिलकर 
बिलकुल जड हो गया। 

उस जून उसने नहीं खाई थी, तो शान्ति ने खा ली होगी | 

मजिस्ट्रेट साहब सेकड भर सोचकर बोले--- एक साल'।* 

शान्ति हँसी थी। उस ज़न के छिये रोटी नही है. यह कहने के लिये 
शान्ति हँसी थी। 


रामलीला 


[ श्री राधाकृष्ण | 


पेशा मे कोई पेशा हुआ भी तो रामलीला का दल रखने का पेशा हुआ । 
दृकानदारी का पेशा होता, जमीदारी होती, महाजनी होती, कोई भी, कैसा 
भी पेशा होता, तो एक बात थी। मगर रामलीला का दल रखने का पेशा . . . 
सो भी यह खानदानी पेशा है। सात पुरतों से रामलीरू का दरू चला आता 
है। और रामरतन जरा आधुनिक बुद्धि का आदमी है, सो अपने इस पेशे को 
पसंद नही करता । मगर खानदानी चीज है । रामलीला वह छोड़ नही सकता, 
अपना दल तोड नही सकता। 

मगर ये जो ऐरा-गैरा नत्थू-लेरा आकर राम बनते है, लक्ष्मण बनते 
है, बशिष्ठ और विश्वामित्र बन जाते है, सो रामरतन को पसद नही । यह इस 
प्रकार राम की पैरोडी हो जाती है, लक्ष्मण का उपहास हो जाता है, राजा 
दद्रथ की मिट्टी पलीद होती है और महाज्ञानी बशिष्ठ के मुह से ज्ञान के 
बदले अज्ञान ही ज्यादा निकलता है। सो. रामरतन रामलीला के इस पुराने 
डरे में परिवर्तत करेगा। 

और, वह रामरतन पॉच दिन से परेशान है। वह कोई ऐसा बालक 
खोज रहा है, जो राम का पार्ट करे। ऐसा ही वह किसी सॉवले-सलोने बालक 
की खोज में घृम रहा है । तमाम ढूंढ आया, लेकिन रामरतन को ऐसा बारलूक 
नहीं मिलता । जो देखने में आते हे, वे जी को जेंचते नहीं। सब में एक-दो 
त्रुटियाँ अवब्य आगे आ जाती है। वैसा मन चाहा बालक नही मिलता। 
जाने मिलेगा भी या नही मिलेगा। 

पॉचवे दिन रामरतन निराश हो गया जब राम ही नहीं, तो रामलीला 
भी नही वह थक गया; शरीर से भी, मन से भी । उसे रगा जेसे बह कूडे 
के अन्दर शालिग्राम हृढ़ रहा है। भला कहाँ सिलेगा ? उसे लूगा कि इस 


- ७८ -- 


इतनी वडी धरती पर वह सब से ज्यादा लाचार प्राणी है। उसकी परेशानी 
में कोई उसका सहारा नही हो सकता। भला यह रामलीला का दल क्या हुआ 
कि परेशानी का भण्डार हो गया। वह थककर पार्क की एक बेच पर बैठ 
गया अगर राम का काम करने वाला बालक नही मिला, तो फिर रामलीला 
केसे होगी 

कि वह देखता है कि एक वैसा ही अबोध, वेसा ही भोला, निर्मेल-निशछल 
सॉवला-सलोना बालक पार्क मे तितलियों के पीछे दौड रहा है। कौन लडका 
है ? किसका छडका है ? अगर यह राम का पार्ट करे, तब तो फिर कुछ 
कहना ही नही। 

उसने बारूक को बुलाया । अपने पास बिठाकर उससे तरह-तरू की 
बाते पूछने छगा। रलूडके ने कहा--मेरे पिता नही, मेरी मा है। वह क्‍या 
करती है, सो में नही जानता। हमारे घर में तीन गाय हैं। मा उसका दूध 
दृहती है । एक ग्वाला आकर उसका दाम दे जाता है। हमारे एक मामा है, 
सो बडी दूर रहते है। रगून कहाँ है, जानते हो ? हमारे मामा वही नौकरी 
करते है। जब वे आवेगे, तो मेरे लिये एक दोना मिठाई छावेगे ओर एक 
रबर की गेद लावेगे। फिर बे मेरे लिये कोट सिला देंगे और हाफपेंट खरीद 
देगे। फिर कोई तकलीफ नही रहेगी। 

इस बालक को पाकर रामरतन ने मानो आसमान का चाँद पा लिया 
राम के लायक ऐसा बालक सिलना असम्भव था । थोडी देर के बाद बह 
उस बालक की मा के सामने खडा था और उसकी शकाओं का समाधाव 
कर रहा था। उसकी मा को जो हिचक थी, सो रुपयों की आवाज सुनते 
ही मिट गई। 

रामरतन ने बालकक से पूछा--क्‍्यों भाई, राम का पार्ठ करोगे न 

करूँगा | --बारूक ने सरलता से जवाब दिया। 

तीर चलाकर तब तुम ताडका को कैसे मारोगे। 

बालक ने छोटी-सी धनुही से तीर का ऐसा सररू सन्धान किया कि 
रामरतन खुशी से निहाल हो उठा। ऐसा बढिया बालक कभी नही मिलेगा । 
कहीं नही मिलेगा। यह बारूक राम का प्रतिरूप है राम का अभिनय इसके 
पास आकर सत्य और साकार हो उठा है 


- ७९ «-» 


और दूसरे दिन से ही रामलीला से दर्शकों की भीड तिगुनी-चौगुनी 
होने रूगी। वह बालक राम के रूप और अभिनय को सार्थक कर 
रहा था। 
भेः मेँ मर 


फिर बाईस वर्ष व्यतीत हो गये। इतने दिनों की बडी लम्बी अनेकानेक 
कहानियाँ हे रामरतन की रामलीला पार्टी आज भारतवर्ष में विख्यात 
है पार्टी के पास धन है, सम्मान है, प्रतिष्ठा है। मगर फिर भी रामरतन' 
को शान्ति नही। अब उसकी पार्टी ग्वालियर में आई है। सम्राद ने खास 
तौर पर उसकी रामलीला पार्टी को निमत्रण दिया है। लोग उत्सुक हे। 
मगर रामरतन जानबूक कर पन्द्रह दिनो से देर कर रहा हैं। उसके पास 
रावण की कमी है । जो व्यक्ति रावण का काम करता है, वह रामरतन को 
ही पसद नही फिर उसे ग्वालियर के नरेश केसे पसंद करेगे ?े इतनी बडी 
इस पृथ्वी पर उसे एक रावण नही मिलता । रामरतन रावण खोज रहा 
है और परेशान हो रहा है। रावण की प्रतिच्छवि कही दीखती नहीं। उस 
रावण के भयानक चेहरे पर क्रोध था, हिसा थी। उसके भारी गले से ककंशे 
आवाज निकली थी। हाँ, ऐसा ही रावण होना चाहिये, ऐसा ही रावण 
रामलीला में सजंगा, ऐसा ही रावण जगतमाता जानकी का हरण कर 
सकता है। 

और, आखिर ऐसा ही एक व्यक्ति उसे एक शराबखाने में दिखलाई 
दिया। उसके चेहरे पर अभिमान और क्रूरता थी। ककंश कण्ठ से गालियों 
की बौछार निकल रही थी। दूकानदार से वह मुफ्त में शराब मॉग रहा था 
लेकिन शराब के बदले दोनों मे बेशुमार गालियों का विच्विमय होने लगा था। 
हाँ यही व्यक्ति है, जो चाहे तो रावण बनकर सचमुच सज सकता है। चेहरे 
पर कैसी भयानकता है, आँखों में कितना कमीनापन है। यह साधु का कपट- 
बेश धारण करके सीता के पास जायगा तब भी मन, वाणी और रूप की 
भयानकता नही मिटेगी। देखते ही लोग कह देंगे, यही रावण है, कपटी, 
बदमाश ! 

रामरतन आगे बढ गया और दूकानदार के सामने चवन्नी फेंक कर बोला 
भई, मेरी ओर से इन्हें पिछा दो; एक बोतरू ! 


6 


एँ! रावण की प्रतिच्छविवाला व्यक्ति बोला तू तो बडा दयावान 
है यार! बतला, में तेरा क्या काम करूँ ? तू मुझसे क्या काम लेगा ? 

रामरतन ने कहा--मेरी एक रामलीला पार्टी है; में उसमे तुम्हे 
रावण का पार्ट देना चाहता हूँ। 

रावण ? .. अच्छा, में करूगा। 

और, सचम्‌ च उसके द्वारा रावण का काम सबसे अच्छा हुआ। राम- 
लीला समाप्त हौने के बाद रामरतन ने उससे पुछा---बोलो, आज पुरस्कार 
में में तुम्हें क्या दू ? 

रावण ने कहा--मे आप से पहले भी बहुत कुछ पा चुका हँ; अब आज 
क्या माँग? 

पहले ? रामरतन ने आइचर्य से कहा--मेने तो पहले तुम्हे कभी देखा 
भी नही | 

हाँ, आप मुझे नही पहचान सके, लेकिन मेने आप को पहले दिन ही 
पहचान लिया था। में वही आदमी हूँ, जो लडकपन मे आप के यहाँ राम का 
पार्ट किया करता था। उसके बाद मेरे मामा आकर आप से मुझे ले गये। 
याद कीजिये। मे वही आदमी हूँ। एक दिन आप के यहाँ मे राम बनता था। 
याद आया ? 

हाँ रामरतन को अब सब याद आ गया । रावण के उस भयानक चेहरे 
के भीतर से रामरतन को राम की वही सॉवली-सलोनी निर्मेल छवि फूटती 
हुई सी दिखलाई पडी। वह आश्चर्य से चकित होकर बोल उठा--हाँ, तुम 
चही राम हो। मुझे याद जा गया। तुम वही राम हो। 


सुलताना की आत्मा 
[ पहाड़ी ] 


जब हम लोग फोौरेस्ट के बँगले पर पहुँचे तो पाँच बज गए थे। मई की 
गरमी से वह बंगला काफी तपा था और साठ मील का सफ़र तय करने के 
बाद हम बहुत थक गए थे। हम फौरेस्ट की अपनी निजी सडक से आए थे, 
जहाँ कि शिकार खेलने की मनाही है। ड्राइवर ने बताया कि किसी जमाने में 
अंग्रेज अफसर वहाँ जाडों मे शिकार खेलने के लिए आते थे, फिर राजा 
महाराजाओं को भी इसका शौक़ हुआ और अब तो लगता है कि शिकार 
खेलने की प्रथा बन्द हो जायगी। राह में शाल, तुन, जामुन आदि के घने 
जगल थे। बॉस तथा भाडियाँ भी दूर-दूर तक चली गयी थी। आसपास 
मीलों तक बस्ती का पता नहीं था। हिमालय का इतिहास जितना पुराना 
है, इस तराई का उसके समकालीन ही होगा। यह तराई का हिस्सा पजाब 
को छूता हुआ बिहार और आसाम तक पहुँचा हुआ हैँ। यहाँ का सही ज्ञान 
उन निवासियों को है, जो कि सदियों से कई पुरते यहाँ काट चुके हे, जिनका 
काम कि अधिकारियों, राजा-महाराजाओं तथा और शौकीनो को शिकार 
खिलाना रहा है। वे स्वयं भी इस कला में प्रवीण हे और जगल की सारी 
विद्या जानते हे। सब मौसमों तथा' जगल के विधान का ज्ञान उनको है। 

चीतल, चीता, हिरन, सुअर, बारहसीघा, लकडबग्घा आदि जानवरों 
के अलावा भॉति भाँति की जगली चिडियायें तथा सॉप के परिवार के रेंकने 
वाले जन्तु भी स्वतत्रता से यहाँ विचरा करते हे । शिकारियों ने इन 
सुन्दर जंगलों मे प्रवेश पाने का सदा ही निरर्थक प्रयास किया है। यहाँ 
के निवासी उस धरती के भीतर का ज्ञान स्वयं छुपाए हुए रखते है । उस भेद 
की बात को और कोई नही जानता है। परदेशी अनुदार होता है और जंगलों 
को अपने स्वार्थ के लिए रौंदता है, इससे सभी परिचित है। राह मे एक मरा 

। 


नह हक 


चीतल एक विशाल वड की पेड की छाया पर पा था और चील तथा 
काली पखों वाले भयातक ग्रिद्ध लारों ओर चक्‍कर काठ कर ऊपर भपट रहे 
थे। लोमडियाँ और जगली कुत्ते भी अवसर पाकर बीच वीच से उसे नोच 
लेते थे। 

ड्राइवर ने हमे बताया था कि रात को चीते ने उस जानवर का शिकार 
किया होगा। तथ। पेट भरने के बाद भाडियों मे इसे छुपा गया होगा। जगल 
मे सब आजाद है। लोमडियों ने उसकी गंध पाकर भाडियों के बीच से हटा 
कर यहाँ डाल दिया और अब सब अपना अपना हिस्सा बॉट रहे थे। चीते को 
गंध का ज्ञान नही होता है। वह अपनी शक्ति के बल पर शिकार करता है। 
और निर्बल लोमडियाँ गध के ज्ञान के कारण ही तो अपना भोजन पाती है। 
जब कि हम एक सेकरे से रास्ते से गुजर रहे थे, जिसके दोनों और बॉस के 
बडे-बडे जगल थे, तो हिरनों का एक गिरोह हमारी कार के आगे से चौकडी 
भरता हुआ निकल गया था। यदि ड्राइवर ने कार धीमी न कर दी होती तो 
बह जरूर किसी जानवर से टकरा गई होती। जगली मुरगियाँ तथा और 
पक्षी स्वच्छन्दता से उड रहे थे। मानो कि वे निर्भय हों। एक बडा हरे से रंग 
का मटमेला सॉप तो कार के पहिये से चिपका हुआ बडी दूर तक चला आया 
था। यह सब देखकर सोचा कि आदि मानव को कितना संघर्ष सी करना 
पडा होगा। आज तो वह अपनो बुद्धि पर अधिक भरोसा करके आपस ही 
में एक दूसरे का शोषण करना सीख गया है। गासन करने की उसकी लिप्सा 
बढ गई है। 

खानसामा ने बाहर बरामदे में कुरसियाँ डाल दी थी और हमारे तौकर 
ने सामान कमरों में लगा लिया था। इस डाक बेंगले में गरमियों में बहुत 
कम अफ़प्तर टिकते हे । अधिकृवर-श्िक्म्से-ब-अवथिकारी-जादों-में शिकार 
खेलने के लिए ही आते हे । चौकीदार ही खानसामा का काम करता है और 
वह साहब लछागों की रुचि क कुछ साम्रात भी-रखता है। भगी को भी रारकारी 
वेतन मिलता है और वह म्रगियों का एक बाडा रखता हे। साहब लोग 
इनाम दे जाया करते हे और इनकी आर्थिक स्थिति बुरी नही है। ये छोग 
सभी मौसमों में यहाँ रहते हे और जगली जानवरों से कोई भय इनफ्ों नही 
रहता है। चौकीदार की अवस्था छगभग साठ साल की होंगी। अब तो बह 


बडे है: 


सब काम नही करता है। उसका लड़का चार साल हुए फौज से छूट कर आया 
हैं और वही सब काम करता है। अफसरों ने वादा किया है कि उसे वे शीक्ष 
ही पवका कर देंगे व बूढे की पेशन भी चालू हो जायगी। 

हवा बिल्कुल बन्द सी थी और बडी उमस हो रही थी। छगता था कि 
उस गरमी मे हम पिघर जावेगे। वह बूढा ताड के एक पुराने पख्ने से हवा 
करने का निरर्थक सा प्रयास करने कगा। गरमी से परेशान होकर में गुसल- 
खाने पहुँचा और गरम से पानी से नहा कर बाहर आया। बिस्कुट का एक 
टुकडा दातों से दबा कर चबाया और चाय के दो प्यालें पी गय. मेरा साथी 
उकेदारों तथा और सरकारी अधिकारियों से बाते कर रहा था। सरकार 
अपनी नयी योजना के अच्तर्गत यहाँ को धरती पर फौज से छटकर आए 
हुए लोगों की बस्ती बसाना चाहती थी। पेडो को बडी-बडी मशीनों से 
उखाठ कर फिर उस धरती के हृदय को टेक्टर से चीर कर उसकी 
कल्पना एक नई दुनियाँ बसान की थी। यह कल्पना पाँच सार तक दिल्ली 
के छाल फीतों वाली फाइल से निकरू कर, फिर दो साल तक लखनऊ को 
फाइलो से उड कर अब यहाँ पहुँच सकी थी। 

सॉम हो आयी थी और में बरामदे में खड्कु होकर सामने दर तक फैले 
हुए विशाल जगह की ओर देख रहा था। वह स्वस्थ और सबलू जंगल मे' 
जाने क्यो मन में एक अज्ैय-सा बल प्रद्यन करने लगा। गरनो अभो भी उदप्तो 
भाँति पड़ रही थी और मन बेचेन-सा था। में अनमना-सा बाहर आ कर 
टहलने रूगा। इस स्थान का यह मेरा पहला ही अनुभव था। अब कुछ रात 
सी पड़ने रूगी थी। तभी मेने पाया कि दक्षिण की और से एक भारी सी 
आवाज आयी और वह रूगातार समीप सी सुनाई पड़ रही थी। में चौक-सा 
उठा कि क्या बात होगी ओर उधर बढा, पर आगे धुँघले मे कुछ भी साफ- 
साफ नही दीख पडा। फिर वह आवाज तो जंगल की और से लगातार 
प्रतिध्वनित हो रही थी, उसका वेग कम नही हो रहा था इसके पहले कि 
सवाल करूँ, चौकीदार ने बताया कि भौंत्‌ चल रहा है। उस प्रदेश को वह 
भ्रापा मेरी समझ में नही आयी। यह-ता बह बता चुका था कि सामने जो 
नदी वह रही है उसमे बहुधा संध्या को इसी प्रकार तेज ऑँधी चला करती' 
है । उस आंधी की आवाज़ को सन कर ऊूगता था कि पुराने जमाने की कोई 


बहुत बडी सेना उधर से गजर रही है । फिर भी वह भौंतु का चलरूना एक 
कौतूहल की बात थी 

नदी की और जाने का प्रयास करना उस समय ठीक नही लगा। सुबह 
वहाँ जाने का,निशुचय करके में लौट आया। सामने जंगल से, किसी जानवर, 
तो कही किसी पक्षी की तेज भयावनी चीख कानों में पडती थी। दोस्त ने 
बताया था कि इस जगल मे इस समय एक चीता मादा अपने बच्चे के साथ 
रहती है। वहाँ का एक निवासी तो बता रहा था कि इस समय जितने जानवर 
वहाँ हे, साहब चाहे तो कल वह उनको अच्छा शिकार करवा सकता है। 
वह नौजबाज-व्म्डका-ससी-बत्पे-का वर्णन करते हुए उत्तेजित हो उठा था। 
उसने तो-यह- भी. बताया था-कि-जआार-पन- सेज-फ्हुछू जब [क वुह जगल में 
भैसे चराकर लौट रहा था, तो उसने उस चीते को अपने बच्चे के साथ नदी 
के पास वाली खादिर में देखा था। उसका विश्वास था कि वह वही पर बॉस 
की धनी भाड़ियों के बीच रहती है । वहाँ पर नदी के कारण नमी रहती है, 
पानी भी उसके समीप ही है। 

उस निर्भीक सत्रह-अठारह साल के लडके की बातों को सून कर कौतृहु 
हुआ था। वह तो स्वय एक्ड्/ेंटर चीते के पंजों के पीछे-पीछे वहाँ तक गया 
था और उसने पाया था कि उस समय चरह वहाँ. छेटी.हुई-थर-+मदि-कहू- उस 
पर हमला करती तो क्या होता यह बात उसने न तब सोची और आगे 
भविष्य से भी ऐसा अवसर आयेगा तो भी वह नहीं सोच सकेगा कारण 
कि रोजाना जीवन मे जगल के जानवरों स भेट होती ही रहती हैं और मौका 
पडने पर तत्काल मौरचा भी उसो स्थिति के अनुसार सोचा “जा सकता है। 
और छोगो ने भी शिकार के लिए मिमत्रण दिये। दोस्त एक बडे ओहद पर 
नियुक्त होकर वहाँ की जांच व प्रारम्भिक कार्य की रूप-रेखा' निश्चित 
करने के लिए आए थे। अतएवं हर एक ठेकेदार चाहता था कि उनको खुर् 
कर के कृपा पात्र बन जाय। 

रात को हम खाना खा रहे थे। हम सब मिल कर सात व्यक्ति थे । पास 
की नदी से पकडी हुई मछलियाँ तथा जगल स पकड कर लायां गयी मुरगियों 
का गोश्त था। इसके अतिरिक्त ठेकेदार समाज की अपने उपयोग के लिए 
लायी हुई विछायती शराब की बोतले थी। सनम काफ़ी गम्मत रही और 


«बट +५ 


दो तीन ठेकेदारों की हालत तो यह थी कि वे बिल्कुल बेहोश होने पर भी' 
पेग पर पेग चढा रहे थे कि कोई यह न समभ बैठे कि वे पीने में कमज़ोर हें। 
में जंगली म्रगी की हडिडयाँ चबा रहा था। मछली का शोरवा भी मे काफी 
पी गया। तभी मेने एकाएक अपने साथी से पूछा कि यह 'भौतृ नदी में कंया 
चला करता है। मेरी उस अज्ञानता पर सब-के-सब अवाक्‌ मे देखते रह 
गये | दोस्त ने बताया कि आज से बहुत साहू पहले सुल्तावा भ्रीत्‌ की फौज 
इसी तेजी से जगल पार क्रिया. करली-थी-। सालों तक उसने-हमादी-सरकार 
की,्भाको चने चबवाये थे। मीलो तक फेले हुए इस- तराई भावर में उसका 
राज्य था 

'सुलताना भौतू' एकाएक मेरे मूह से छूट पडा। 

उस वातावरण मे मेरे वे शब्द छुप गये। उस व्यक्ति की बात बहुत 
पुरानी हो गई थी। वह एक साधारण डाकू था, जिसे कि किसी अग्रेज पुलिस 
अधिकारी ने पकडा था और कानन ने उस फासा को सजा दी थी। 

: दो 

नी बज-गए-थे--और सब लोगों को विदा करके मेरा -स्पथी-मेरे पलेंग. 
के बरस आराम कुरसी पर बैठ गया। मुझे नीद नही आ रही थी। उसने 
मुझसे पूछा--- सुलताना के बारे मे जानना चाहते हो ?” 

“सुलताना के ?” मेने आइचय में दृहराया। 

“हा, बूढा गोबरसिह उसे मलीभॉति जानता था और जब जवान था 
तो उसके तफानी हमलो में कई बार शरीक हुआ था।” 

गोबरांसद् वह बढा खानसामा सुरूुताना क साथ रह चुका है, जान 
कर मुभे खुशी हुई। दोस्त न बताया कि शुरूलशुरूमे ता वह राज सध्या को 
नदी के किनारे चलती हवा को सावधानी से सुना करता था। उसकी धारणा 
थी कि सुरूताता मरा नहीं है। इस दुनियाँ में कोई उसे मार नही सकता। 
उसे लोगों ने बताया था कि सुलताना को सरे बाज़ार सिपाहियों से घिरा 
कचेहरी जाते हुए देख चुके है। उसके पॉबों में बडी-बडी बेडियाँ व हाथों में 
हथकटठी पढ़ी रहती है। 

और वह बूढ़ा गोबरसिह तो हँस पड़ा था। हँसते-हँसते उसकी आंखों 
से आंस की धारा बह निकली और फिर उसकी सिसकियों बँध गईं। में 


+- ८६ -- 


समभा कि वह पागल हो गया है । दोस्तो ने शराब का एक पेंग उसे दिया 
और अब तो नशे मे उसकी आँखें चमक उठी थीं। उसने बाहर जाकर दो 
तीन बार थूका और फिर जोर से बोला--तमकहराम, जो कि कभी 
डर से सुलताना के आगे नही पडते थे और उसका नाम सुनते ही जिनको 
केपकंपी आने छूगती थी, उनकी हिस्मत पड़ी कि वे सुरुताना को 
बेडियाँ पहनावे। 
गोबररासह अब भीतर पहुँचा और कहने लग्गी---सरकार' वह देवता 
था। मेरा वास्ता पहले पहल उससे तब पडा, जबकि में रुपये न होने के कारण 
अपने पुरखो को जमान का पढ़ा साहुकार क॑ नाम लिखा आया था। वह खान- 
दाभो को कई पृरत से नही दिया जा सका था ऑर उसको चुकाने की सामर्थ्यं 
मुझमे नही थी। साहकार से हमेंशा किसी न किसी काम के लिए क़र्जा 
निकालना पटता है। उससे भगडा करके गाँव में कोई नहीं रह सकता है। 
परुरखों की जायदाद को क़र्जे मे चुका कर में फुरती से घर लौठ रहा था 
कि जंगल की राह पर मुझे एक नौजवान मिला। उसने मझकसे शहर का 
समाचार प्रछा। वह न जाने केस जान गया कि म॑ बहुत दुःखी हँ। फिर 
मेरी सारी बाते सुन कर उसने अपने कमर से एक थैली निकालकर मुझे दी 
और कहा कि में साहुकार के यहाँ जाकर अपना पट्टा वापस ले लू। पर इससे 
पहले कि में उसे धन्यवाद दू, वह चला गया था। साहुकार ने रुपया लेकर 
कहा था कि वह चोरी का माल है जो कि उसे भौत ने दिया है. उसने धमकी 
भी दी थी कि वह उसे पुलिस मे दे देगा। तभा मु ज्ञात हुआ था कि वह कौन 
व्यजत है। उससे यदि बेईमान साहुकार घबराते थे, तो यह ठीक ही था । 
उससे स्वय मुभे प्यार हो गया था। उस सरल व्यकित ने तो मुझे मोह लिया 
था। यही कारण था कि गरीब जनता उस प्यार करती थी। हरएक अपनी 
जान की बाजी लगाकर भो उसका रक्षा करना चाहला था। गरीब बुृढिया 
का' बहू बटा था। जहाँ भी कोई मुसीबत जदा दिखलाई पथ्ता, वह वहाँ 
पहुँचकर उसकी मदद करता था। कभी उसने बेकसुर को नहीं सताया था। 
सरकारी पसा खानेवाले पुलीस के जासुस कभी भी जनता के हृदय को नही 
_अेटोल सकते हैं! और सुरूताना ता उसी जनता के हृदय, म॒ छोपा रहता था । 
-हरएक उसे आश्रय देका-अपना-मौरव समझता था । 


<७9 


“में भी दीत साल से उसके साथ रहा उसे सभी जगलों की प्री- 
पूरी जानकारी थी। उसका प्यारा कुत्ता सदा उसके साथ रहता था। जगली 
पशु भी शायद उस सहृदय व्यक्ति को पहचान गये थे। वह जानता 
था कि एक अग्रेज़ अधिकारी उसे पकडने के लिए तैनात क्रिया 
गया है. लेनिक कभी उसने उसकी हत्या करने की नही ठहराई। वह तो 
एक बार उस पुलिस के अफसर से निहत्था हो ।मरा था और उस एक तरबूज 
भेंट करके कहा था कि वे बेकार एक डाकू के पीछे अपनी जान जोखिम मे 
डालते हे। उसने सावधान किया था कि सुल्ताना अपने दुश्मन को भी धोखे 
से नही मारता और न वह पीछे से हमला करता है। यह भी वह जानता है 
कि वे अपने परिवार से दूर यहाँ नौकरी करने के लिए आये हे। उसकी उनसे 

गेई छजई नही है। साहब ने समभौते की बात चलाते कहा था कि वह बिना 
द्रिर्स, शर्त के यदि सरकार की शरण. में आ जावे तो सरकार उसको माफो 
पर विचार करेगी। इंस-पर बह. हँसा था कि एक 'सिणाही पाफी कभी 
नदी पंजता है. बड़-दो केवल दार या जात है जानता है 
बदमाशों के छिए सुल्ताना का नाम परेजानी पेंदा करता थ। | “उसकी 
आखा मे कभी कोई अगराध छपा नहीं रहता था। मनों सोना लटठनेबाला 
सुल्ताना सब दुछ गरीबों को बॉट देता था। उसके हाथ सदा खाली रहते 
थे। बह कभी शराब नही पीता था एक बार उसके दल के कुछ साथियों 
ने एक बारात लूटी थी। एक मनचला नववध्‌ को भी पकड़कर ले आया था। 
सुल्ताना ने जब सना तो उस युवती को स्वयं उसके पिता को सौपकर माफ़ी 
माँगी थी । उस युवती की दहन की बिदाई में सोते के कई गहने भी दिये थे 

“सरकार ने अपनी सारी शक्ति छूगा दी थी। जिस गाँव पर भी उसे 
आश्षय देने का शक होता वहा पुलिसवाले पहुँचकर मनमाना अत्याचार करते 
थे। सकछो दिरपराध यूवकों को पछिस पकड़कर ले जाती कि वे उसकी 
सहायता करते हैं। गांवों को उस प्रकार लूटने का हाल सुनकर उसका हृदय 
काप उठता था। एसीलिए एक दिन उराने अपन चुने हुए राधियों के अछावा 
सत्र को विदा कर दिया था। दे उसे नहीं छोदना चाहते थे | पर उसकी 
आज्ञा का उत्जंघत करने की शवित किसी में न थी । विदाई के दिल 
बह वहुत दुखी था। पर बेबी में क्या करता ! 


गोबरासह उसक बाद का समाचार इतना हो जानता था कि सुलताना 
को फासी लगी थी। उसका पूरा विश्वास था कि सुलूताना चाहता तो कोई 
शाॉंक्त उसे पकड नहीं सकती थी। वहाँ की सारी जनता का वह प्यारा बेटा 
किसी के पकड मे न आता। यह उस देश के कलक की बात होती। सुरूताना 
एक दिन इसीलिए अपने साथियो के साथ युद्ध करता हुआ पकडा गया था। 
वह बहादुर सिपाही था, इसाछए उसने आत्महत्या स्वाकार नही 
कया। वह तो दिखा ढेता चाहता था कि अग्रेज की कचहरी वाला न्याय 
कतना भूठा हैं! 

सलताना अपने प्यारे कुत्ते को उस अग्रेज अफसर की सरक्षकता मे सौप 
गया था जिसने कि उसे पकडा था। इन जगलों में रह कर उसने मानव हृदय 
पाया था दुनिया में इतने सहृदय व्यांक्त शायद कम पैदा होते हेँ। पुलस 
विभाग में सेकडों फाइले मिलेंगी, जिनमें कि पेशेवर पुलिस के अधिकारियों 
की भूठी रिपोर्ट होंगी। न्यायालय की फाइलों मे---जहाँ कि इगलेण्ड के बड़े 
घरानों के बच्चों को जज बनाया जाता था--वहाँ उपनिवेश्ञ के इस नाग- 
रिक को खूनी और बदमाश बताया गया होगा। लेकिन उसकी कहानी तो 
यहाँ का बच्चा-बच्चा जानता है। हर एक चाहता है कि उसका बच्चा वैसा 
ही नेक, सहृदय, चरित्रवान और बहादुर बने वह उस घरतली का बेल 
जिसका शोषण करने के लिए अग्रेज आया थ त्तराइ का“चष्पय ब्रष्पा आज 
भी उसकी जीवन घटनाओं कौं गूजों से भरा हुआ ह। 

भौतू चल रहा है, यह सुन कर मेरे मन मे कम कुतूहल नही हुआ था। 
वह गति कंसी स्वस्थ थी ! वह बूढा चला गया था और सोने के पहले दोस्त 
ने पूछा--- जानते हो, यह यग कहाँ हैं ? 

यंग ? वह पुलिस का सिविलियन अधिकारी जिसने कि भौत्‌ को 
गिरफ्तार किया था। 

“वह आजकल मछराया मैं--विद्रोहियों को दबाने में--मोरचाबन्दी 
कर रहा है। मलाया की जनता को कुचलने का प्रयास ! 

तीच 

और अगले दिन में शाम को कार से रेलवे स्टेशन पर पहुँच गया था 

दोस्त ने मुझे विदाई दी। शाम का वक्‍त था। सूर्य की लाली परचम में फेल 


«८९ 


रही थी। गाडी तेजी से चल रही थी। सामने एक पुराने किले के अवशष 
दिखलाई पडे। पूछने पर सहयात्री ने बताया कि इसी किले मे जरायम पेशे 
वाले छोगों को सरकार रखती थी और सुलताना का बचपन इसी म कद 
था। यही से भाग कर वह स्वतत्र हुआ था 

वह किला पीछे छूट गया और सोचा मैन कि यदि उस व्यक्ति को 
अवसर मिला होता ...... 

लेकिन डाक बँगले के पास बहती नदी तो सदा बहती रहेगी और 
गरमियों की सध्या मे सदा ही वहाँ भौत्‌ चलेगा . . . . . 


मिस्टर पिल्ले 


[ श्री लक्ष्मीचन्द्र वाजपेयी ] 


दूर से उनकी गञजी खोपडी पीतल के स्वच्छ कटोरे की तरह चमकती 
अतीत होती। कानों के ऊपर दोनों ओर बाल हैं। क़द छोटा, ठिगना। 
आवश्यकता से अधिक स्थूलकाय शरीर। कभी-कभी कुर्सी पर बेठने के 
पदचात्‌ जब उठकर खई होते है तो कमर के दोनों कूल कुर्सी के ह॒त्थों के 
बीच ऐसे फेस जाते है. कि कुर्सी भा उन्ही के साथ उठ खड़ी होने का उपक्रम 
करने की हृव्धर्मी करती हू दॉत स्वच्छ, मोती की तरह चमकदार, 
किन्तु सामने के दो ग्रायव | सिगरेट के बजाय सिगार खुले दाँतों के रिक्त 
स्थान की अच्छी पूति करता है। आँखों पर चश्मा है, पुरानी चाकू का, 
परन्तु जब वे निकट किसी से बाते करते है, तो भीशे के बीच से न देख, 
उसके ऊपर से आँख चढ़ा कर देखते हैँ। ओंठ मोद और भद्दे, जो तलवार 
छाप मूछों की शोभा को प्रसारित करने में भयंकर बाधा उपस्थित करते 
हैं। यह है, मिस्टर पिल्‍ले ! 

परिचय ?--परिचय भी इसी प्रकार हुआ। में राशन आफिस कार्ड 
बनवाने गया था। एक बाबू ने कहा---पिल्ले साहब बनयेंगे। आते ही 
होंगे, समय हो चुका 

मेंते सोचा कल आकर बनवा लूंगा और चलने को हुआ कि चपरासी 
ने कहा---आ गये पिल्‍्ले साहब, आज बहुत ढेर कर दी, साहब ने 

चपरासी के निकट आकर वे बोले--- क्यों ? ठीकढ़ाक तो ? 

जी, लोग आपका इन्तजार कर रहे है, कुछ बेचारे तो लौट भी गये।' 

जो गये जाने दो, उनकी चिल्ता क्‍या? है कौन यहाँ अब ? 

चपरासी ने मेरी ओर संकेत कर के कहा---आप भी बस लौटे ही जा 
रहे थे।' 


- ९१ -- 


अच्छा ठीक, आप ? नही, नही अब में आ गया हू। खाली हाथ क्या 
जाइयेगा ? बैठिये। अभी कार्ड बनता है ।' मिस्टर पिलल्‍ले ने बडी विनम्नता 
से मुझ से कहा। फिर दूसरे ही क्षण चपरासी से कहा--दिखो, उस तागे 
वाले को एक रुपया दे दो।' 

हुज्र मेरे पास 

अबे तुभसे कौन कहता हैँ ? किसी बाबू से लेकर 

चपरासी खाली हाथ लौट आया, बीला--- साहब 

तब मिस्टर पिल्‍ले ने मेरी ओर देखा। 

मुभे कार्ड बनवाना था। सेवा न करने से बाधा भी उपस्थित हो सकती 
थी। में तपाक से बोला--हाँ साहब, में दिये देता हू, यह लीजिये 

मेरे हृदय में जैसे किसी ने पिन चुभो दी हो। लेकिन पिल्ले साहब ने 
तुरन्त चपरासी से कहा--सभी कड्ढाल तो नही है यहाँ? जा तॉगे वाले 
को 

चर्षपरासी चछा गया और लगभग एक घण्टे मे मेरा कार्ड भी बन कर 
तैयार हो गया। मिस्टर पिलल्‍ले उसी समय से मेरे अन्तरग मित्र ही नही बने, 
बल्कि अध्ययन की पुस्तक भी 


नई मेड मर 


मिस्टर पिल्‍ले ने कई बार आग्रह करते हुए कहा था--किसी दिन 
मेरे बगले पर भी तशरीफ लाइये । 

में ठालता जा रहा था। क्योकि मेरे और उनके सस्कारो में बडी 
भिन्नता थी। उनकी स्वीकृति मेरे निकट अस्वीकृति थी और उनकी जस्वी- 
कृति मेरे लिए स्वीकृति थी। 

एक दिन मेरे जी में आया चल कर मिस्टर पिलले का दर्शन करूं 
ओर मिस्टर पिल्के के बगले को खोजते, उस हाते मे जा पहुँचा, जहाँ का 
उन्होंने हवाछा दिया था। एक बच्चे से मेने पृुछा--यहाँ पिल्ले साहब भी 
रहते है ।' 

'कौन दे पादरी साहब ? वह वहाँ जाइये। लडके ने एक दिशा की ओर 
संकेत कर दिया। 


में विचार करने लगा---ये तो मद्रासी हे, किन्तु पादरी कैसे और कब 
हो गये ? 

में सामने जा खडा हुआ। देखा--निहायत गन्दी कोठरी, बहुत तग, 
दिन में भी मच्छरों की भनभनाहट, कोठरी के सामने कूडे का ढेर। चारों 
ओर की छोटी-छोटी कोठरियो मे हरिजन, कोरी, और चटाई बनाने वाले 
रहते है । हाते के घुए ने सूर्य की रोशनी को मन्द-सा कर दिया है। और 
उस कोठरी में दो स्त्रियों लड रही हैे। लडाई मद्रासी भाषा में हो रही थी, 
जो निरचय ही ध्यान से सुनने की उत्सुकता पैदा कर रही थी। आपस के 
कुछ अनपढ लोग उस वाकयुद्ध का आनन्द ले रहे थे और कभी-कभी 
बीच में, व्यग्य से मुस्कराते भी थे। 

ये दोनों मिस्टर पिल्‍ले की ही पत्नियाँ हे. यह रहस्य मझे उसी दिन 
उसी क्षण मालम हआ। 

में भी सुनता रहा। जो कुछ भी समभ में आया वह यह कि भगडा डबल 
रोटियों को लेकर हो रहा है। मिस्टर पिल्‍ले की स्थिति गम्भीर है। आज 
उनकी जेब कतई खाली है। यदि डबल रोटी की व्यवस्था हो जाती, तो 
मामला सम्हल जाता। किन्तु मिस्टर पिल्‍ले मजबूर है। इतना होने पर भी 
एक अन्याय और भी कर रहे है। वे पक्ष लेते हे, अपनी उस पत्नी का जो 
कुरूप, भोंडी और स्थूलकाय है। 

में खड़ा-खडा ऊब रहा था कि पिलल्‍ले साहब की दृष्टि मुझ पर पडी 
वे कट बाहर निकल्‍रू आये। बोले-- मूर्ख हे ये, देहाती 

मेने कहा---बात सच है। लेकिन यह सम्भालिये पॉच का नोट और 
फ़िल्हाल जिन वस्तुओं को लेकर भगडा हो रहा है, जिनकी कमी है, उन्हें 
पंगा लीजिए।' 

उन्होंने शीक्ष ही---सधन्यवाद ---नोठ ले लिया और उसे उन दोनो के 
बीच फेकते हुए कहा---यह लो, किन्तु अब चुप रहो।' 

फिर मेरी ओर मुँह कर के अपनी पत्नी की ओर इशारा कर 
बोले-- मिस्टर बाड्चू, मे किसी प्रकार भी उसे असन्तुष्ट नहीं कर 
सकता ।' 

मेंने प्रश्न कर दिया--ऐसा क्‍यों मिस्टर पिहले ?' 


उत्तर में उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी की ओर इशारा कर कहा--यह 
मेरी पहली वाइफ' है। देखने-सुनने मे गोकि अच्छी है, परन्तु अनावश्यक 
“रोब गालिब करना चाहती है जो मुझे बरदाइत नही। फिर, इससे भी कही 
ज्यादा जो बात मेरे निकट अहमियत रखती है, वह है, उस बेडौल स्त्री की 
बात रखना, उसका सम्मान करना। कारण, उसके नाम बेक एकाउपण्ट है। 
वह कभी किसी की पत्नी थी। दूसरी शादी मेने इससे की, केवल पैसे को 
देख कर । शादी के पूर्व इसने पूछा था---आप विवाहित तो नही ?” तब 
मेने इससे भूठ ही कह दिया था---नही।' जब शादी हो चुकी और अस- 
लियत खुली, तो इसको मानसिक चोट लगी। सच तो यह था कि बेक 
एकाउण्ट इसी के नाम है, काम तो यही आयेगी। इसे नाराज़ कैसे किया जा 
सकता है ?' 
में अब वहाँ से खिसकने वाला था, कि इसी बीच एक दूसरा व्यक्ति भी 
हमारी और आता दिखाई पडा। मिस्टर पिलल्‍ले अन्दर खिसक गये। वह मेरे 
निकट आ कर खडा हो गया। खडा रह। काफी देर तक। में भी पिल्‍ले साहब 
की प्रतीक्षा करता रहा। किन्तु वे बाहर नही निकले। उनकी एक पत्नी ने 
कहा---साहब मार्केटिंग करने गया है। अभी सब जाओ ! 
'किधर से गया साहब ”?' 
पिछले दरवाज़े से।' 
में आइचर्य मे पड गया। आखिर ऐसा मिस्टर पिल्‍ले ने क्‍यों किया।? 
कया आवश्यकता आ पडी ? तत्काल ही मेने उन आगन्तुक महाशय से प्रइन 
किया---आप कैसे पधारे ? कोई काम था साहब से ? राशनकार्ड .तो..?* 
जी नही, जी नही, यह क्रिस्तान रुपये उधार लाया था, अब देता नहीं 
है । पचीसों बार आ चुका हूँ, लेकिन आना ही व्यर्थे कर देता है। आज ही, 
देखिए न, आँख में धुल डाल कर कैसे चम्पत हुआ है ? अच्छा, अब बच्चु से 
"निपट ही छुगा।' 
मिस्टर पिल्‍्ले के क्रियाकलाप मुझे विचित्र-से रूगे। में मुस्करा कर 
घर की ओर चल पडा। 
दूसरे ही दिन, संचमुच ही मिस्टर पिल्‍्ले हास्पिटल मे दाखिल कर दियें 
जये थे, जो एक ओर स्प्रिगदार बेड' पर लेटे चोटों का आनन्द ले रहे थे। 


९४ 


समाचार मिलने पर मे उन्हे देखने हास्पिटल जा पहुँचा। देंखा---उनकी 
एक टॉग और एक हाथ ऊपर उठा कर बॉघ दिया गया है। 

मेने सहानुभूति के स्वर मे पुछा---यह सब क्‍या मिस्टर पिल्ले ? 

हाथ-पैर भूछा-भूल रहे हे, कोई विशेष बात नहीं है ? 

आखिर यह सब हुआ कंसे ? कही झगड़ा फ़िसाद .... 

कतई नहीं। मेरी किसी से दुश्मनी ही क्यों होने रूगी ? मेने किसी का 
बिगाड़ा ही क्‍या है ?--यह सब मोटर-दुघेटवा का परिणाम है।' 

में ठहाका मार कर हंस पढ। सिस्टर पिलले ने पूछा---आखिर हसी 
कैसे आयी ? 

साहस पर ! मेने उत्तर दिया। 

“चिन्ता क्या ? दो दिन मे जेण्ट हो कर फिर आता हूँ, मिस्टर बाज्च्‌ ! 
यह संब चलता रहता है।' कह कर उन्होंने मुझे सर हिला कर वहाँ से चले 
जाने की आज्ञा दे दी। 

ज्यों ही मे हास्पिटल के बाहर आया, त्योही फिर ठहाका ऊूगा कर हंस 
पड़ा---अपने प्रभु के गुण गान के उपलक्ष में। 

7 नर मद 

उस दिन मेरे यहा अनेक अतिथि आ गये थे। राशन की कमी देख कर 
अनायास ही पिल्ले साहब का स्मरण हो आया। सोचा मे ने---अब उन्ही की 
शरण लेती चाहिए। 

सन्ध्या समय उनके बँगले प्र जा पहुँचा। देखा--मिस्टर पिल्‍्ले नही 
हैं। उनकी एक पत्नी बाहर निकली और बोली---आप मेरे पतिदेव को 
चाहते हे ?' 

मेने मुस्करा कर उत्तर विया---अवश्य, उन्हीं की तलाश में आया हूँ। 

उँगली से सामने की ओर इशारा कर बताया---वे है।' 

में निकट गया। देखा---एक टेबिक् पर एक होल्डाल' लिपटा रखा है 
और सर तथा पैर उसके बाहर हैं। वे सोये हुए हे मुझे यह देख कर आइचर्य 
हुआ, कि यह बिस्तर नही, मिस्टर पिल्‍ले है। 

जगाने पर मालूम हुआ---दिन में उन्होंने आज ज्यादा पी ली थी 
तबीयत भारी रही, इसीलिए इस प्रकार सो गये है। 


मेने अपनी मुसीबत कही और, उन्होने रास्ता बता दिया। में सन्तुष्ट 
हो गया। 

मेरे पूछा--- क्या तबीयत ठीक नही है ! 

उत्तर मिला---सो तो है ही। सैकडों की हानि भी हो गयी '! 

“वह कीसे ?* मेने प्रश्न किया। 

उससे आपका कोई सीधा सम्बन्ध नही है। उसे जाने भी दो मिस्टर 
बाब्चू 

में उन्हे नमस्कार कर घर लौट पडा। रास्ते मे सोचता आगे बढ रहा था 
कि आज वे इतने सुस्त क्यों थे--शायद किसी से रिव्वत मिलने वाली 
होगी, हाथ से शिकार निकल गया होगा! दूसरा और कारण ही क्‍या 
हो सकता है? 

इतने में मिल गए मिस्टर यज्दत्त । इनसे मेरी पुराती जान-पहचान 
है। हरफ़नमौला आदमी हे। उन्होंने पूछा---क्यों भई, आप मिस्टर पिल्ले 
को कंसे जानते हे ?' 

जानता कहाँ हूँ, जानने की चेष्टा कर रहा हूँ, किन्तु उन्होने मेरे सारे 
प्रयत्न बेकार कर दिये।' 

किसे 7 गै 

'कही पर भी उन्हें समझ नही पाया, आपकी बात का केवल इतना ही 
उत्तर हो सकता है । लेकिन में चूकि उनसे दिलचस्पी लेता हूं, इसलिए उन्हें 
छोडना भी अच्छा वही लगता। कभी-कभी तो मुझे उन पर बडी दया जाती 
है और विषय, प्रतिकूल परिस्थितियों से घिरा देख सहानुभूति भी 

अजी, आज तक तो में ही अपने को तीसमारखां लगाता था, लेकिन 
उन्होंने तो हम रोगों को भी पीछे छोड़ दिया।' 

किया में भी आपसे उनके सम्बन्ध मे कुछ विशेष जानकारी प्राप्त कर 
सकता हूँ ! 

तो सुनिये। छेकित सब कुछ गोपनीय है।' 

'कृतई, विश्वास रखिये।' मेंने उत्तर दिया। 

मिस्टर यजश्ञदत ने कहना प्रारम्स किया--कल अपनी मित्र मण्डली के 
साथ हम लोग द्यबनम के यहा जा! रहे थे। रास्ते मे मिल गये मिस्टर पिल्‍्ले। 


बोले---मुमकिन है, मेरी उपस्थिति आप छोगों को अप्रिय मालूम हो।' 
उनके इस वाक्य का अर्थ था, यदि उन्हे प्रसन्नतापृर्वंक नही ले जाया जायगा, 
तो उनके वहाँ पहुँचने का भी सन्देह किया जा सकता है। हम लोगों ने उन्हें 
भी ले लिया। वहां पहुचने पर हम लोग ताश खेलने और पीने-पिलाने में 
लग गये और मिस्टर पिल्ले लेटे-लेटे जाने क्या विचार करते रहे। पी चुकने 
के बाद उन्होंने अपने लेटने का स्थान चुना टेबिल, जिस पर शबनम बहुधा 
बैठ कर लिखा-पढा करती है। कुछ समय तो वे धैये से लेटे रहे और बाद में 
उठ खडे हुए और अकचका कर बोले---मिस्टर यज्ञदत्त, मुझे आज्ञा 
दीजिये। अब न रोकिये, बिल्कुल न रोकिये। मेने पूछा---क्यों ”? क्या बात 
हो गयी ? ” 

मिस्टर पिल्‍ले ने उत्तर दिया---अभी-अभी आपके मिलने के पूर्व में 
ब्राइट हाल रेस्ट्रोरॉ' में चाय इत्यादि ले रहा था। मेरे हाथ में बेग था और 
उसमे कुछ सरकारी कागजात तथा १५० रुपये। मे उसे वही भूल कर 
चला आया हूँ।' 

सभी कह उठे--फौरन जाइये साहब, फ़ौरन ! यहाँ शिष्टाचार 
निभाने की अब आवश्यकता नही हैं' 

मिस्टर यज्ञवत्त कहते रहे---पिल्ले साहब वहाँ से खिसक आये। 
दूसरे दिन वे एक स्वर्णकार के यहाँ पहुँचे भे और अपनी पत्नी का हार बेच 
रहे थे। स्वर्णकार ने उसे कई बार कसौटी पर घिसा और उत्तर दिया--- 
साहब, यह चोरी का माल दिखता है। मुझे माफ कीजिये। 

दूसरे दिन की घटना म्‌ झे उनके एक अन्तरग मित्र से मालम हुई। 
मिस्टर यज्ञदत्त ने कहा-- इतनी ही नही, उसी दिन सध्या समय जब में 
मिस्टर पिल्ले के साथ वायुसेवन के लिए जा रहा था और शबनम की कौदी 
के नीचे से गुजरा, तो ऊपर से आवाज आई---आइये न साहब, आज हार 
नही ले जाइयेगा ? मेने सम्पूर्ण घटनाचक्र को समझ लिया।' 

मिस्टर यज्ञदत्त की बाते सुनकर में ठह्वका मार कर हंस पडा और 
घर की ओर चल पडा। रास्ते भर में मिस्टर पिल्‍ले के चरित्र की 
बारीकियों को सोचता रहा और घर आया तो देखा--पिल्ले साहब उपस्थित 
है। मेंने पूछा---क्यों केसे ? 


*- ९७ «« 


बोले--- पॉच रुपया दीजिये मिस्टर बाञऊचू। वाइफ को कालल्‍रा हो 
गया है और दवा दारू की व्यवस्था करनी है।' 

में कुछ भी उत्तर न दे सका और जेब से 'सहानुभूतिपूर्वंक पॉच रुपये 
निकाल कर उनकी भेट कर दिये । 

नह मे मै 

इधर मे बहुत दिनों से मिस्टर पिहले से नही मिला; किस्तु सुनने मे 
आया, वे नौकरी से घूसखोरी के अपराध में, अलग कर दिये गये है। 

लेकिन जैसे मिस्टर पिल्‍ले पर प्रभु की सदेव कृपा होती रही है। 
सन्ध्या को जब उस दिन में अपने मित्रों के साथ वायुसेवन के लिए जा रहा 
था, तो देखता ह--मिस्टर पिल्ले विचित्र ड्रेस में खडे हे। मस्तक पर एक 
बैटरी लगा रखी है। शरीर सूट-बूट से लैस है। सर पर बढिया नाइट कैप 
है । एक बूढा सेवक खजूर का बडा पखा पीछे खडा भल रहा है । वे उच्चकोटि 
के मजन बेच रहे हे। और दूर की हॉक रहे हे । 

में जो अनायास वहाँ जा खडा हुआ तो उनकी दृष्टि मुझ पर आ पडी | 
अपने चारों ओर खडी भीड को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा--- हाथ 
कज़ुन को आरसी क्‍या? आप सब लोग मिस्टर बाञ्च्‌ के दाँतों को देख 
सकते है । कैसे स्वच्छ और मोती जैसे दाँत है ? इनका सौन्दर्य इनके दॉत 
है। ये मेरे पुराने ग्राहत हे और सेव मेरा ही मंजन प्रयोग में लाते 
है ।' इतना कह चुकने के बाद वे मेरे दाँत खोल कर भीड को दिखलाने 
लगे। 

भीड मेरी ओर देखने रूगी। मिस्टर पिल्‍ले ने केहा--- कहिये न साहब 
आपको मेरा मजन लगाते कितने वर्ष हो गये ? 

मेरे मुह से अनायास ही निकक गया--कई वर्ष ! 

लोग मजन की जीशियों को खरीदने रूगे और पिल्‍्ले साहब बिक्री में 
जुट गये । मेंते अवसर पा कर राह ली। अपनी कमजोरी पर मुझे तरस आ 
रहा था, परन्तु कर ही क्या सकता था ? यह विवशता की असमर्थंता थी 

मेड येह में 
लगभग पन्द्रह दिन पदरचात्‌ चौराहे पर काफी भीड थी। में दफ्तर से 


घर लौट रहा था। प्‌लिस कई व्यक्तियों को घेरे खडी थी। उत्सुकतावश 
८ 


बट पड 


में अपनी साइकिल रोक कर नीचे आ गया। एक व्यवित ने पुछा---भाई 
क्या बात है ! 


काबुली लड रहे है 
क्यों ?' 
पता नही | 


में भीड के निकट-जा पहुँचा। दूर से देखा---काबुछी खून से ऊथपथ 
है। इसी बीच कान मे आवाज पडी---मिस्टर बाब्चू, मिस्टर बाल्च ! 

मेने घूम कर देखा, तो मुह से निकल गया---मिस्टर पिल्ले | क्या बात 
है ? यह सब क्‍यों ? 

“इसकी परवाह क्‍या ? अच्छे मौके पर मिले, सुनो तो 

में मिस्टर पिल्‍ले के निकट आ गया। उन्होने कान से कहा---घर 
में कह देना जाकर, में तीन महीने के लिए कलकत्ता गया हूं। इस घटना का 
कतई ज़िक्न करना, हाँ. ? 

मैतें सर हिलाते हुए अपनी स्वीकृति दे दी। फिर मिस्टर पिल्‍ले 
गरम पडे और काबुली वाले की ओर देख कर बाले--- कच्चा खा जाऊंगा, 
कच्चा ! समभा क्या है तूने मुझे ! तेरा काम है, देना और मेरा काम है 
लेना ! लेकर भी कोई वापस देता है ? वह कोई दूसरे होगें ? ' 

भीड मिस्टर पिल्‍ले के साहस पर दर्ग थी। छोग कह रहे थे---अच्छा 
आज काबूली को ब्याज दिया है इस पटके ने !. हिन्दुस्तानी जनता को ये 
लटते है, लूटते। इनके साथ इसी तरैह पेश आना चाहिए।' 

-काबुली और मिस्टर पिल्ले पुलिस की लारी में बैठ गये। लारी 
चलने लूगी, तो मिस्टर पिल्ले ने प्रसन्नता पूर्वक मेरी ओर देखा और 
कहा--- अच्छा, चले दोस्त, अरूविदा ! 

इसके बाद कानपुर से मेरी बदली बनारस हो गयी। मे अपनी पारि- 
वारिक समस्याओं में ऐसा उछभा कि मिस्टर पिलले को केवल भूल 
ही भर नही गया, बल्कि ऐसा अनुभव हुआ मुझे जैसे मेरा उनसे न कभी 
परिचय था और न कोई किसी प्रकार की जान पहचान ही ! कभी भी 
उनका काल्पनिक चित्र मेरे स्मृति पट पर भूल से भी नहीं प्रतिबिम्बित हो 
सका । 


एक दिन, सन्ध्या समय, अपनी आवश्यक वस्तुओं को खरीद कर घर 
लौट रहा था। मैने देखा--सामने मोटर साइकिल पर, फौजी पोशाक 
में, मिस्टर पिल्ले 

आइश्चये से एक बार चकित हो गया। हाथ अपने आप--मोटर साइ- 
किल को रोकने के लिए उठ गये। 

साइकिल रुक गयी। मिस्टर पिल्‍ले ने फ़ौरन ही पहचान लिया। 
बोले--- हल्लो मिस्टर बाञ्जू ! यहाँ कैसे? 

बदली हो गयी है।' मेने उत्तर दिया। 

अंग्रेजी मे उत्तर दिया--बहुत अच्छा हुआ। आओ, बेठो, साथ 
चलो |, 

मेने कहा--कहाँ जाना है ? ' 

बेंगले। बैठो, चलो ! 

में साइकिल पर बैठ गया। उस क्षण मेरी विचित्र स्थिति थी। मोटर 
साइकिल तेजी से दौडती एक सुन्दर बँगले के सामने आकर लछग गयी। 
मिस्टर पिलल्‍ले ने कहा---यह है मेरा गरीबखाना। में यहाँ का सीनियर 
मार्केटिंग इन्सपेक्टर हँ। जमाना बदल गया : 

मेरं मस्तिष्क मे वह चित्र नाच उठा, जब एक दिन मिस्टर पिल्ले पुलिस 
लारी मे, अपराधी के रूप मे, बडे घर जाने की तैयारी कर रहे थे। मे ठहाका 
मार कर हंस पडा। मेरे मुह से अनायास ही निकल ग़या--में आपको 
आपक्री -सफलता-के-निए पबारकबाद देता हूँ।' 

और ठेबिल पर चाय हम लोगों की प्रतीक्षा कर रही थी। 


चुनोती 
[ श्री विष्णु प्रभाकर | 


बद्रीनाथ यात्रा का महत्व प्राचीन काल में जाहे कितना ही प्राकृतिक 
रहा हो, पर आज वह केवल धामिक है। यात्रियों की श्रेणी इस बात का 
प्रमाण है। सरकारी खर्च पर लोक परलोक बनाने वाले अधिकारियों को 
छोड़ कर अधिकतर बूढ़े स्त्री, पुरुष, विधवाएं या वीतराग अथवा और किसी 
प्रकार से दुखी व्यक्ति ही मुक्ति की प्यास लिए, अपने थके और जजेर चरणों 
से उस विकट मार्गको नापते देखे जाते है। और फिर इन लोगों की यात्रा की 
अन्तिम सीमा बद्रीनाथ के मन्दिर पर पहुंच कर समाप्त हो जाती है। उससे 
दो मील आगे भारतभूमि के अन्तिम गाव माना या पांच मील आगमे के 
हिम-प्रपात वसुधारा को देखने कोई विरला ही जाता है। सतोपन्ध और 
अलकापुरी जानें की लो कल्पना करना भी दूर की बात है। 

हमारे गोपाल बाबू इनमें से किसी श्रेणी में नही आते। शरीर से क्षीण 
होने पर भी उन्हें वृद्ध नहीं कहा जा सकता । वीतरागी भी वे नहीं हैं ; क्योंकि 
धर्म कें नाम से वे उसी प्रकार भडकते हें जिस प्रकार सांड छाल कपड़े से । 
इसलिए जब उन्होंने उत्तराखंड के दुर्गंम पथ को ग्रेहण किया, तब एक धर्म. 
भीरु वृद्धा ने यही सब देख कर उनसे पू छा--- कटा ! तुम कहां जा रहे हो ? 
तुम्हारी तो अभी यात्रा करने की उमिर है नही।” 

गोपाल ने उत्तर दिया-- मा! म यात्रा करने नहीं आया हूँ ।” 

तब चकित स्वर में वह वृद्धा बोल उठी--- यात्रा करने नहीं आये, तो 
आये किसलिए हो ? ” 

“प्रकृति से प्रेम करने! 

वह धर्म-भीरु वृद्धा इस उत्तर का अर्थ क्या समभझती। हँस कर रह गई। 
परन्तु गोपाल ने सारी यात्रा में इस प्रकृति-प्रेम का खुल कर परिचय दिया । 


११ आल 


भहाँ तक कि बद्रीनाथ पहुँच कर भी उसने मन्दिर में होने वाले उत्सवों में 
कोई रुचि नही ली । किसी तरह रात बिता कर वह सवेरे ही वसुधारा के 
लिए चल पडी | उसका मित्र आनन्द सपरिवार उसके साथ था। और गोपाल 
उनके साथ था, यह कहे तो अधिक सत्य होगा। क्योकि आनन्द एक बडा 
सरकारी अधिकारी था और निरीक्षण के कार्य से उधर जा रहा था। अच्छा 
साथ रहेगा---यह समझ कर गोपाल उसके साथ हो लिया था। वैसे उसका 
साथ बहुत सीमित था। ठहरने और खाने की सुविधा ने उन्हें बाँध रखा था। 
नही तो गोपाल छा सब को छोड कर प्रकृति से प्रणय करने की धुन में आगे 
बढ़ जाता था। वसुधारा के मार्ग पर भी उसने सब को पीछे छोड देना 
चाहा, पर तभी आनन्द ने पुकार कर कहा-- भरे गोपाल! क्‍या 
पितरो को पानी भी नही दोगे ? 

गोपाल ठिठका। बोला---*कैसे पितर ? तुम कहना क्या चाहते हो ? ” 

“बह देखो, तुम्हारे दाहिने हाथ पर, अलखनन्दा के किनारे, उस शिला 
पर अँजलकि की मूर्ति अंकित है 

“हा वह है तो . 

“बह ब्रह्मकपाली है। कहते है, यहाँ स्वर्गद्वार से अंजलि फेला कर पितर 
लोग अपने बशधरो से पिण्डदान ग्रहण करते हे। 

गोपाल ने हाथ की लाठी पर अपनी समस्त देह को तौलते हुए जवाब 
दिया ---आनन्द। में पुण्य अरजन करने नही, ज्ञान-अर्जन करने आया हूँ।” 
और यह कह कर वह रुका नही, आगे बढ गया। 

तब तूफानी हवा थम चुकी थी। आकाश में कही कोई मलीनता नहीं 
थी। मेघ थक पथिक की भांति हिम-शिखरों पर आराम कर रहे थे। दिशाएं 
निखरी नीलिमसा से मुखरित हो रही थी और अरुण किरणों का मुकुट 
पहन कर कैंराश की गरिमा नव वधू की ,तरह मुस्करा उठी थी। 

गोपाल जिस मार्ग पर चलरू रहा था, वह अलखनन्दा के दाहिने किनारे 
पर, नारायण पर्वत के चरणों में, दूर तक समतलू भूमि पर चढा गया था। 
इस ओर कहीं-कही आवास-गृह थे उस ओर नर-पर्वत के आंचल में दूर-दूर 
तक ऊँची-नीची भूमि पर अनेक भेड-बकरियाँ और घोडे चर रहे थे। उन्हें 
देख कर सहसा गोपाल को याद आया, यही कही व्याम-कर्ण घोडे दिखाई 


४ ९ १, | रे जज 


देते हे । तब उसने दृष्टि गडा कर दूर-दूर तक उन अलौकिक जीवो को खोजना 
शुरू किया और फिर कुछ क्षण बाद वह एकदम लज्जित हो कर हंस पडा 
में भी कैसा मूर्ख हें । जो नही है उसी को खोज रहा हूँ ! ” 

तब भीतर का गोपारू यह सोच कर और भी तेजी से हसा-- जो नही 
हैं, उसी को तो खोजा जाता है । उसी की खोज के लिए ज्ञान का समस्त 
उपयोग है। 

गोपाल का अन्तर जैसे हिल उठा-- विश्वास-अविश्वास का यह कैसा 
सघर्ष है! यह कैसा देवासुर सम्राम निरन्तर चलता रहता हैं। ऊपर से जो 
कुछ है, उसका बिल्कुल उल्टा ही क्यों अन्तर में रहता है ? अहकार, व्यक्ति- 
स्वातंत्य, दम्भ, इनमे क्‍या बहुत अधिक अन्तर है? अन्तर की कुरूपता, 
मालिन्य और सन्देह---ये ही क्या बाहिर के दम्भ के दूसरे रूप नही हैं ! हाय 
रे नगण्य पुरुष ! तू वया सगाधिराज के इस विराट रूप के सामने अपनी 
अहन्ता की विफलता की स्वीकार नही करेगा ! ! . . . . 

“नहीं. . नहीं . »!” गोपाल ने मानो चीख कर कहा-- नहीं, 
मनुष्य दीन नही है, लूघु नही है, वह यहाँ है; और यही उसकी महानता का 
प्रमाण है।'' 

वह इसी सचर्ष में तल्‍लीन था कि आनन्द ने उसके कनन्‍्धे को छूकर 
कहा---- वह देखो गोपाल, तुम्हारे अध्ययन की एक वस्तु .. .. . « | 

“क्या ”” गोपाल चौका। 

“बह देखो वह पक्षी। 

गोपाल ने उसी दिद्या मे देखा--एक कौबे जैसा पक्षी है, पर उसकी 
चोंच और पजे लाल हे। 

उसने तब दुरबीन से बहुत-से ऐसे पक्षी खोज निकाले और जब चुकन्देर 
जैस रगवाली' एक युवती पुआल का अपेक्षाकृत बडा बोफ पीठ पर लिये 
पास से गृजरी तो, उसने पूछा--- क्यों जी, यह कौन पक्षी है ? '' 

प्रदन सुन कर युवती नीची दृष्टि किए हुए मुस्कराई और हट कर खड़ी 
हो गई। न बोली; न आगे बढी। परल्तु पीछे-पीछे एक प्रौढ़ा आ रही थी। 
उसी युवती का सान्ध्य रूप उसे कह सकते हैं। भरने की तरह हँसती हुई 
बोली---- क्या पूछते हो, बाबू'जी ? 


१०३ 


“यह कौन पक्षी है?" 

“क्यागं चू। तिब्बती कौवा 

“तभी चू-चू करता है।” गोपाल ने हँसते हुए कहा। 

नारी तो हंस ही रही थी। उस हँसी से प्रोत्साहित हो कुर गोपाल उससे 
अइन-पर-प्रइदन करने लगा। वह भूल गया कि उसे वसुधारा जाना है। जञाव 
की प्यास ने उसके इस ज्ञान को मोह के कुहरे से ढक दिया। वह जब जागा 
तब उसके साथी नीचे पुल तक पहुँच चुके थे। 

वह तेजी से आगे बढ़ा, इतनी तेजी से कि उसे भागना पथ । उसने उस 
निरच्तर भूले से फूलते रहने वाले पुल को पार किया। फिर 'माना' गाव की 
प्राणायाम वाली चढाई चढ कर जेसे ही वह सरस्वती नदी क तट वाली 
बटिया पर आया, वैसे ही बादलो ने गर्जन-तर्जन के साथ आकाश को घेर 
लिया। अरुण का स्वरणिम किरण-जाल छिन्न-भिन्न हो गया और ठडे कुहरे 
ने पृथ्वी को निगल जाने के लिए सुरसा की भार्ति मुह फाउना शुरू कर दिया। 
कि तभी उसे एक और नारी दिखाई दी। वही भरने-सी हँसी और गहरी 
सस्ध्या सी लालिमा। पूछा-- वसुधारा कितनी दूर है?” 

“बह सामने हे---दी माइल।' 

“मार्ग क्या बहुत विकट है ? 

“न, न, सीधा है। जिस पर तुम जा रहे हो। बस, बिल्कुल ऐसा।' 

“धारा में बहुत ऊँचे से पानी गिरता है?” 

नारी हँसी और---- हाँ, पर सब पर नही गिरता। जो असली मां-बाप 
के है उन्ही के मस्तक पर धार गिरती है। 

कह कर वह फिर हँसी और पास के खेत मे गायब हो गई। 

गोपाल को लगा, जैसे दिशाएं हँस उठी हो। पर यह उसने क्या कहा ! 
उसने भी कही ऐसा ही पढा था। बस, उसकी गति अनजाने ही शिथिल 
पढ़ गयी। वह सोचने रूगा-- जो असली मा-बाप के हे, उन्हीं के मस्तक 
पर धार गिरती है । जो असली भा-बाप के हें. . . जो . .. । कि सहसा 
उसका ध्यान सुद्ृस्भृत मे जा पहुँचा-- द्रोपदी सहित पाण्डव यत्र युगों पूर्व 
इसी मार्ग से अलकापूरी गये थे, तब क्या यह धारा उन सब के मस्तक पर 
न गिरी होगी ? क्‍या व . .? नही-तहीं। .. . यह सब पाखण्ड है, ढोंग 


है। मर्खता की चरमसीमा है।” उसने तीव्रता से कहा। और वह दूरबीन से 
सामने फेले हिमप्रदेश को देखने छगा। आगे इसी मार्ग पर सतो पथ है। 
जहा मानिनी द्रोपदी ने प्राण विसजित किये थे और अलकापुरी है, जहाँ 
युधिष्टिर ते कुत्ते को लेकर धर्मराज की उपाधि पाई थी। अच्छा, तो क्या 
इसी अलकापुरी मे क्या इद्ध का साम्राज्य था ? क्या नर-नारायण के तप से 
डर कर इसी इन्द्र ने मेनका को उनका तप भग करने के लिए भेजा था ? 
तब उस दिन यह भयानक हिम-प्रदेश नारी के नूपुरो की भंकार से किस प्रकार 
भाकृत हो उठा होगा ! प्रकृति का यह गेरिक रूप, उस प्रज्वालत वासना का 
स्पर्श पा कर किस प्रकार इन्द्र धनुष की आभा-सा चमक उठा होगा ! और 
»«»- और क्या इस धारा की बूदे उन सब के मस्तकों पर न गिरी होंगी ? ..... 

वह जोर से हँसा--क्या वे सब वर्णशकर थे ? उन्हें माता-पिता की 
चिन्ता नही थी ? यहा तक कि वे प्रतापी वसु भी, जिनका लाम इस धारा 
को मिला है, पूछने पर अपने माता-पिता का नाम न बता सके होंगे ” और 
रूप की रानी वह उर्वशी ? वह सौदर्य की प्रतिमा ! बही कुछ दूर उर्वशी- 
कुण्ड पर उसका जन्म हुआ था। उसके मस्तक को भी तो इस धारा ने कभी 
नहीं छुआ होगा। 

“अभागिन धारा ! ” उसने आकण्ठ सहानुभूति से भर कर कहा और 
वह हँस पडा । यह मनुष्य कितना प्रपंची है! उफ ! कैसा छकाया है उसने 
संसार को ! | ” 

वह तब एक बहुत ही सेंकरे मार्ग पर आ गया था। एक और विशाल 
शिक्ला-खण्ड थे। दूसरी और अलखनन्दा का अतरू। वह ठिठका। क्षण-भर 
रुक कर उसते उर्वशी की जन्मभूमि को देखा। वह अनुपम सौन्दर्य क्या 
इसी भयानकता के गर्भ से प्रकट हुआ था ? सुना है बहाँ सामने भोजपत्र के 
वन में कस्तूरा रहता है। सुगन्ध और सौन्दर्य दोनों की जन्मभूमि तचुता 
(नाजुकता) से कितनी दूर है? पर. ., .पर. .. . हा, ठीक तो है। उसने 
एकदम सम्भकू कर कहा--जिसें मे भयानकता कह रहा हूँ, क्या वही 
पुरुष के पौरष की कसौटी नही है ? क्या वे सुगन्ध और सौन्दय्य को भोगने के 
अधिकारी पुरुष नही है जो प्रकृति की रुद्बता को अपने पौरुष से मधुरता में 
बदल देते हें? 


तब गोपाल मुस्कराया--- तब वसुधारा के जलकण उन पुरुषों का 
निस्संदेह अभिषेक करते होंगे। क्योंकि पौरुष ही तो किसी के माता-पिता 
के गुण-अवगुण की कसौटी है।” 

अपनी इसी खोज से गोपाल गवे से भर उठा। पर उसी क्षण पास के 
खेत से निर्भर सी हँसी फूट पडी। देखा---एक यवती है। पर इससे पूर्व कि 
नेत्रों का सम्मिलन हो, वह बिजली-सी दूर जा चमकी। उस निजेन में 
गोपाल को लगा, जैसे उवंशी हँस रही है। हँसे जा रही है। इधर-उधर, 
यहा-वहाँ सब कही केलाह मे उसकी यही हँसी व्याप्त है। क्षण भर रुक कर 
वह फिर आगे बढा कि वह फिर ग्रीवा उठा कर खिलखिला पडी। गोपाल 
फिर ठिठका। तब सहसा उसकी दुष्ट उसे खोजते-खोजते खत की पक्‍की 
मेड पर जा कर अटक गई। देखा वहाँ दूरबीन रखी है। ओ ! विचारों में 
वह इतना खो गया था कि उसे छोड ही जा रहा था |! “तो क्‍या उसकी इसी 
भूल पर वह निर्भेरणी फूटी थी ? ” उसने मुस्करा कर कह दिया--- तुमको 
बहुत धन्यवाद, निर्भरणी | ” 

और हृदय में उत्साह लिये वह आगे बढ गया। तभी हर्षातिरेक से 
आनन्द ने पुकार कर कहा---गोपाल। देखो वह वसुधारा।” 

“कहां” गोपाकू बोला और तभी देखा--दूर एक शिखर से जरू की 
पतली-सी धार गिर रही है। कभी वह वायू के साथ अठखेलियाँ करती है, 
कभी आँखों से ओभल हो जाती है। 

प्रथम दर्शन बहुत अच्छा नही लगा। कहाँ न्यागरा और जोग के जरू 
प्रषात और कहाँ ये क्षुद्र जलकण ! क्या यही पुराण-असिद्ध आठ बसुओं 
की धारा है ? क्या यही मनुष्य की वर्णशकरता का निर्णय करती है ? 

वहु सोच 'रहा था और दौड रहा था। वह अब एक मेदान को पार कर 
चुका था और सामने का मार्ग नाना रूप-रूपाय शिला-खण्डों से भरा पद 
था। वह उन पर तेजी से दौडने छूगा। पर मार्ग का अन्त नही आ रहा था। 
उसने घडी देखी। गाव छोड़े एक घंटा हो चुका था। पर दो माइल अभी 
समाप्त नही हो रहे थे। तब उसने एक व्यक्ति को दे खा, जो उधर से आ रहा 
था। पछा---- बसधारा कितनी दूर हैं?” 

दो माइल उस उत्तर मिला। 


“अब भी दो माइल दूरी बनी ही रही ! ” उसके मह से निकल गया। 
जी हाँ। रास्ता जो बहुत विकट है।' 

यह स्थिति उसके लिए एक चुनौती थी। गोपाल एक बार फ्रिफका। 
उसने एक गहरी सॉस ली। फिर इधर-उधर देखा । बादल आकाश को घेर 
कर धरती की ओर बढ रहे थे। बस, वह तेजी से दौडने लगाः। आनन्द ने 
उसका अनुकरण किया। दूरबीन और कैमरा सब उन्होंने बन्द कर लिये। 
पर नारी-वर्ग अब भी पीछे था। उन्हे बार-बार रुकना पडता था। दूर दूर 
तक फैले हुए पत्थरों पर चढते-उतरते उनके पर दुखने रंगे थे और ठण्डा 
कुहरा जो बराबर बढता आ रहा था, हृदय में धुकधुकी "दा करने लगा 
थ]। आनन्द ने पास आ' कर कहा-- गोपाल | तुमने एक विचित्र बात 
सनी ह /) 
. “क्या?” 

“बसुधारा के छीटे उसी पर पड़ते ह जो वर्णशकर नही होता।" 

गोपाल तेजी से हेसा। वह बोला---' मेने भी सूना है। पर यह सब 
पाखण्ड हैँ, निरा पाखण्ड।” 

“सो तो है ही। सो तो है ही।'” आनन्द ने कह दविया--- पर में सोचता 
हँ--मन्‌ष्य का मस्तिष्क क्या-क्या षडयन्त्र रच डालता है! 

दोनों फिर हँसे । अब वे प्रपात के बिल्कुल पास आ गए थे । एक चढ़ाई 
और फिर नीचे घाटी से हो कर प्रपात के प्रत्यक्ष दर्शन। वह शीघ्रता से ऊपर ' 
चढा और फिर नीचे उतरने रूगा। अभी-अभी वहाँ पहाड टूठ कर सरक 
गया था। उसी के पद-चित्नो पर वह सभल-संभरू कर पग रख रहा था। 
कभी-कभी हाथ भी रख लेता था। उस क्षण उसके हृदय में भय भी था, 
उल्लास भी था। वह किसी भी क्षण गिर कर शिल]-छ्नण्डों से टकरा! सकता 
था। पर उसके सामने अब प्रपात बिल्कुल स्पष्ट था। उसने उसके बहते जल 
का स्पर्श किया। जैसे प्राण सिहर उठे । उसे याद आया कहीं लिखा था--“जो 
वसुधारा में स्‍्तान करेगा, उसे मुक्ति मिलेगी | 

“निस्सदेह उसे मुक्ति मिरू सकती हे---जीवन से मुक्तित।” वहू फुस- 
फुसाया और नृत्य करती धारा के पास जाने के छिए फिर पत्थरों पर चढ़ने 
लगा। पर में मक्ति नहीं चाहता।” 


कम १ 009 «७ 


वह अब बसुधारा के ठीक नीचे आ गया था। उसकी दृष्टि ऊपर को 
उठी हुई थी। ऊपर, बहुत ऊपर से, जल की एक धारा उछल-उछलछ कर 
नृत्य करती हुई तीचे चली आ रही थी। वायू रह-रह कर उसे छेह देती और 
तब वह हँसती-हँसती उसके पीछे दौड पडती। गोपाल मंत्र-मृग्ध-स्ता यौवन 
की उस क्रीडा को देखता रहा। फिर न जाने क्‍या हुआ ? जेसे किसी ने 
फूसफूसा कर उसके कान मे कह दिया--- तुम वर्णशंकर हो ।” 

क्या?” 

“हाँ तुम्हारे मस्तक पर वसुधारा की फुहार नहीं पढ रही है।” 

गोपाल के हाथ उठे। उसने मस्तक को सहलाया। फिर सहसा सामने 
के उन शिल्‍ला-खण्डो को देखा, जो सुचिक्कण, धूमिल हिम को मस्तक पर 
धारण किये अल्हृडता से एक दूसरे का सहारा लिये जल-धारा के बीच में 
लेटे हुए थे। उन पर चढना कठिन ही नही, असाध्य था। उसके सामने दीवार 
पर चढता सानो मखमल पर चलना था। परन्तु... ..- 

गोपाल मुडा। उसने आनन्द को देखा--सुडौछ शरीर, आजानुबाहु, 
उन्नत ललाट, विगाल वक्षस्थल, सुदुह पप_. .मस्तिष्क में तूफान उठा-- 
आनन्द बडी सरलता से इन पत्थरों पर चढ सकता है।. . वह चढेगा--- 
धारा उसके मस्तक का अभिषेक करेंगी. ..और वह... वह. .. 

गोपाल कॉपा। जीवन में पहली बार उसे अपनी लूघुता का अनुभव 
हुआ। वसुधारा उसके समूचे अस्तित्व को चुनौती देती जान पडी। उडती 
फूहारों के मिस मानो उसने अट्टहास करते-हुए कहा--- तुम वर्णशकर ! . . 
गोपाल तुम वर्णशशकर! ! . . हा ...हा. .. हा... : तुम वर्णर्शक्तर, . 
वर्णशशकर | !! ” 

जैसे भूचाल आ गया हो। धारा डोल उठी। गोपाल ने यत्रवत भयक 
गति से पत्थरों पर कूदना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में वह बहा पहुँच गय।, 
जहाँ धारा सीघी गिर कर एक बडे शिलाखण्ड से टकराती थी। और फिर 
सहस्रो ख़ण्डों से हो कर वायू के साथ-साथ चारों ओर बिखर जाती थी। 
तब ठण्डे कुहरे की असंख्य विन्दुओं ने उसे तर कर दियरा। उसका अन्त 
आलन्द से भीग गया। वह चिल्ला उठा--- मे बर्णशकर नही हूँ | में वर्णशकर 


नही हें 


न १ 0८ ४ 


उस आनन्द में वह कई बार चढा और नीचे उतरा। फिर जैसे 
कुछ याद आया। शीघ्रता से दूर बेठे आनन्द के पास जा कर वह बोला--.. 
“आनन्द ! क्‍या तुम वसुधारा के पास नहीं जाओगे ? ” 

आनन्द ने शान्ति से जवाब दिया--- नही ।” 


जिही.....! 
“हाँ गोपाल ! हम तुम क्या इतने मूर्ख हे कि इस क्षुद्र जलूधारा से अपने 
माता-पिता के पाप-पुण्य का निर्णय करवाएंगे। ऊहें ! . . . .तुम ठीक कहते 


थे--यह सब पाखण्ड है, निरा पाखण्ड ।” 

और फिर टिफ्नदान खोलते हुए कहा---आओ---भोजन कर लो 
5ण्डा कुहरा पास आ गया है। कुछ ही क्षण मे बर्फ गिरने रूगेगी ।” 

गोपाल तब था भी और नही भी । उसका उल्लास तब जैसे उन शिला- 
खण्डों से टकरा-टकरा कर चीत्कार कर रहा था। उसकी ज्ञानाजेंन-क्षुधा 
जल-बिन्दुओं के साथ उड कर उसकी खिल्ली उडा रही थी ! 


अर्थी के आँसू 


[ श्री मोहनसिंह सेंगर ] 


जब सब लोग चले गए, तो प्रतिभा न दबे पांव मां के कमरे में प्रवेश 
किया और इधर-उधर देख कर धीरे से बोली---मां आखिर मेरी शादी 
को लेकर तुम लोग इतने परेशान क्‍यों हो ”? क्या सचमुच में इतनी भारी 
हो गई हैं तुम सब के लिए ? अगर ऐसा ही है तो कुठौर फेंकने से कही 
ज्यादा अच्छा तो यही है कि मुझे किसी नदी कुएँ में ही ढकेल दो, पाप 
कठेगा। 

मां ने अन्यमनस्क भाव से, पर एक फीकी मुस्कराहट के साथ, प्रतिभा 
को खीच कर अपने गले से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए 
बौली--- तू तो सचमुच बडी भोली है, बेटी। अरे, लड़किया तो १राया धन 
है ही। बडी होने के बाद भला उन्हें कोई अपने पास रखता है?” 

“हां, तो में कब कहती हें कि तुम मुझे अपने पास ही रखो।” रुँधे हुए 
गले से प्रतिभा ने कहा---कह जो रही हूँ कि किसी नदी कुएँ में धक्का न 
दे दो, सन आफत मिट जायेगी।” 

इस वार मां ने प्रतिभा को अपने गले से हटा कर सामने खडा किया 
और उसकी आखों में आंखे डाल कर बोली--- पागल मत बन, प्रतिभा। 
मेने कभी तेरी इच्छा के खिलाफ कुछ काम किया या तुभसे कभी कुछ 
करवाया हे ? क्या कभी भी तेरे साथ मैने कोई दुव्यंबहार किया है ? फिर 
तेरी इस तनेजनी और इन आसुओं का मतरूब ? ” 

एक सिसकी भर कर प्रतिभा ने आंखे झुका ली और भर्राई हुई आवाज 
में बोली---मतलूव तुम सब जानती हो भा।” 

तनिक भल्‍ला कर मां ने कहा---“भई तुझसे तो पेश आना भी मुश्किल 
है। तुझे मालम नहीं, तेरे पिताजी ने कितने दिनों से खाने-पीने और सोने- 


- ११० - 


आराम करने का खयाल छोड, रात-दिन एक कर तेरें लिए इतना अच्छा 
घर-वर ढेँटा है। क्या इसे तू कुठौर ही समभती हूँ ! 

“में कुछ नही सगभती “-तनिक आवेश में आकर प्रतिभा ने कहा-- 
“केबल यह समभती हूँ कि मे अभी शादी नहीं करना चाहती। में अभी कुछ 
दिन और पढना चाहती हूं! 

“शादी नहीं करना चाहती | आगे पहना चाहती हू ! ! ' भा ने जरा 
ताने के साथ कहा---“यह कहना वद्मा आसान है, बेटीजी। पर क्या तुम्हें 
आठे-दाल का भाव माल्म है * क्‍या तुभे मालूम है कि इस सहगाई के जसाने 
में घर--गृहस्थी चलाना कितना कठित हो गया है 

“तो साफ-साफ यों कहो फि तुम से री आगे की पढाई का खर्च नही देना 
चाहती ।“-अतिभा ने तीखे स्वर में कहा । 

प्रतिभा, तुम पद्ी-छिखी हो, बेटी । मरे सह से तया-क्या कहलूवाओगी ? 
तुम जानती हो कि तुम्हारे दोनों भाठयों का दूध बन्द कर दिया गया है। 
तुम्हारी ज्ादी के लिए तुम्हार पिताजी ने जो २-३ हजार रुपया बंक में जमा 
किया था, महंगाई ने उस भी पचा लिय।। उस दिनों में कभी गौर से उनका 
चेहरा देखा है तुमने ” चिता ओर उदासी की ऋषिया क्‍या कभी तुम्हें नहीं 
दिखाई दी उनके चेहर पर ? हाय भगवान्‌ ' 

'छि' छि---कहते हुए प्रतिभा के पिता ते कमर में प्रवेश कर कहां--- 
“पहु क्या भगडा मोल ले बेठी तुम मा-बेटी। मेरे चेहरे की भ्ुरियों से और 
प्रतिभा से भला क्या मतलूव ? क्या आदमी कभी बहा नही होता १ और 
फिर हंस कर बोले---- प्रतिभा की मा, तुम्हारी तरह में भला हमेशा जवान 
थोड़े ही बना रहूँगा। 

प्रतिभा की मां जरा लजा गई। प्रतिभा ने भोती क॑ छोर से आस्‌ पोंछे 
और कमरे से बाहर जाने छगी; पिता ने द्वार की भीर बढ़ कर प्रतिभा का 
राज़्ता रोकते हुए कन्ना--- जरा रुकी, पंतिभा। मे तुम्ती से कुछ बात करने 
आया हूँ। तुम मन खराब न करो बती, मेने गोरीशकर और उसके बडे भाई 
से खूब जोर देकर और सोल कर कह दिया 7 के वे तुम्हारी आगे पढ़ने की 
इच्छा पूरी करेंगे और इस दिशा में कोई अडचन पैदा नहीं करेंगे। बोलो अब 
तो तुम्हे कोई आपत्ति नहीं ? ” 


55५३६ 5 


प्रतिभा कुछ वही बोली । उसकी आखें नीचे ही भुकी रही। पिता ने 
फिर कहना शुरू किया--- सिर्फ खर्चे का ही सवाल नहीं है, बेटी। तुम 
अब सयानी हो गई हो। लोग पूछते हें कि अभी तक प्रतिभा की शादी 
क्यों नही की ? पत्ना नही, इन्हे दूसरों की शादी में इतनी दिलचस्पी 
क्‍यों है ? ' 

“अच्छी ही तो बात है ---प्रतिभा ने धीमी आवाज में कहा---'आप, 
लोगो को खुश-सतुष्ट कर के, अपनी मान प्रतिष्ठा की रक्षा कीजिए। इसमे 
भला मुझे क्या आपत्ति हो सकती है ?” यह कह कर प्रतिभा कमरे से बाहर 
चली गई। 

पिता ने कुछ चितित-सी मुद्रा मे प्रतिभा की मा की और देखा और 
निराश स्वर मे बोले--- हायरे भाग्य अपनी ही सन्‍्तान के मुँह से क्या ऐसी 
बाते सुनना ही हमारे भाग्य मे बदा था ?” 

“तुम अपना मन खराब मत करो“--पअ्रतिभा की भा ने आइवस्त स्वर 
में कहा---आजकल का जमाना ही ऐसा है। पता नहीं पढर्नलख कर ये 
लडकिया क्या करेगी ?' 

प्रतिभा के पिता ने एक गहरी ठण्डी सास ली और धीरे-धीरे कमरे से 
बाहर चले गए। 

[२] 

“बहू क्या कहती या चाहती है, इससे मुझे, कोई सरोकार नही गौरी 
अंकर के बडे भाई ने कहा-- पर में यह पूछता हूँ कि तेरे भी तो अक्ल है, 
तेरा मन क्या कहता है ? 

“जैया --गौरीशकर ने नम्नतापुर्बवक कहा-- होगा तो वही, जो आप 
और माता जी आज्ञा देंगे; पर में समभता हूँ कि अगर उसे पढने-लिखने की 
सुविधा दी जाय, तो इसमे हर्ज ही क्या है ? ' 

“हर्ज ही कया है ? “--आखें मठका कर बड़े भाई ने कहा--- नई-तई 
बट मिली है, इसी से तूं उस पर छट्ठू हे। पर कान खोल कर सूत ले---अगर 
तूने उसे दबा कर नही रखा, ज्यादा पढाया-लिखाया और आजादी दी, तो 
याद रख, एक दित तुझे पछताना पड़ेगा--और ख़ावदान के नाम पर जो 
बद्ठा लगेगा, वह अछरूग से | * 


बे 


गौरीहंकर अभी नई उम्र और कच्चे ज्ञान का युवक था। बडे भाई की 
चेतावनी की गहराई को शायद भलीभाति समझ तो नहीं पाया, पर इतना 
उसे जरूर महसूस हुआ कि उसका कुछ अर्थ जरूर हैं। हतप्रभ-सा वह चुप- 
चाप वहां से अपने कमरे की ओर चला। 

कमर से बाहर पाव रखते ही उसने देखा कि प्रतिभा चौखठ के सहारे 
खडी सारी बातें सुन रही थी। उसके बाहर आते ही बिना कुछ बोले ही वह 
भी उसके आगे आगे कमरे की ओर चल पडी। 

कमरे में पहुँच कर प्रतिभा दाहिनी ओर की दीवार का सहारा ले कर 
खडी हो गई और धन्य दृष्टि से छत की ओर अपलक निह्मारने लगी। गौरी- 
शकर ने पास आ कर कहा--- तुमने भाई साहब का फेसला सून लिया।” 

“सुन लिया---उसी प्रकार छत की ओर देखते हुए प्रतिभा ने कहा । 

गौरीजकर चुप हो गया। क्या कहे, कुछ समझ में नही आ रहा था। 
प्रतिभा ने फिर कहना शुरू किया- मा के मह से, पिताजी के मुंह से, जढ 
जी के मुह से, और शायद तुम्हारे मृह से अमी गुनना बाकी है---एक ही बात 
निकलती है. लडकी को ज्यादा पढाना अच्छा नही ? पढ-लछिख कर वह हाथ 
से निकल जायगी | ! उफ, कितने सकीर्ण और अदूरद्शी हो तुम छोग ? 
जो स्वय सुशिक्षित नही, जिनके अपने मानस और चरित्र का विकास नही 
हुआ, वे इसके सिवा भला सोच ही क्या सकते है ।” और फिर पास खड़े 
गौरीशंकर की ओर मृखातिब होकर प्रतिभा ने जरा आवेश के स्वर में 
कहा---' मे जानती हूँ , तुम लोग क्‍यों मुझ्के आगे पढने नहीं देना चाहते। 
पैसे का प्रश्न उतना नही है, जितना तुम्हारी सडी-गली मान्यताओं, कुसंस्कारों 
और अन्धपरम्पराओं का। तुम सोचते होगे कि घर की चहारदीवारी में बद 
स्‍त्री पाव की अच्छी जूती, आज्ञाकारी बादी और उन भठे आदर्शों की रक्षा 
करने वाली निरीह बहु वनी रहेगी, जो आज नारी-स्वातंत्य के भार्ग में सब 
से बडी बाधा है। पर मिस्टर गौरीगकर, प्रतिभा उस मिट्टी की बनी नहीं है, 
जो इन बाघाओं से ही रुक जाय।' 

प्रतिभा के दीप्त नेत्रों और उप्र मुख मुद्रा को देख तथा उसका दृढ़ स्थिर 
स्वर सुन जैसे गौरीशंकर को अपनी आंख-कान पर विश्वास नही हो रहा 
था। विनय और संकोच की लाजवत्ती सी प्रतिमूर्ति प्रतिभा के मुंह से आज 


२ ले मार 


वह यह सब क्या सुत्र रहा था ? प्रतिभा क्या बदल गई थी, या यही उसका 
असली रूप है, जो अभी तक परिस्थिति-वश ढका-मुदा था। अभी वह यह 
सब सोच ही रहा था कि प्रतिभा ने फिर कहना शुरू किया--- क्यों आप भी 
किसी सोच में पड गए क्‍या ? मा और भाई के स्नेह ने आपके मन-मस्तिष्क 
पर गुलामी और परावलबन का बढ़त गढ़रा रग चढ़ा दिया मालम होता है 
उससे अछग आपका कोई अस्तित्व हैं, यह शायद आप सोच ही नही सकते 
फिर उनसे अलूग ही कर अपने पातरों पर खड़े हौने की बात तो अभी बहुत 
दूर की है! मां और भाई की पराधीनता ने आपके आत्मविश्वास और 
स्वावलम्बन की प्रेरणा को जैसे मार ही दिया है। पर में उम्र-भर अपमान 
और पराधीनता के टुकडों पर पलने और आसू बहाने यहा नही आई हूँ। 
पश्‌ की तरह पेट भरते से कुछ परे भी जीवन का अथे है । देश और समाज 
के प्रति भी तो हमारा कुछ कत्तंव्य है। 

गौरीशंकर आखें फाड कर प्रतिभा की ओर एक टक देख और यह सब 
सुन रहा था। उसे ऐसा रंग रहा था मानो कोई सुधारवादी फिल्म देख रहा 
हो। उसके मुँह से केवल एक ही बात निकली--तो तुम मेरी और 
भाई साहब की इच्छा के विरुद्ध चलोगी ? ” 

“निस्सदेह---सहज भाव से प्रतिभा ने कहा--यह कोई बुरा काम 
तोह नहीं। फिर में तभी ऐसा करूँगी जब कि में अपना खर्चे भी निकाल सकू । 
अगर मुझे आगे पढना ही है, तो मे व्यर्थ आप लोगों पर उसका बोम क्‍यों 
हाल १ 

“#इसका मतरूब हुआ कि तुम कही कुछ काम भी करोगी।” 

“हां, मतलूब तो यह साफ है।” 

“तो यह बात है।“---कहते हुए गोरीशकर कमरे में इधर-उधर 
टहलने लगा। प्रतिभा कुतूहल-निश्चित मुद्रा से उसके चेहरे के भावों को 
पढने की चेष्टा' करने रूगी। 

[३] 

उस दिस जब प्रतिभा लौटी, तो गौरीश्षकर आ चुका था। कपडे उतार 

कर वह पखे के नीचे सुस्ता रहा था। मेज पर किताबें रख प्रतिभा जल्दी से 


- ११४ - 


उसके पास आ गई ओर सहज भाव से बोली---जाज मुझे आने मे देर हो 
गई। बुरा तो नहीं मान गए ? ” 

“मं बुरा मानने वाला होता ही कौन हूँ ? “-गौरीशंकर ने उदा- 
सीनता दिखाते हुए कहा-- भला अब हमारी किसे परवाह है ?' 

“लो, फिर लगे न फालतू बाते करने। आज प्रोफेसर साहब ने फिर वही 
समानाधिकार का मसला छेद दिया। इस सम्बन्ध में बाते करते हुए मुझे 
तो समय का ध्यान ही नहीं रहा। कितने अच्छे आदमी हैं वे ! उनसे बातें 
करने में समय का ख्याल ही नही रहता। 

क्यो प्रतिभा, प्रोफेसर तुमको बहुत पसन्द हे--याने बहुत अच्छे 
लगते हे ? 

हा, अच्छे लगने छायक आदमी ही है वे। 

मुभसे भी अधिक अच्छे लगते हे तुम्हे वे ? 

गौरीशकर के पास आ और उसकी आखों में घ्रते हुए प्रतिभा ने 
जरा कई स्वर में पूछा--क्या मतलब हूँ तुम्हारा इस सवाल से ? तुम 
मेरी परीक्षा छेना चाहते हो या अपने मन का चोर बाहर निकाल रहे हो ? 
छिः कितने संकीर्ण हृदय हो तुम ? 

गौरीशकर कुछ सकपका गया। फिर ततनिक गम्भीर होकर बोला--- 
“प्रतिभा, तुम्हारे मुह से रोज-रोज प्रोफेसर की प्रशसा सुनते-सुनते मेरे तो 
कान पक गए। अगर प्रोफेसर तुम्हे बहुत पसन्द है, तो 

खबरदार जो मुह से कोई बेजा बात निकाली तो---बीच में ही टोक 
कर प्रतिभा ने दर्प पूर्वक कहा--- तुम अपनी जगह हो, प्रोफेसर अपनी। 
मेरा तुमसे जो सम्बन्ध है और मेरे मन मे तुम्हारे लिए जो स्थान है, उसकी 
महत्ता और पवित्रता से में बखूबी वाकिफ हूँ। पर प्रोफंसर मेरे आदर 
और श्रद्धा के प्रतीक है। आज के यूग में ऐसे सच्चे सत्युरुष कहाँ मिलते 
है? उनके विशाल उज्ज्वल व्यवितत्व की छाया में मानो शत-सहस्र' वट 
वृक्षों की-सी शीतलता और शान्ति मिलती हैं। 

बस, बस, यह बकवास बन्द करो --गौरीशंकर ने तुनक कर कहा--- 

शर्म नहीं आती तुम्हें पति के सामने पर-पुरुष की इतनी प्रशसा करते ? 
बया इतने पर भी तुम अस्लियत पर पर्दा डाल सकती हो ? 


आओ 


नही, शर्म की इसमें बात नही, मे उन मूढा अज्ञ स्त्रियों में से नहीं हु, 
जिनके लिए अकेला पति ही परमेश्वर है और शेष सब पत्थर की निर्जीव 
मूर्तियां। तुम्हारा और मेरा एक सांसारिक सम्बन्ध है, जो मन-मस्तिष्क से 
अधिक शरीर का है। पर मेरे मन और मस्तिष्क मे आदर और श्रद्धा का 
प्रतीक बनी ऐसी कई मूत्तियां है जो मेरी अराध्य है। प्रोफेसर भी उनमें से 
एक हे 
तो तुम उन्ही के पास क्यो नही चली जाती | ---भल्ला कर कुर्सी पर 
से उठते हुए गौरीशकर ने कहा--- मेरी छाती पर मृग दलने और रोज 
उसकी तारीफों के पुल बाघ कर मेरा खून जलाने मेतुम्हें क्या मजा आता है ? “ 
प्रतिभा सन्न रह गई। उसका सारा शरीर रोमाचित हो उठा। उसे 
अपनी आखों और कानों पर जैसे विश्वास नही हो रहा था। चित्र-खचित-सी 
उसकी आखें गौरीशकर की ओर खुली की खुली रह गई। पुरुष का मन--- 
नही, नही पति का मन--कितना ओछा और संशयालु हो सकता है, उसे 
आज मानो नग्न रूप में दिखाई दिया।पर उसके जी को जलाना ही 
गौरीशकर का उद्देश्य न था, उस पर नमक डालना भी अभीष्ट था। 
सो दरवाजे के पास रुक कर गौरीशंकर ने कहा---आहा, क्या त्रिया- 
चरित्र की भाया सीखी है. तुमने ? ऐसे देख रही हो, मानो तुम्हें कुछ 
पता ही नही ! मै कोई मिट्टी का भाधव नही हू, प्रतिभा। तुम मुझे जितना 
बुद्ध और भोला समभती हो, में उतना तो ज्ायद नही हूं। बहुत दिनों से 
पास-पडौस मे तुम्हारे इस नए 'रोमास की चर्चा है। मां और भाई साहब तो 
इतने परेशान है कि मुभसे बात तक करना छोड दिया है। ज्यादा पढ-लिख 
कर तुम यह करोगी, इसका मुझे स्वप्न मे भी गुमान न था। आज हम छोग 
किसी के सामने आंख उठा कर देख भी नही सकते ? ” 
प्रतिभा जैसे नीद से जागी। अह्वस्त स्वर में उसने कहा-- भोह,-के, 
बड़े दिनों से अपने दिल मे जमा हुआ गबार निकाल रहे हो आज । पहले तो 
तुमने कभी ऐसी आदाका प्रकट नहीं की ? फिर इतने दिन तक साथ रह कर 
भी तुमने मुझे नहीं पहचाना और मुझसे अधिक उन लोगों पर विश्वास किया, 
जौ नारी-स्वातन्न्य को फूटी आंखो भी देख नही सकते; जिन्हें दूसरों को 
बदनाम करने में ही मज़ा आता है। पर खेर, जब बात यहां तक पहुंच चुकी 


5 


है तो तुम्हे जिस तरह भी विश्वास हो, इस बात के सच-भूठ का निर्णय कर 
लो। पर यह पहले बता दो कि इस बात के सच निकलने पर तो तुम जो चाहो, 
मुझे सजा दे सकत्ने हो; लेकिन अगर यह बात भूठ, निराधार और कपोल- 
कल्पित साबित हुई, तो तुम क्या प्रायश्चित करोगे ? जानते हो, यह भूठा 
लांछन रूगा कर तुमने मेरे मन में अपना रहा-सहा स्थान भी खो दिया है। 
पति तो क्या, इन्सान के रूप में भी तुम मेरी नजरों से गिर चुके हो। बजदिल, 
तीच कही का।” 

“जबान बन्द कर, प्रतिभा --गौरीशकर ने डपट के स्वर में कहा--- 

नही तो अच्छा न होगा। हर बात की एक सीमा होती है। में तुझे इससे 

अधिक अपना अपमान नही करने दूंगा।” 

“अपमान | “---मुंह बिरा कर प्रतिभा ने कहा-- तुम-जैसों का कोई 
आत्मन्सम्मान है, जो अपमान होगा। नीच, कुत्ते कही के ! ” 

“देख, जबान सम्भाक, . . . .--दात पीस कर गौरीजं कर चिल्लाया 

| ४ 

प्रौफेसर ज्योतिरिन्द्र वसु एकाकी जीव थे। जिस प्रकार किसी विशाल 
पर्वत को किसी एक ओर से देख कर उसके सम्पूर्ण रूप का अन्दाज लगाना 
कठिन है उसी प्रकार उनके सम्पूर्ण व्यक्तित्व की जानकारी भी कठिन थी। 
अपने बारे में वे कभी किसी से कुछ कहते ही न थे। विवाह उन्होंने क्‍यों नही 
किया और विश्वविद्यालय से मिलने वाला सारा वेतन निर्धघन छात्र-छात्राओं 
में बांद करं वे अपनी मुजर-बसर केसे करते थे, उस बारे में छाख पूछने पर 
भी उन्होंने कभी कुछ नहीं बताया। पर नीरस वे बिलकुल नहीं थे और 
जरा-सा उनके हृदय में प्रवेश पा जाने पर तो न सिरे ज्ञान का अपूर्वे खजाना 
ही हाथ लग जाता था, बल्कि एक ऐसे उज्ज्वल व्यक्तित्व के दर्देत भी होते 
थे, जो आज के मानव-समाज में दुर्लेभ ही समभ्िए। उनके व्यक्तित्व के 
पारस-स्पश से न जाने कितने व्यक्ति सुबर्ण बन चुके थे। 

संकट के समय इन्ही के वरद हस्त ने प्रतिभा की रक्षा और सहायता 
की । प्रोफेसर के रूप में उसे गुरु ही नही, एक अग्राध स्तेहशील पिता भी 
मिला और वह बिलकुकछ भूल ही गईं कि प्रोफेसर उसके असलो पिता नहीं 
हैं प्रौफेसर ने भी प्रतिभा में मानो साक्षात प्रतिभा के दर्शन किये। परि- 


नि ५ ५ 9-०» 


स्थितियां, बाधाएं, अभाव आदि जैसे उसे रोक ही नही पाते थे। कभी-कभी 
प्रतिभा के मुह से नारी के पीडन-शोषण की बाते सुन कर प्रोफेसर रोने लगते 
थे। प्रतिभा से उन्होंने यह प्रतिज्ञा करवा ली थी कि पढ-लिख कर वह केवल 
जीविकोपार्जन ही नही करेगी, बल्कि अपनी पीडित-ताडित बहनो के उद्धार 
के लिए भी कुछ करेंगी। इसीलिए पढाई के बाद और कभी-कभी पहले या 
बीच में भी नारी-पीडन के संवादों की चर्चा दोनों बडी हादिक भावना के 
साथ किया करते थे। 

आज प्रोफेसर बार-बार घडी देख कर मन-ही-मन कह रहे थे-कि पता 
नही, प्रतिभा अभी तक क्‍यों नही आई। अधीर हो कर वे कमरे मे टहलतने 
लगे। फिर खिडकी से देखा, तो गौरीशकर के मकान के आगे कुछ लोग जमा 
देखे। उनकी कुछ समझ में आया। दो-एक मिनट कुछ सोचने के बाद वे 
चण्पल पहन कर उस और चल दिए। 

घर के बाहर गौरीशकर को दौड-धूप करते देख वे और शशोपज में 
पडे । उसके पास जा कर वे कुछ पूछना ही चाह रहे थे कि गौरीशंकर ने आखों 
में आंसू भर कर अभिनय के पूरे कौशल के साथ कहा--- प्रोफेसर साहब, 
में तो लुट गया। मेरा सर्वस्व छिन गया ! किसी तरह मुझे सहारा दीजिए। 
बल दीजिए कि मे इस आघात को सहन कर सकू।” 

“पर माजरा क्या है ? मेरी तो कुछ समभ में नही आ रहा है। 
प्रोफेसर ने कहा। 

“ओह, आपको सूचना भिजवाना तो भूल ही गया था। कल रात को 
हृदय की गति बन्द हो जाने से अचानक प्रतिभा का देहावसान हो गया। 
मेरी तो जान ही निकरू गई, प्रोफेसर साहब, अब में क्या करूँ ? मेरा क्या 
होगा ट 73 

प्लोफेसर को जैसे काठ मार गया। एक क्षण वे सच्च रह गए। फिर 
गौरीशंकर की ओर देख कर पूछा--- हार्टफेल ! आपको ठीक मालूम हूँ 
हार्टफेल ही हुआ है।” 

“जी हा, जी हा---कह कर गौरीशंकर इधर-उधर देखा और फिर 
विनीत स्वर मे बोला---आप से फिर बातें करूंगा । अब जरा अर्थी को उठ- 
वाने की जल्दी करनी है, वर्ना फिर धूप चढ आयेगी।” 


बा श २ बन 


प्रोफेसर कुछ कहे, इससे पहले ही गौरीशंकर उन्हे आशंकाओं और 
दुश्चिन्ताओं के भँवर में छोड कर घर के भीतर चला गया। 

थोडी देर बात अर्थी उठाई गई और चार आदमियों के कन्धों पर उसे 
इसशान की ओर ले जाया जाने छगा। प्रोफेसर ने कन्धा देना चाहा, पर 
उनके दुरबंल स्वास्थ्य को देख कर उनसे वैसा न करने का अनुरोध किया 
गया। वे मान गए और चुपचाप अर्थी से कुछ कदम पीछे उसके साथ-साथ 
हो लिए। 

कुछ तो अपने स्वभाव के कारण और कुछ गर्मी के कारण प्रोफेसर नीचे 
जमीन की ओर ही देखते हुए चल रहे थे। एक जगह उन्हें सडक पर खून की 
एक बूंद दिखाई दी । परन्तु इस समय उसके बारे में सोचने की उनकी मनोदशा' 
कहां थी ? पर शीघ्र ही दूसरी, फिर तीसरी, फिर चौथी, फिर पाचवी . . . 
इस प्रकार खून की बूदों की एक कतार-सी दिखाई दी। एक क्षण के लिए 
प्रोफेसर किसी सोच में पडे, फिर न जाने क्या सोच कर आस-पास के छोगों 
को हटा कर वे अर्थी के बिल्कुल निकट पहुच गए और गर्दन झुका कर उसके 
निचले भाग को देखने लगे। बीच का हिस्सा कुछ अधिफ नीचे भुका-सा 
दिखाई पड रहा था और उस स्थान से कोरे कपडे में से छत-छन कर चन्द 
रूगनहों के अन्तर से खून की बूदे टपक रही थीं। प्रोफेसर की आंखों के आगे 
अधेरा छा गया और वे वही गिरते गिरते बचे। उनके पाव लड़ख शर्तें देख 
कर एक व्यक्ति ने कहा--- आपकी तबीयत ठीक नहीं है प्रोफेसर साहब, 
आप श्मशान चलने की तकलीफ न करे। चलिये, आपको घर पहुंचा देते हैं ।* 

उस आदमी की सहायता से प्रोफेसर आये और बैठक में रखे सोफे पर 
लंबे पड रहे। पता नही कब तक वे उस अवस्था में वहा पड़े रहे। 

भेद में न 
दूसरे दिन सुबह भगी ने आ कर बताया कि प्रतिभा की हत्या करने के 
भियोग में गौरीशंकर, उसका बडा भाई और मां गिरफ्तार कर लिए गए 

हैं। लाश डाक्टरी परीक्षा के लिए भेजी गई है। सुना है कि छाश की पसलछी 
की दोनों हड्डियां टूटी हुई हैं। 


इकलाई 
[ श्रीमती चन्द्रकिरण सौनरेक्सा ] 


बात अब से दस बरस पहले की है, पर सुनिया के मन पर तो वैसी ही 
उजली उजली फेली है मानो कल ही वह घटना हुई हो । जैसे करू ही तो 
विसेसर ने उसे वह सुनहरे फूलों वाली इकलाई ला कर पहनाई हो। साडी 
तो वह कई बरस हुए फट गई। बहुत सम्हाल कर पहनने पर भी इकलाई फट 
ही तो गईं। जहा तक पैवन्द लूग सकते थे और सिलाई गृथाई हो सकती थी, 
करने में सुनिया ने कोर कसर नही' रखी, पर कपडा तो आखिर कपडा ही 
है। फिर जब इस लडाई के और उसके बाद के इतने सालों मे व्याह के जोडे 
के अतिरिक्त वही एकमात्र धराऊ कपडा था, जो तीज त्योहार, नाते रिह्ते 
में पहन कर सुनिया ने काम चलाया। तो आखिर एक दिन तो उसे तार तार 
होता ही था। हा, उसकी यादगार स्वरूप उसकी किनारी को उतार कर 
उसने उसे अपने पुराने लकडी के बक्स में रख लिया है कि शायद कभी उसे 
मलमल नाम की दुलंभ वस्तु पाच क्या साढ़े चार गज भी मिल गई तो वह उस 
पर ही उस किनारी को एक बार और टांक छेगी। पर मलूमरू तो क्या 
बाजार मे गाढ़ा गजी तक ऐसे नदारद है जेसे दुकानदार अब अतलूस, कम- 
ख्वाब, सिल्क और साटन के अतिरिक्त और कुछ बेचना भूल ही गये हों। 
उसके देखते सुनते इन सालो के वीच कई बार सुनाई हुई कि कपडे पर कन्ट्रोल 
हो गया है। अब सब को कन्द्रोल की दूकान पर से उसकी जरूरत के माफिक 
कपड़ा मिलुंगा। और कन्ट्रोल हुआ भी । पर सुनिया के यहां तो कभी ढंग का 
कपड़ा आया नही। एक तो इस महगाई के मारे गांठ मे कभी चार पैसे सुभीते 
से रहते ही नही और जैसे तैसे पैसे भी जुटाओ तो उस कन्ट्रोल को दूकान पर 
लाइन में कई रोज खडे हो कर सौ सौ धक्के खा कर जितना कपडा मिलता 
था, उसमें इकलाई तो कभी मिली ही नही' छोटे पने की मोटी जनानी धोतीं 


जौ कभी मिली भी, तो घर में तीन स्त्रियों के बीच वह धोती, ऊंट के मुह में 
जीरे की भाति, छीन भपट में ही चली जाती। 
और सुनिया तब उलट पलट को वही दस बरस पुरानी इकलाई 

वाली घटना को दोहरा कछँती उसका गौना हुए दो बरस हुए थ तव विरादरी 
की रोटी ढेने में उस सस्ते के जमाने में भी तीस रुपया कर्ज हो गया था बिसेसर 
पर। मौसी की हसली भी गिरवी पड गई थी। सो टो बरसो में तन पेट से 
बचा कर वह कर्जा जब उतर गया, तो बिसेसर सूनिया के लिए पहली बार 
कुछ कपड़ा लंने बाजार गया। 

लौटा तब दिये जल चुक थे। सुानया रोटी बता रही थी। विधवा बृढी 
मौसी और बुआ बाहर के छप्पर मे बेठी किसी की नई ब्याही बहु के गुण 
दोषों की मीमांसा में जुटी हुई थी। 

बिसेसर ने बगल का बण्डल खटोले पर रख दिया और बवीडी का अन्तिम 
कंश खीचा और उसे फेंक कर अन्दर को मूह कर के बोला---तनिक एक 
लोटा जल दे जाओ बडी पियाम लगी है।” 

सुनिया घूघट काढे आकर कटोरे में जार बडे बतासे और लोठा भर 
पानी ले जाई। बतासे उसी नई बहू के घर से आये थे। मोसी ने इतने मे बडछ 
खोल डाला था धृधली टूटी चिमनी वाली लालटेन की रोशती से भी उस 
बंडल में लिपटी साडी की किनारी देख कर मौसी का मुह खुला रह गया 
आखों पर विश्वास न आया, तो हाथों से टटोछ कर उस साडी के मुलायम 
कपडे पर हाथ फेरने रूगी' 

बिसेसर तनिक मुसकराया, फिर बोला---“कंसी रूगी घोती सौसी ? 
बाजार भर छान कर लाया हूँ।*' 

“क्रितने की है ? ' बुआ ने भी उजाले मे किनारी परखते हुए पूछा। 

“तुम्ही बताओ कितने की होगी ? ” बिसेसर ने तनिक गये से कहा। 
भौसी चिढ गई। 

तिनक कर बोली--- न बाएं दादों क॑ राज मे और न खसम वे राज में 
कभी ऐसी साडी पहनी। बाप रे, कैसा महीन तार है इसका। मुदृठी में दवा 
लो। दाम क्या बतावे। होगी यही तीन-एक रुपये की। जासती चाहे हो, 
कम की तो है नही।" 


१२१ 


“ढाई रुपये दो, पैसे की।” बिसेसर ने उत्तर दिया, लाला तो पौने तीन 
स॑ कम करता ही न था, पर आखिर हम भी मजूर है तो कया बडे बडो से 
काम रखते हे। सैकडों बार छाल्‍हा का माल ठेसन से ढो कर लाया हूँ। साढ 
तीन आने छुडा ही तो लिए। लाला भी बोला, ले जा बेटा, तुम रोज के हमारे 
आदमी हो एक साडी में चार आने का घाटा ही सही, किसी और भागवान 
से पुरा हो जायगा।” 

“हाई रुपये।” मौसी सच्च रह गई। भरा नित रोज पहनने की साडी 
ढाई ढाई रुपये की आने लगी, तब तो सुनिया रह ली इस घर में। आठ 
आने गज तो जापानी रेशम मिलता है। तीन रुपये में तो व्याह का लहंगा 
बन जाय। क्षव्ध स्वर में बोली--- 

“सं कहता हु बिस्सू तेरी अकिल को क्या हो गया है ? आई रुपये में तो 
काली किनारे की तीन मोटी धोती आ जाती जो दो वर्ष भी न फटती। 
भला, इतना बारीक कपड़ा क्‍या हम मजूरिनों की बहू बेटियों के पहिनने 
की चीज हूँ ? अरे बहु को अपनी अमीरी ही दिखानी थी, तो दस रुपये की 
नई चाल की पाजेवे बनवा देता। बहुत धन जमा कर लिया था तो मुझे भी 
एक जोडी बतवा दे। भला कपडे में इतना पैसा फेकना 

मौसी के जी की जलन का मजा लेकर बिसेसर जरा हंस कर 
बोला। “तू भी मौसी कंसी बाते करती है। अरे क्या गहने गढ़ाने को दस 
बीस न हों तो अच्छा कपडा भी त पहिने भगवान चाहे तो दो तीन 
महीने मे पायजेब भी बनवा दूंगा। अब जब कपडा लेने ही गया था, तो 
मुभसे तो रद्दी चीज ली नहीं जाती। वैसे तो ढ़ाई रुपये में कुरता भी 
आ जाता, पर में तो एक रुपया उधार करके डिमास का जम्पर सिलने दे 
आया हूं। भरे जब लेना ही ठहरा तो बढ़िया माल क्यों न ले। 

तो मखमर का लहंगा सिला दे न। मया बाजार में मखमलरू नही 
बिक रही थी ? 

“अरे बुआ ! तुम भी चहकी” बिसेसर ने उठते हुये कहा ! क्या नहीं है 
बाजार में ? गांठ में पैसा होना चाहिए। बिलायत की मेम तक खरीदी 
जा सकती हैं। एक एक दुकान पर वो वो बढिया किनारे की धोती साडी 
रूटक रही है कि देखते रह जाओगी। अच्छा, तारीफ नही करोगी कि मोतियों 


9 54 आर 


के बीच में हीरा चुन छाया। जब तेरी ये बहू पहनेगी तो चमक उठेगी। 
क्यों सौसी | 

मौसी ने जरू भुनकर कहा--“चसकेगी क्‍यों नहीं ? इतनी पतली 
साड़ी में तो अंग अंग चमकेगा। अच्छा तो है, टोले पडोस में सभी को बहु 
के दर्शन हो जायेगे।” 

“त्‌ भी मौसी बस यू ही रही बालसफंदहो गए, पर अकलू नही आई। 
अरी बाबू लोगों की घर वाली तो नित रोज इकछाई ही पहनती हे। क्या 
वे नंगी दीखे है ” क्या नाम उसका. . .पेटीकोट, .हा, यहो तो दो 
गज रूट्ठ म सिल जायेगा। दो आने गज का हरूद्ठा ले केना उस दुर्गा 
बजाज से, जो फेरी करने आता है। और लाला जी की बह से मसीन करा 
दूगा। 

मौसी मृह में ही बडबडाती हुई उठ कर बाहर चली गई। पडोस में 
चार घर कह कर जी का दुख निकल जाता है न। बआ भी रमज की बीमार 
घर वाली को देखने जाने का बहाना करकी चल पड़ी । कपई पर इतनी पेसे 
की अरबादी दोनों बवद्धाओ को असह्य हो रही थी। गहन पर रुपया खचेना 
तो उनकी समर में आता था क्योंकि गहने ही तो उनका वह समस्त आधार 
होते है जिस पर गरीबों के अधिकाश काम हो जाते है। बेरीजगारी मे उन्हें 
ही आधे दामों मे बेंच कर पेंट की समस्या हल होती है। बीमारी हारी में 
उनको ही मगिरवी रख कर दवा दारू दूध का इन्तजाम होता है। यही नही 
मरने पर कफन काठी के लिए गहने ही अन्तिम सहारा होते हे। चांदी के 
वे चन्द गहने जो तन पेट में रूखा सूखा खा पहन कर बनवा लिये जाते हे, 
भौसी की समझ में वही पेट भरे का सिंगार और सूखे का आधार होते है । 
पर इन नई रोशनी के छोकरों को वह क्या कहें। उस दिन बहू गई रात तक 
पडोस में अपने घर की इकलाई पहनने के फैशन की चर्चा करती रहीं। ओर 
उस उतने आमानों की इकलाई को जब पहले पहल सुनिया ने पहिना था तो 
उसकी समस्त देह में गुलाब खिल उठे थे। और विसेसर ने मन में सोचा 
कि अब आगे से इसे इकलाई ही पहनाऊँगा । 

पर दोबारा इकलाई पहनाने की नौबत तहीं आईं। क्योंकि इस बीच 
बिसेसर बीमार पड गया। और एक लडकी का बाप भी बना। दोनों ही खर्चे 


3 


इतने भारी थे कि सुनिया के कपडे, परिवन्द और रुच्छे गिरवी रख कर 
ही पार पाया। 

बिसेसर ने अपने जान अच्छे होकर जी तोड मेहनत' करी। यही नहीं, 
सुनिया भी, जो कभी आस पास के बडे घरों में कूटना पीसना मिल जाता तो 
कूटती। पर ये सात समुन्दर पार जो कही जर्मनी वाले से छडाई छिड गई थी, 
इससे महंगाई जो बढ़ी तो कही रुकने का नाम न लेती थी। 

कर्जा उतार कर चीजें छुडाने में दो बरस लग गए। तिस पर बाजार में 
कभी गेहूं गायब हो जाता, तो कभी मिट्टी का तेछ। और तो और एक बार 
नमक और  रेजगारी तक मिलती बन्द हो गई थी। मजूरी मे बढती न हुईं । 
सो बात नहीं। पर मजूरी मे अगर रुपये मे चवन्नी बढ़ी, तो चीजे अठगुनी 
दसगुनी चढ गई थी। 

सुनिया हैरान होकर पूछती--- क्यों जी, क्या मिट्टी का तेल भी लडाई 
पर जा रहा है ? चीनी भी ? कोयछा रूकडी भी ? ” 

बिसेसर पढा नही तो क्या, शहर के सभी' लोगों की उडती उडती बाते 
तो सुनता है। पत्नी के भोलेपन पर हंस कर कहता--- तू भी बस यू ही है। 
अरी सिपाहियों को क्या वहा कुछ नही चाहिए । अब तो सबुर कर के दिन 
काट । जब लडाई बन्द हो तो चीनी खाइयो। दीये जलाइयो 

और सुनिया बड़े सब्र से सालों के अंधेरे मे रोटी करती रही । कभी बाजरे 
से भूख बुझाई, कभी वाल वच्चों को गकरकन्द्री उबाल कर ही पेट का आधार 
कराया। हे भगवान्‌, लडाई बन्द हो जाये तो बह महावीर जी को सवा सेर 
का रोट चढावेगी। बात यह है कि और देवता तो घी का पकवान मागते हें 
पर महावीर जी को तो तेल का रोट चढ़ा कर भी काम चल जायगा। 

इकलाई बहुत सम्हारू सम्हाल कर पहिनने पर भी फटने लगी। कई बार 
बिसेसर पांच सात रुपये तक जेब मे डाल कर वैसी साड़ी लेने के छिए बाजार 
गया। पर दूकानों पर तो उसने वैसे कपडे किनारी की भलक भी न देखी। 
हां, सुनिया ने उसे बताया जरूर कि लाला दीपचन्द की बहु अब भी वेसी 
इकलाई पहनती है। पर उच्नीस रुपये की एक मगाई है। “उनका क्या राजा 
आदमी है।” बिसेसर ने कहा--“लडाई खतम हो तो जरा सस्ता होने पर 
एक बार इकटठी ही' चार पाच इकलाई ले दूगा।” सुनिया भी आश्वस्त हो 


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कर कहती “हा जी, बिटिया भी सयानी हो गईं। एक दो कपडा उसके लिए 
भी तो रखना होगा। 

आज सुनिया की लडकी की सगाई होने वाली है नौ बरस की विटिया' 
उनकी दृष्टि मे वहुल बडी हो गई है । महीना पहले से ब्लैक से जौ मठर 
खाकर वह रागन का गेह बचा कर रखती रही है । चीनी भी इकट्ठी कर 
ली है। घी तो खेर असली मिल ही नही सकता, इसका उसे ध्रुव विश्वास 
है। इसी से डालडा लेने तक के लिये भी लाइन मे खडा होना पडता है। परसो 
मौसी तीन धण्टा धूप में तप कर कही छा पाई हे। बढ़िया चावल तो ढूढने 
पर भी कही नहीं मिला वही राशन का मोटा अरवा चावल ही मेहमानों 
को खिलाना होगा। पर मुसीबत है कपडे की। कपद तो जैसे सपला हो गया 
है। सुनिया बेचारी तो समझ ही नही पाती कि वे अच्छे दिन कहा चले गए 
जब गाठ मे पैसा होने से दुनिया भर की चीजे आ जाती थी। लड़ाई बन्द 
हो गईं। सुराज भी मिल गया। नेहरू जी राजा भी हो गए पर महंगाई रत्ती 
भर भी नही घटी। कपडा तो महंगा सस्ता कंसा भी नही सिलता। भरा 
समधी के सामने वह ब्याह का जोडा पहले भली रूगेगी ? नही जी, जैसे भी 
हो एक किनारदार अच्छी धोती तो मगानी ही पडेगी। एक धोती के लिए 
इससे अधिक दामों की कल्पना सुनिया कदाचित्‌ सात जन्म भी नहीं कर 
सकती । उसने अपनी गोरूक तोडी। उसमे सोरूह रुपये सात आने निकले । 

जैसे कलेजे के टुकड़े अपने हाथों बिसेसर को सौप रही हो, उसी तरह वे 
रुपये उसके हाथों में रखती हुई वह बोली-- देखो जी ! जैसे भी हो एक 
धोती जरूर ले आना।* 

बिसेसर क्‍या चाहता नहीं कि सुनिया अच्छा कपडा पह्विने ? 

आज ही कन्‍्ट्रोल से कपडा मिलने की खबर है। वहा अच्छी इकराई 
तो क्या मिलेगी। पर जो भी सिले, के आवेगा। अगर मरदानी धोती मिल 
गई तो वही सही। पुरानी किनारी उसी पर टांक लेगी, रंग लेने पर सत्र ऐब 
ढंक जायेगा। 

दोपहर में मेहमान लोग आ गये । बिसेसर कपड़ा लेने गया था। सुनिया 
मोटी मेली धोती पहिने कोठरी में दुबकी रही । बस मौसी ही ने हुबक तमाखू 
और दबंत पानी देने का जिम्मा ले रखा था। 


बम ५ २ प्‌ न्न्न्न 


बिरादरी के पाच छः बजे तक आ जायंगे। सुनिया ने कोठरी में ही धुयें 
और गर्मी से भुलसते हुए पूरिया पुये कचौडी सब कुछ बनाया है। रह,रह कर 
छप्पर की ओर ताकती कि शायद बिसेसर साडी ले कर आता होगा। 

पांच बजे पसीने से तर, धूप मे दिन भर खडे रहने से काला पडा चेहरा 
लिये बिसेसर लौटा कन्द्रोल की दूकान से । पाच गज मोटी मारकीन और चार 
गज पतला डोरिया मिला था। 

अन्दर जा कर बन्डल पत्नी के हाथो में रख दिया। 

सुनिया ने आटा सने हाथों से ही बन्डल खोल डाला। 

और साडी ? ” उसने मारकीन की तहे अच्छी तरह टटोल कर पूछा । 

“बस बस साडी वाडी यही है। सारे दिन लेन मे खडे होकर यही 
मिला है । इसी मारकीन पर टठाट की किनारा जड कर पहन लीजो ” 
बिसेसर ने जले स्वर में उत्तर दिया। 

“अरे तो क्या पन्द्रह रुपये में भी इकलाई नहीं मिली ? लडाई खतम 
हुए भी सालों हो गये ।” 

“लड़ाई साली क्‍या करेगी .. . .बिसेसर फूट पड़ा/-जब तक इन 
चोर बाजारी करने और काला मुनाफा करने वालों का सत्यानाश न होगा, 
कोई चीज भी मिलनी कठिन है। जानती है बाजार में किसी ने भी सूती' 
बढ़िया इकलाई होने की हामी ही तही भरी। . . . . . . . .  : 

भला मजूर के मेले कटे कपडे क्‍या इकलछाई खरीद सकते हे ? एक 
सूरजमल ने बहुत चिरौरी करने पर कही भीतर से ला कर दिखाई भी तो 
दाम जानती है क्‍या मांगे | इक्कीस रुपये। इन दामों माल न भी बिके तो 
उनकी बला से | चोर बाजारी की कमाई थौडी कर हरी है उन्होंने ।” सुनिया 
सब रुआंसी हो कर कपडे रखने चली । लकड़ी का बकस खोल कर उस पुरानी 
किनारी को हसरत से टाक पर उसने मारकीन उसी में रख दी। और पुराने 
व्याह्ष के लूहगे की. तहें खोलते छगी।